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ग्राउंड रिपोर्ट

आखिर इतने तमतमे वाले नरेंद्र मोदी को क्यों संघ मुख्यालय जाना पड़ा

प्रधानमन्त्री बनने के लगभग 12 साल बाद नागपुर के संघ कार्यालय में मोदी पहुंचना, ताक़त का प्रदर्शन तो नहीं है? जबकि भाजपा ने स्वयं को सक्षम  घोषित कर दिया था, फिर ऐसा क्या हुआ कि पहले नड्डा और अब मोदी खुद नागपुर पहुंच गए।

राजनीतिक गलियारों में खूब चर्चा है कि नागपुर में संघ के मुख्यालय पर,पहले जेपी नड्डा और फिर खुद प्रधानमंत्री मोदी को क्यों जाना पड़ा? क्या इस यात्रा को किसी कमजोरी का लक्षण समझा जाए या सिर्फ इसे एक आम और औपचारिक भेंट-मुलाकात की तरह देखा जाए। यह भी कि पर्याप्त देरी होने के बावजूद भाजपा अपना अध्यक्ष क्यों नही चुन पा रही है?  2024 के बाद से लगातार बयानों के जरिए संघ-भाजपा के बीच कतल्खी बनी हुई क्यों लग रही है?। ऐसे ही अनेक सवाल राजनीतिक दायरे में चर्चा-ए-आम है।
सवाल उठता है कि जब कुछ ही दिन पहले जेपी नड्डा ने संघ की जरूरत से साफ इंकार किया था, ऐसे में लगभग 12 साल बाद नागपुर के संघ कार्यालय में मोदी पहुंचना, ताक़त का प्रदर्शन तो नहीं है? जबकि भाजपा ने स्वयं को सक्षम  घोषित कार दिया था, फिर ऐसा क्या हुआ कि पहले नड्डा और अब मोदी खुद नागपुर पहुंच गए।
2024 लोकसभा चुनाव के बाद जब मोहन भागवत ने मोदी को केंद्रित कार निशाना साधते हुए कहा था कि राजा को अहंकारी नही होना चाहिए साथ ही मणिपुर की ओर इशारा करके भी कहा कि अशांति के साथ विकास संभव नही है।
संघ के प्रमुख नेता इंद्रेश कुमार ने भी मोदी के लिए तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि राम भक्त को अहंकार हो गया था, इसलिए लोकसभा चुनाव में भाजपा 240 सीटों पर ही सिमट गई।
संघ के अंग्रेजी मुखपत्र आर्गनाइजर में प्रकाशित आलेख में भी कहा गया कि अति आत्मविश्वास ने लोकसभा चुनाव में भाजपा को संकट में डाला।
हार की एक और प्रमुख वजह यह भी बताई गई कि भाजपा के स्थानीय नेताओं ने अपने वैचारिक सहयोगियों (यानि संघ) से संपर्क तक नही किया।
आर्गनाइजर के जरिए मोदी को संबोधित करते हुए यहां तक कहा गया कि शिवसेना-भाजपा गठबंधन तोड़ने की क्या ज़रूरत थी। ऐसे अनैतिक तोड़-फोड़ से बचा जा सकता था पर ऐसा क्यों नहीं किया गया।
यह कोई सामान्य बात नहीं है कि लोकसभा चुनाव के बाद संघ द्वारा मोदी की बार-बार तीखी आलोचनाओं के बावजूद मोदी को चुप रहना पड़ा, उनके सहयोगी नड्डा या अमित शाह भी  अभी तक संघ को कोई जबाब देते नज़र नहीं आए।
एक तरफ जिस तरह की कार्यशैली मोदी की रही है, उसे देखते हुए तो साफ़ पता चलता है कि 2024 लोकसभा चुनाव के बाद शक्ति संतुलन में बड़ा बदलाव आया है और संघ का पलड़ा भारी रहा है। दूसरी तरफ मोदी-शाह की जोड़ी कमजोर हुई है। यही वज़ह है कि भाजपा अपना नया अध्यक्ष भी चुन नही पा रही है। बार-बार जेपी नड्डा का कार्यकाल बढ़ाना पड़ रहा है
जबकि 2014 के बाद और 2024 के पहले ऐसा नहीं था। मोदी जिसको चाहे पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनवाते रहे लेकिन  आज़ जिस तरह के जद्दोजहद में नरेंद्र मोदी फंसे हुए हैं, ऐसा तो उनके पूरे कार्यकाल में बिल्कुल भी नहीं रहा है।
2029 में भाजपा की तरफ से प्रधानमंत्री का उम्मीदवार कौन होगा, इस वजह से भी भाजपा के पार्टी अध्यक्ष का चुनाव उलझा हुआ है क्योंकि यह निर्भर करेगा कि भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष कौन होने जा रहा है।
 शक्ति संतुलन में बदलाव के चलते नरेंद्र मोदी की पसंद प्राथमिक नहीं रह गई है, संघ की बात भी सुननी पड़ रही है, जेपी नड्डा को नागपुर भेजना पड़ रहा है। खुद मोदी को नागपुर जाकर अपने गुरुओं को नमन करना पड़ रहा है। कल तक जिस संघ की जरूरत को ही ख़ारिज किया जा रहा था, उसी संघ की अब भूरि-भूरि प्रशंसा करनी पड़ रही है।
