संघ की राजनीतिक पिच पर खेल रही कांग्रेस

शिवदास

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किसान न्याय रैली में दिखा प्रियंका गांधी का हिंदुत्व प्रेम

आज नवरात्रि का चौथा दिन है। मैं व्रत हूं तो मैं मां की स्तुति से शुरू करना चाहती हूं। या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:, सर्व मंगल मांगलेय शिवे सर्वार्थ साधिके, शरनेय त्र्यम्बके गौरी नारायणी नमोस्तुते। मेरे साथ कहिए-जय माता दी…जय माता दी…जय माता दी।’

ये कांग्रेस महासचिव और उत्तर प्रदेश की प्रभारी प्रियंका गांधी वाड्रा के शब्द हैं। उन्होंने गत 10 अक्टूबर को बनारस में ‘किसान न्याय रैली’ में इन्हीं शब्दों के साथ अपनी पार्टी के चुनावी अभियान-2022 का शंखनाद किया है। उत्तर प्रदेश में करीब तीन दशक से सत्ता का वनवास काट रही कांग्रेस इस रैली में सीधे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भाजपा के राजनीतिक पिच ‘हिन्दुत्व’ पर खेलती नज़र आई। क्या कांग्रेस आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अपने मूल स्वरूप में लौट कर भाजपा के ‘हिन्दुत्व’ एजेंडा पर ही उसे मात देने की कोशिश करेगी? यह सवाल रैली में मौजूद और उत्तर प्रदेश (खासकर पूर्वांचल) की राजनीति को करीब से समझने और देखने वाले बुद्धिजीवियों के बीच अब चर्चा का विषय बन चुका है। ऐसा होने के पीछे वाजिब वजहें भी हैं।

वाराणसी आरएसएस और भाजपा का चुनावी चेहरा बन चुके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र है। इसके तहत आने वाले रोहनिया विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र के जगतपुर इंटर कॉलेज खेल मैदान में प्रदेश कांग्रेस ने यह ‘किसान न्याय रैली’ आयोजित की थी। कांग्रेस के लिए इसका ऐतिहासिक महत्व भी है। वाराणसी के वरिष्ठ पत्रकार असद कमाल लारी बताते हैं, “आज से करीब बीस साल पहले तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने जगतपुर इंटर कॉलेज के खेल मैदान में कांग्रेस कार्यकर्ताओं के सम्मेलन को भी संबोधित किया था। उन्होंने वहां एक पौधा भी लगाया था। उस समय केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राजग (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंठन) सरकार थी। बाद में हुए लोकसभा चुनावों में भाजपा की हार हुई थी और कांग्रेस की अगुआई वाली यूपीए (संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन) सरकार केंद्र में आई थी। वाराणसी लोकसभा सीट भी कांग्रेस ने जीती थी और राजेश मिश्रा सांसद बने थे।“

बनारस शहर से महज सात किलोमीटर दूर आयोजित इस रैली में पहुंचने से पहले प्रियंका गांधी ने काशी विश्वनाथ मंदिर के दरबार में माथा टेका और दर्शन-पूजन किया। इसके बाद उन्होंने मां दुर्गा के मंदिर में उनकी आराधना की और माता अन्नपूर्णा के दरबार में भी हाजिरी लगाई। इससे जुड़ी हुई तस्वीरें और वीडियो बड़े पैमाने पर मीडिया में प्रसारित की गईं।

जातिगत वर्गीय चरित्र के मामले में भी कांग्रेस ‘किसान न्याय रैली’ में अपने पुराने चरित्र या यूं कहें कि आरएसएस की नीतिगत स्वरूप में प्रभावी दिखी। प्रियंका गांधी के पहुंचने पर पूरे मंच का नियंत्रण उच्च वर्गीय नेताओं, खासकर ब्राह्मण नेताओं, के हाथों में चला गया। इसका असर ऐसा रहा कि उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय कुमार ‘लल्लू’ और उनकी टीम मंच पर कमजोर नज़र आई। कई मौकों पर अजय कुमार ‘लल्लू’ खुद उपेक्षा का शिकार होते नजर आए।