नरेंद्र मोदी का संघ के प्रति आज़ जो रवैया दिख रहा है, वह तमाम विश्लेषकों को हैरत में डालने वाला है। अपने शुरुआती दिनों से ही मोदी का रवैया बेहद सर्वसत्तावादी रहा है। बिल्कुल भी भिन्नता बर्दाश्त नहीं करने वाले शख्स रहे हैं। अपने विरोधियों से शत्रुवत व्यवहार के लिए कुख्यात रहे हैं और उनसे बेहद अधिनायकवादी तरीके से निपटते रहे हैं।
यह सिलसिला गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए ही शुरू ही चुका था। मुख्यमंत्री रहते हुए मोदी ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को गुजरात में लगभग हाशिए पर डाल दिया था।
संघ की दिशा और मोदी की कार्यशैली गुजरात के समय भी बार-बार टकराती इस पर अलग से अध्ययन की जरूरत है। जब गुजरात में भाजपा ताकतवर हो रही थी, ठीक उसी समय वहां पर आरएसएस कमजोर क्यों पड़ती जा रही थी या विहिप हाशिए की ओर क्यों बढ़ती जा रही थी?
यहाँ तक कि भाजपा के अंदर संघ के दर्जनों स्थापित नेतृत्व को भी हर तरह के हथकंडे अपना कर किनारे किया गया। संजय जोशी भी इसी प्रक्रिया के शिकार हुए। 2014 के बाद दिल्ली की सत्ता मोदी के हाथ में आने के बाद तो यह प्रक्रिया और तेज कर दी गई।
हिंदुत्व के वे सारे एजेंडे जो मूलतः संघ के एजेंडे थे, का नेतृत्व खुद मोदी ने अपने हाथ में लेना शुरू कर दिया। राम मंदिर  हो या  370 हो या फिर समान नागरिक संहिता, ऐसे सारे हिंदुत्व के अन्य ज़रूरी मुद्दों को लेकर केंद्र में धीरे-धीरे संघ की जगह मोदी स्थापित होते गए।
यानि एक तरफ हिंदुत्व के कोर एजेंडे के चैंपियन तो मोदी बनते गए। इस प्रक्रिया में संघ के विराट संगठन के अंदर लाखों स्वयं सेवको की सहानुभूति भी अर्जित की और दूसरी तरफ़ ठीक उसी समय बतौर संगठन संघ को व संघ प्रमुख को अप्रासंगिक बना देने का अभियान भी संचालित करते रहे।
2014 से लेकर 2024 तक चूंकि मोदी के नेतृत्व में भाजपा को अपार समर्थन व लोकप्रियता भी मिलती रही, इसलिए यह सब करना उन्हें आसान भी लगता रहा।
पर यह बात मोदी व उनकी टीम समझ ही नही पायी कि भारत, जर्मनी या इटली नहीं है, यह बेहद विशाल व विविधता भरा देश है। उसकी अगुवाई केवल करिश्माई नेतृत्व के बल पर लंबे समय तक नहीं की जा सकती।
केवल करिश्माई नेतृत्व के बल पर इटली जैसे छोटे देश में भी सर्वसत्तावादी फासिस्ट राजनीति कम अवधि तक ही टिक पायी। भारत जैसे विशाल देश को एक विशाल नेटवर्क वाला संगठन भी चाहिए। इस संदर्भ को संघ ने अपने फासिस्ट परियोजना के लिए ईजाद किया और लंबी अवधि के प्रयास के जरिए इस नेटवर्क को विकसित किया। फिर इस नेटवर्क को करिश्माई नेतृत्व से जोड़कर यहां तक की यात्रा संपन्न की।
लोकसभा चुनाव के पहले तक मोदी व उनकी टीम को शाय़द ये बात समझ में नहीं आ रही थी। पर बीते लोकसभा चुनाव में हिंदुत्व के गढ़ में ही  400 पार का नारा ध्वस्त हुआ और ज़ोर का झटका लगा, तब इसके साथ ही पावर सेंटर भी शिफ्ट हो गया और फिर इसके चलते फिलहाल एक असहाय मोदी का उदय हुआ है। जिस पर जनता का विश्वास कमजोर हुआ है, जिसे संघ ने भी टारगेट करना शुरू किया,  फिर ट्रंप के उदय व उनके हमलावर रुख के चलते मोदी की वैश्विक छवि भी संकट में पड़ गई।
इन सब बदलते संदर्भों के आलोक में ही मोदी को नागपुर की यात्रा करनी पड़ी है। अब देखना यह है कि क्या संघ-भाजपा की राजनीति, नया आकार ग्रहण करने जा रही है या तात्कालिक तौर पर कोई बीच का रास्ता अख़्तियार करेगी।
मनीष शर्मा
मनीष शर्मा
लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं और बनारस में रहते हैं।

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