माथे पर चंदन का ललाट, बीच में बड़ा टीका और दाहिने हाथ में कलेवा पहनी कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी बतौर मुख्य अतिथि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र में आयोजित पार्टी की ‘किसान न्याय रैली’ में पहुंची। इस मौके पर मंचासीन कांग्रेस नेताओं और वहां मौजूद भीड़ ने बनारसी अंदाज में ‘हर-हर महादेव’ के नारे से उनका स्वागत किया। इतना ही नहीं, स्थानीय कांग्रेस जिला इकाई ने उन्हें मां दुर्गा के अवतार के रूप में पेश भी कर दिया। पूर्व सांसद और कांग्रेस की ‘इलेक्शन स्ट्रैटजी ऐंड प्लानिंग कमेटी’ के चेयरमैन राजेश मिश्रा ने प्रियंका गांधी को मां दुर्गा का मुकुट पहनाया तो पूर्व विधायक अजय राय ने उन्हें तलवार भेंट कर दुर्गा के रूप में स्थापित करने की कोशिश की। हालांकि कांग्रेस महासचिव खुद को मां दुर्गा के भक्त रूप में पेश कीं। उन्होंने मां दुर्गा की स्तुति से अपने भाषण की शुरुआत की। रैली में पहुंचे लोगों को वह यह बताना नहीं भूलीं कि वह ब्राह्मण जनित ‘हिन्दुत्व’ संस्कृति के तहत हिन्दू हैं और नवरात्रि का व्रत रखती हैं। उन्होंने इसे सिद्ध करने के लिए मंच से मां दुर्गा की स्तुति गान किया और जय माता दी के नारे लगाए।

तलवार देते पूर्व विधायक अजय राय , पूर्व सांसद राजेश मिश्रा , कॉंग्रेस विधायक दल की नेता आराधना मिश्रा मोना। पीछे खड़े हैं प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू

सभा स्थल पर कथित ‘धर्मनिरपेक्ष और जातिविहीन कांग्रेस’ की प्रदर्शनी के बीच महासचिव प्रियंका गांधी के भाषण में आरएसएस की ‘हिन्दुत्व’ संस्कृति और नीति का प्रभाव दिखा। यहां तक कि कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल भी भाजपा के ‘हिन्दुत्व’ के एजेंडे को मजबूती देते नज़र आए। वे अपने भाषण से पहले बाबा विश्वनाथ की जय…दुर्गा मैया की जय और अन्नमूर्णा मैया की जय का नारा लगाने से नहीं चूके। भूपेश बघेल उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के चुनाव प्रभारी भी हैं।

जातिगत वर्गीय चरित्र के मामले में भी कांग्रेस ‘किसान न्याय रैली’ में अपने पुराने चरित्र या यूं कहें कि आरएसएस की नीतिगत स्वरूप में प्रभावी दिखी। प्रियंका गांधी के पहुंचने पर पूरे मंच का नियंत्रण उच्च वर्गीय नेताओं, खासकर ब्राह्मण नेताओं, के हाथों में चला गया। इसका असर ऐसा रहा कि उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय कुमार ‘लल्लू’ और उनकी टीम मंच पर कमजोर नज़र आई। कई मौकों पर अजय कुमार ‘लल्लू’ खुद उपेक्षा का शिकार होते नजर आए। ‘किसान न्याय रैली’ के आयोजन से पूर्व उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी में उपेक्षित चल रहे कांग्रेस नेता और वाराणसी के पूर्व सांसद राजेश मिश्रा मंच पर उभरकर सामने आए। औपचारिकता स्वरूप कांग्रेस की जिला इकाई के जिलाध्यक्ष राजेश्वर सिंह पटेल और महानगर अध्यक्ष राघवेंद्र चौबे ने अंगवस्त्र भेंट कर कांग्रेस महासचिव का स्वागत जरूर किया लेकिन वे उनके करीबियों में दिखाई नहीं दिए। अगर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय कुमार ‘लल्लू’ और पूर्व विधायक अजय राय को छोड़ दें तो उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी का कोई प्रदेश स्तरीय नेता कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी की कुर्सी के पास फटक भी नहीं पाया और ना ही बात कर सका। मंच के संचालन की भी कमान छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के करीबी और कांग्रेस नेता राजेश तिवारी के हाथों में रही।

प्रियंका गांधी और भूपेश बघेल ने अपने भाषणों की शुरुआत में ब्राह्मण जनित और आरएसएस द्वारा प्रचारित ‘हिन्दुत्व’ संस्कृति के उद्गारों से यह संकेत दे दिया कि कांग्रेस उत्तर प्रदेश में आगामी चुनावों में भाजपा को इसी अंदाज में मात देगी। इसके पीछे उसका चुनावी गणित भी दिखाई दिया। मंच पर प्रियंका गांधी की मौजूदगी के बीच कुछ जाति विशेष के प्रतिनिधियों के नियंत्रण से ये साफ संकेत मिल रहा था कि कांग्रेस फिर से अपने मूल वोटरों और समर्थकों की ओर रुख करने का मन बना चुकी है। ब्राह्मणों की अगुआई वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की राजनीतिक पार्टी ‘भाजपा’ के मजबूत होने के बाद उस जाति विशेष का अधिकांश हिस्सा कांग्रेस से अलग होकर उसकी ओर चला गया है। ‘किसान न्याय रैली’ में यह साफ दिखा कि कांग्रेस सत्ता में आने के लिए फिर से उसी लकीर को पकड़ रही है और इससे ही वह भाजपा को सत्ता से बेदखल करने का सपना भी देख रही है। भाजपा ने सत्ता के लिए ‘हिन्दुत्व’ संस्कृति की राजधानी काशी यानी बनारस को ही अपनी राजनीति का अखाड़ा बनाया था और कांग्रेस भी यही से दांव लगा रही है। उसका यह दांव कितना कारगर होगा? इसका आकलन करना अभी जल्दबाजी होगी लेकिन उसके चुनावी गणित का विश्लेषण जरूर किया जा सकता है जो आगामी विधानसभा चुनावों में भाजपा समेत विपक्षी पार्टियों के लिए चिंता का विषय बन सकता सकता है।

प्रियंका गांधी और भूपेश बघेल ने अपने भाषणों की शुरुआत में ब्राह्मण जनित और आरएसएस द्वारा प्रचारित ‘हिन्दुत्व’ संस्कृति के उद्गारों से यह संकेत दे दिया कि कांग्रेस उत्तर प्रदेश में आगामी चुनावों में भाजपा को इसी अंदाज में मात देगी। इसके पीछे उसका चुनावी गणित भी दिखाई दिया। मंच पर प्रियंका गांधी की मौजूदगी के बीच कुछ जाति विशेष के प्रतिनिधियों के नियंत्रण से ये साफ संकेत मिल रहा था कि कांग्रेस फिर से अपने मूल वोटरों और समर्थकों की ओर रुख करने का मन बना चुकी है।

 

प्रियंका गांधी के भाषणों में ‘भाजपा का चुनावी गणित’

कांग्रेस महासचिव और उत्तर प्रदेश की प्रभारी प्रियंका गांधी वाड्रा ने ‘किसान न्याय रैली’ में आरएसएस नीत भाजपा की ‘हिन्दुत्व’ संस्कृति के साथ-साथ उसकी जातिगत नीति का प्रमोशन भी बखूबी किया। हत्या, उत्पीड़न और बलात्कार के मामले में प्रियंका गांधी के भाषणों में भाजपा का मूल वोट बैंक ही निशाने पर रहा। उन्होंने सोनभद्र के उम्भा में हुए गोंड आदिवासियों के नरसंहार का जिक्र किया तो उन्नाव और हाथरस में दलित परिवार की लड़कियों के साथ हुए बलात्कार और उनकी हत्या का। इन घटनाओं के जरिए कांग्रेस आदिवासियों, दलितों और महिलाओं के उस वोट बैंक को साधने की कोशिश की जो बहुजन समाज पार्टी को छोड़कर पिछले विधानसभा और लोकसभा चुनावों में भाजपा की तरफ शिफ्ट हुआ है। ये वोट बैंक अधिकतर मजदूर और खेतिहर किसान हैं जिनके घरों में दो वक्त की रोटी, कपड़ा और मकान के लिए ही संघर्ष ज्यादा रहता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अनुषांगिक संगठनों की मदद से भाजपा भी इस समय इन्हीं मतदाताओं को साधने में लगी है।

अगर पिछड़ी जातियों के लोगों की हत्या, उत्पीड़न और बलात्कार की घटनाओं के मामले में बात करें तो कांग्रेस महासचिव ने अपने भाषण में केवल मल्लाह जाति का जिक्र किया जिसके वोट बैंक को साधने के लिए भाजपा भी बड़े पैमाने पर कोशिश कर रही है। इसके लिए उसने निषाद पार्टी के संजय निषाद अपने साथ ले लिया है। अन्य पिछड़ा वर्ग में आने वाली जातियों के लोगों की हत्या, उत्पीड़न और बलात्कार के मामले में भाजपा नेताओं की तरह कांग्रेस महासचिव भी चुप्पी साधे रहीं।

प्रियंका गांधी और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल

लखीमपुरी खिरी में हुई चार किसानों समेत छह लोगों की हत्या और दिल्ली की सीमाओं पर चल रहे किसान आंदोलन के बहाने कांग्रेस और उसके समर्थक बुद्धिजीवी यह बात जरूर कह सकते हैं कि प्रियंका गांधी ने अपने भाषण में किसानों की हत्या और उनके उत्पीड़न का जिक्र किया था जिसमें पिछड़े वर्ग की अधिकत जातियां शामिल हैं! अगर वर्तमान किसान आंदोलन को छोड़ दें तो भाजपा भी ऐसे ही किसानों की हित की बात कहकर अन्य पिछड़ी जातियों को लुभाती रही है। सत्ता में आने के बाद उसने सबसे ज्यादा अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल जातियों के लोगों का उत्पीड़न किया है और उनके हकों पर डाका डाला है। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार में सबसे ज्यादा हत्याएं, उत्पीड़न और बलात्कार की घटनाएं अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल जातियों के लोगों के साथ हुई हैं। पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकारों का चरित्र भी ऐसा ही रहा है। अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण और भागीदारी के सवाल पर दोनों ही राजनीतिक पार्टियां फिसड्डी रही हैं। अभी भी कांग्रेस के एजेंडे में अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों की भागीदारी का सवाल शामिल नहीं है।

अगर मुसलमानों की हत्या और उनके उत्पीड़न के सवाल पर बात करें तो कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने अपने भाषण में मुस्लिम समुदाय का जिक्र तक नहीं किया। बनारस में बुनकरी पेशा अपने सबसे बुरे दौरे से गुजर रही है। इसमें मुसलमानों की बहुतायत आबादी लगी हुई है लेकिन प्रियंका गांधी ने अपने भाषण में बुनकर शब्द का जिक्र करना मुनासिब नहीं समझा। ऐसा नहीं है कि इस पेशे में हिन्दू समुदाय के लोग नहीं हैं। ग्रामीण इलाकों में हिन्दू परिवार बड़े पैमाने पर बुनकरी का काम करता है लेकिन कांग्रेस महासचिव के भाषण में एक बार भी इसका जिक्र नहीं आया। यहां तक कि मंच पर मौजूद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और मेनिफेस्टो कमेटी के अध्यक्ष सलमान खुर्शीद और नसीमुद्दीन सिद्दीकी तक को बोलने का मौका नहीं दिया गया। यूं कहें कि आरएसएस और भाजपा की तरह ही कांग्रेस भी आगामी चुनावों में ‘हिन्दुत्व’ के एजेंडे पर बैटिंग करने का मन बना चुकी है। जिस तरह से भाजपा औपचारिकता के लिए ‘अल्पसंख्यक’ शब्द का इस्तेमाल कर राष्ट्रीय एकीकरण का छद्य अभियान चलाती है, उसी तरह कांग्रेस भी चुनावी मैदान में उतरने जा रही है क्योंकि प्रियंका गांधी ने अपने करीब आधा घंटा के भाषण में केवल एक बार ‘अल्पसंख्यक’ शब्द का इस्तेमाल किया। कांग्रेस की जातिगत गणित और चुनावी एजेंडे की झलक कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी के भाषण का इस अंश में बखूबी दिखता हैः-

“इस देश में सिर्फ दो तरह के लोग सुरक्षित हैं आज। एक जो भाजपा का सत्ताधारी नेता है वो और दूसरा जो उसका खरबपति मित्र है। सिर्फ दो तरह के लोग सुरक्षित हैं। इस देश में कोई धर्म का व्यक्ति सुरक्षित नहीं है, किसी भी जाति का व्यक्ति सुरक्षित नहीं है। इस देश में ना मजदूर सुरक्षित है और ना मल्लाह सुरक्षित है, ना निषाद सुरक्षित है, ना दलित सुरक्षित है, ना गरीब सुरक्षित है, ना अल्पसंख्यक सुरक्षित है, ना मेरी महिला बहनें सुरक्षित हैं। इस देश में सिर्फ प्रधानमंत्री, उनके मंत्रिमंडल के लोग, उनकी पार्टी के लोग जो सत्ता में हैं, वो सुरक्षित हैं और उनके जितने भी खरबपति मित्र हैं, वो सुरक्षित हैं।

इसे और मजबूती देने के लिए वह आगे कहती हैं, कांग्रेस के जितने भी कार्यकर्ता यहां हैं, किसी से नहीं डरते हैं, किसी से नहीं डरते हैं हम, हमें जेल में डालिए, हमें मारिए, हमें कुछ भी कर लीजिए, हम लड़ते रहेंगे, हम लड़ते रहेंगे, हम लड़ते रहेंगे जब तक वो गृहमंत्री आपका इस्तीफा नहीं देगा, तब तक हम लड़ते रहेंगे, हम हिलेंगे नहीं, हम हटेंगे नहीं। हम कांग्रेस के कार्यकर्ता हैं, हमारी पार्टी ने इस देश की आजादी की लड़ाई लड़ी है, हमें कोई चुप नहीं कर सकता। हमें कोई नहीं रोक सकता।

 

कांग्रेस महासचिव ने दलितों और आदिवासियों की हत्या, बलात्कार और उत्पीड़न का जिक्र बड़े पैमाने पर किया लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि उन घटनाओं को अंजाम देने वाले लोगों और उनका संरक्षण करने वाले लोग किन जातियों के हैं? दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों की हुई हत्याओं, बलात्कार और उत्पीड़न के अधिकतर मामलों में ऊंची जातियों के लोग शामिल हैं और उन्हें संरक्षण भी ऊंची जातियों के लोग दे रहे हैं जो भाजपा का मूल वोट बैंक है। कांग्रेस भी इन्हीं वोट बैंक पर मजबूती से काम कर रही है जिसकी झलक रैली में मंच पर साफ दिखाई दी। प्रियंका गांधी के करीबी दिखने वालों में सवर्ण जातियों के नेताओं का बोलबाला रहा। अगर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार ‘लल्लू’ और सांसद दीपेंद्र सिंह हुड्डा को छोड़ दें तो कोई भी पिछड़े या दलित वर्ग का नेता मंच पर प्रियंका गांधी के करीब दिखाई नहीं दिया। कार्यक्रम के दौरान कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के प्रतिनिधि और कांग्रस सचिव राजेश तिवारी, पूर्व सांसद राजेश मिश्रा, पूर्व विधायक अजय राय, कांग्रस विधायक दल की नेता आराधना मिश्रा ‘मोना’ आदि से घिरी रहीं। उत्तर प्रदेश में ‘किसान न्याय रैली’ तक कांग्रेस को पहुंचाने वाले प्रदेश स्तरीय रणनीतिकार और नेता प्रियंका गांधी के करीब तक पहुंच ही नहीं पाए। यूं कहें कि प्रियंका गांधी के निजी सचिव संदीप सिंह की टीम कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के आगे उपेक्षित रही। इनमें कांग्रेस संगठन सचिव अनिल यादव, उत्तर प्रदेश अल्पसंख्यक विभाग के चेयरमैन शाहनवाज आलम, प्रदेश महासचिव और उत्तर प्रदेश पिछड़ा वर्ग विभाग के कार्यकारी अध्यक्ष मनोज यादव, प्रदेश महासचिव सरिता पटेल आदि का नाम शामिल है। यहां तक कि प्रियंका गांधी ने अपने उद्बोधन में इन नेताओं का नाम भी नहीं लिया। उन्होंने उम्भा कांड का जिक्र तो किया लेकिन उसके पीड़ितों में शामिल राम राज गोंड के नाम का जिक्र करना भी मुनासिब नहीं समझा जबकि वह सोनभद्र के जिला कांग्रेस इकाई के अध्यक्ष हैं और आदिवासी समाज से आते हैं।

प्रियंका गांधी ने अपने उद्बोधन में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार ‘लल्लू’, कांग्रेस विधायक दल की नेता आराधना मिश्रा ‘मोना’, हरियाणा से सांसद दीपेंद्र हुडा, पूर्व राज्यसभा सांसद एवं विधायक प्रमोद तिवारी, पूर्व विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद, पूर्व राज्यसभा सांसद और कांग्रेस इलेक्शन कंपैन कमेटी के चेयरमैन पीएल पुनिया, पूर्व सांसद राजेश मिश्रा, पूर्व विधायक अजय राय, कांग्रेस अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के चेयरमैन इमरान प्रतापगढ़ी, पूर्व विधायक प्रदीप माथुर, विवेक बंशल, प्रदीप जैन आदित्या, एमएलसी दीपक सिंह, पूर्व सांसद जितेंदर सिंह, कांग्रेस अनुसूचित जाति विभाग के चेयरमैन कमल किशोर कमांडो, किशोरी लाल शर्मा, मोहम्मद मुकीम, नदीम जावेद, उत्तर प्रदेश कांग्रेस के महासचिव राकेश सचान, कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत्र, विधायक सोहेल अंसारी, पूर्व विधायक जफर अली नकवी, पंकज मलिक, कांग्रेस सचिव बृजलाल खाबरी, अनुग्रह नारायण सिंह का ही नाम लिया।

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के चुनावी अभियान के रूप में आयोजित हुई ‘किसान न्याय रैली’ के दौरान प्रियंका गांधी के पूरे भाषण का विश्लेषण करने पर यह साफ है कि कांग्रेस वोट बैंक की जातिगत गणित के मामले में मूल रूप से सवर्ण जातियों, गैर-जाटव जातियों और आदिवासियों पर केंद्रित हो रही है जिसके बल पर भाजपा पुनः सत्ता में आना चाहती है। इसलिए प्रियंका गांधी ‘किसान न्याय रैली’ में भाजपा और उसकी सरकारों को सबसे ज्यादा आड़े-हाथों लिया। वह कहती हैं, “हमारे देश में कोई कुचला जाता है, किसी के प्रति हिंसा होती है, किसी पर अत्याचार होता है और उसको न्याय मिलने की उम्मीद नहीं होती तो किसके पास जाएगा? अगर सरकार, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री, गृह राज्य मंत्री, विधायक, सभी मिले हुए हैं, सभी अपनी पीठ मोड़ देते हैं उनकी तरफ तो किसके पास जाए जनता और क्या करे?”

भाजपा के ‘राष्ट्रवाद’ की तरह प्रियंका गांधी भी रैली में शामिल लोगों को ‘देशभक्ति’ का पाठ पढ़ाती हैं। वह कहती हैं, “चुनाव की बात नहीं है अब। अब देश की बात है। ये देश भाजपा के पदाधिकारियों, उनके मंत्रियों, उनके प्रधानमंत्रियों की जागीर नहीं है। ये देश आपका देश है। आपका देश है। इस देश को कौन बचाएगा? कौन बचाएगा इस देश को? आप जागरूक नहीं बनेंगे, समझदार नहीं बनेंगे, आप इनकी राजनीति में उलझे रहेंगे। ना आप अपने देश को बचा पाएंगे और ना अपने आपको बचा पाएंगे।

इसे और मजबूती देने के लिए वह आगे कहती हैं, “कांग्रेस के जितने भी कार्यकर्ता यहां हैं, किसी से नहीं डरते हैं, किसी से नहीं डरते हैं हम, हमें जेल में डालिए, हमें मारिए, हमें कुछ भी कर लीजिए, हम लड़ते रहेंगे, हम लड़ते रहेंगे, हम लड़ते रहेंगे जब तक वो गृहमंत्री आपका इस्तीफा नहीं देगा, तब तक हम लड़ते रहेंगे, हम हिलेंगे नहीं, हम हटेंगे नहीं। हम कांग्रेस के कार्यकर्ता हैं, हमारी पार्टी ने इस देश की आजादी की लड़ाई लड़ी है, हमें कोई चुप नहीं कर सकता। हमें कोई नहीं रोक सकता।

उत्तर प्रदेश की प्रभारी प्रियंका गांधी और चुनाव प्रभारी भूपेश बघेल ने ‘किसान न्याय रैली’ में अपने भाषणों से यह संकेत दे दिया कि प्रदेश कांग्रेस आगामी विधानसभा चुनावों को भाजपा के धार्मिक एवं जातिगत एजेंडे पर ही उसे मात देगी। उसकी यह रणनीति कितना कारगर होगी, यह चुनावों के बाद ही साफ हो पाएगा लेकिन उसकी यह रणनीति भाजपा के साथ-साथ सपा और बसपा को संकट में जरूर डाल सकती है।

लेकिन, प्रियंका गांधी सत्ता और सरकारी तंत्र में आदिवासियों, दलितों, पिछड़ों और किसानों की भागीदारी के सवाल यानी आरक्षण पर जुबान तक नहीं खोलती हैं। महिलाओं के आरक्षण के मामले में कांग्रेस ने पार्टी के टिकट बंटवारे में 40 प्रतिशत टिकट देने का एलान पिछले दिनों किया लेकिन इसमें आदिवासियों, दलितों और पिछड़ों की भागीदारी कितनी होगी, यह उन्होंने नहीं बताया। उनका यह एलान और नीति ठीक उसी तरह से जैसे आरएसएस के प्रभाव वाली भाजपा की नीति है। किसानों और महिलाओं के नाम पर आदिवासियों, दलितों और पिछड़ों को गुमराह कर उनका वोट लेना लेकिन सत्ता और सरकारी तंत्र में भागीदारी नहीं देना। ठीक यही रणनीति ‘अल्पसंख्यक’ के मामले में भी है। सत्ता और सरकारी तंत्र में पसमांदा मुसलमानों के मामले में भाजपा की तरह कांग्रेस कोई चर्चा नहीं कर रही है। प्रियंका गांधी की अगुआई में उत्तर प्रदेश कांग्रेस भाजपा की रणनीति की तरह मुख्यधारा की मीडिया के प्रोपेगैंडा का हिस्सा बनकर सामने आ रही है। बनारस में पिछले दिनों हुई कांग्रेस की ‘किसान न्याय रैली’ में कांग्रेस महासिचव उन्हीं घटनाओं का जिक्र कीं जो पहले सोशल मीडिया और मुख्यधारा की मीडिया में प्रमुखता से रिपोर्ट हुईं। उसी रिपोर्ट के आधार पर उन्होंने और उनकी पार्टी ने उसे उठाया लेकिन उत्तर प्रदेश की योगी सरकार के दौरान हजारों आदिवासियों, दलितों, पिछड़ों और मुसलमानों की हत्या की घटनाएं हुईं जो ना ही वह मुख्यधारा की मीडिया की खबरें बनीं और ना ही उन्हें सोशल मीडिया की राष्ट्रीय स्तर की वेबसाइटों ने जगह दी। इन मामलों में कांग्रेस भी फिसड्डी रही। इनमें अधिकतर मामले मुसलमानों और पिछड़ों से जुड़े हुए हैं। यूं कहें कि मुख्यधारा की मीडिया की तरह कांग्रेस भी मुद्दों को एक एजेंडे की तरह उठा रही है। ठीक वैसे ही जैसे सत्ताधारी भाजपा सत्ता में रहने के दौरान एक रणनीति के तहत लोगों के सामने उछाल रही है।

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के चुनाव प्रभारी और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के उद्बोधन और भाषण में भी इसका प्रभाव दिखा। उन्होंने भी भाजपा के ‘हिन्दुत्व’ के एजेंडे को मजबूती देते हुए पहले बाबा विश्वनाथ की जय…दुर्गा मैया की जय और अन्नमूर्णा मैया की जय का नारा लगाया। अगर पंडित जवाहर लाल नेहरू और कबीर के नामों को छोड़ दें तो भाजपा की तरह ही उन्होंने भी आरएसएस के ‘हिन्दुत्व’ एजेंडे की लकीर खींची। उन्होंने बनारस की गंगा-जमुनी तहजीब की तरह कबीर के साथ जिक्र होने वाले नज़ीर बनारसी के बारे में कोई बात नहीं की। उस्ताद बिस्मिल्लाह खान भी उनके और प्रियंका गांधी के भाषणों में गायब रहे। भूपेश बघेल ने कृष्ण, राम, भोले, तुलसी और कबीर के नामों का जिक्र तो किया लेकिन गौतम बुद्ध का नाम उनकी जुबां पर नहीं चढ़ सका जबकि सारनाथ का महत्व बुद्ध की वजह से ही है।

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री कहते हैं, “जब-जब समाज में सवाल खड़ा किए गए, तब तब बाबा विश्वनाथ की नगरी में जबाव मिला था। पंडित जवाहर लाल नेहरू, महात्मा गांधी और सरदार बल्लभ भाई पटेल के नेतृत्व में अंग्रेजों को जवाब मिला था। उत्तर प्रदेश जहां सभी प्रश्नों के उत्तर मिलते हैं। ये नगरी बाबा विश्वनाथ की नगरी है। भोलेनाथ की नगरी में पूरे विश्व के लोग अपने सवालों का जवाब मांगने आते थे।

उन्होंने भी सबसे ज्यादा हमला भाजपा और उनकी सरकारों पर ही बोला। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बारे में उन्होंने कहा, मैंने सुना था कि साधु-संत किसी से नहीं डरते लेकिन ये योगी बड़ा डरपोक निकला। ये योगी है, बड़ा डरपोक निकला। वो हमारे दलितों से डरते हैं। वो हमारे किसानों से डरते हैं। हमारे नौजवानों से डरते हैं और पुलिस को आगे करते हैं। अरे, इतना डरपोक है कि एक महिला प्रियंका गांधी वाड्रा से डर गया, उसे लखीमपुर तक जाने नहीं दिया, चार-चार दिन तक जेल में बंद करके रखा। इतना बड़ा डरपोक उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री होगा, मैं नहीं जानता था।

उत्तर प्रदेश की प्रभारी प्रियंका गांधी और चुनाव प्रभारी भूपेश बघेल ने ‘किसान न्याय रैली’ में अपने भाषणों से यह संकेत दे दिया कि प्रदेश कांग्रेस आगामी विधानसभा चुनावों को भाजपा के धार्मिक एवं जातिगत एजेंडे पर ही उसे मात देगी। उसकी यह रणनीति कितना कारगर होगी, यह चुनावों के बाद ही साफ हो पाएगा लेकिन उसकी यह रणनीति भाजपा के साथ-साथ सपा और बसपा को संकट में जरूर डाल सकती है।

लाल बहादुर शास्त्री और पंडित कमलापति त्रिपाठी को नहीं किया याद

बनारस में आयोजित ‘किसान न्याय रैली’ में कांग्रेस ने हरित और सफेद क्रांति के अग्रजों में शुमार पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री और पूर्व मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी को याद तक नहीं किया। कांग्रेस महासचिव और उत्तर प्रदेश की प्रभारी प्रियंका गांधी वाड्रा और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कांग्रेस के दोनों ऐतिहासिक नेताओं का नाम लेना मुनासिब नहीं समझा। देश के दूसरे प्रधानमंत्री के रूप में हरित क्रांत और सफेद क्रांति परवान चढ़ाने वाले लाल बहादुर शास्त्री बनारस के रामनगर के निवासी थे और उन्होंने पहली बार ‘जय जवान-जय किसान’ का नारा दिया था। पंडित कमलापति त्रिपाठी उत्तर प्रदेश के सातवें मुख्यमंत्री थे और वाराणसी के मूल बाशिंदे थे। अपने दौर के कांग्रेस के दिग्गज नेताओं में शुमार त्रिपाठी वाराणसी और आस-पास के जिलों में अपने कार्यों के लिए पहचाने जाते हैं। उनका परिवार विपरीत परिस्थितयों में भी कांग्रेस के साथ रहा लेकिन पिछले दिनों उनके परपोते एवं पूर्व विधायक ललितेशपति त्रिपाठी ने कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता समेत सभी पदों से इस्तीफा दे दिया था। उनके परिवार का कोई भी सदस्य कांग्रेस की ‘किसान न्याय रैली’ में दिखाई नहीं दिया। खबर है कि ललितेशपति त्रिपाठी उत्तर प्रदेश में अखिल भारतीय त्रिणमूल कांग्रेस को स्थापित करने की पहल करने वाले हैं।

शिवदास जाने-माने स्वतंत्र युवा पत्रकार हैं। 

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