यहाँ बिखरे थर्माकोल से विचरते हुये बगुलों का भ्रम होता है

वल्लभाचार्य पाण्डेय

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महानंदा एक्सप्रेस 3 घंटे विलम्ब से चल रही थी, सुहाने मौसम के कारण झपकी आ गयी और नींद मोबाइल की रिंगटोन बजने से खुली, बनारस से रायसाहब का फोन था… अरे ! मानसी जंक्शन तो पीछे छूट गया, नींद आने से गन्तव्य स्टेशन पर न उतर पाने का यह मेरे जीवन का पहला अनुभव था। खैर रायसाहब ने बताया कि ट्रेन थोड़ी देर बाद ही महेश खूंट स्टेशन पर रुकेगी वहां से उतर कर वापस मानसी पहुंचा जा सकता है या सहरसा की बस ली जा सकती है। महेश खूंट स्टेशन आने से पहले लगा कि रेलवे लाइन से थोड़ी दूर एक तालाब में बहुत सारे बगुले बैठे हैं, पॉकेट में पड़ा कैमरा जैसे फोटो लेने बेचैन हो उठा हो। स्टेशन से उतर कर हाईवे तक जाने के रास्ते में वह तालाब मिला लेकिन अफ़सोस, ये बगुले नही थे, थर्मोकोल के प्लेट तैर रहे थे जिन्हें दूर से देखने पर मुझे बगुला होने का भ्रम हुआ। स्टेशन से हाईवे के चौराहे तक जाने वाले रास्ते पर पैदल चलना निश्चित रूप से एक दुष्कर कार्य साबित हुआ, कैमरा पॉकेट में ही रखना बेहतर था, महसूस हुआ कि विगत 2 अक्टूबर को पूरे देश को खुले से शौच मुक्ति (ODF) की घोषणा करने में काफी जल्दीबाजी हो गयी… महेश खूंट चौराहे पर सतुई लस्सी का सेवन कर सहरसा जाने वाली बस में बैठ गया।

पशुपालन

मेरा खगड़िया आना कोई 12 साल बाद हुआ था। ग्रामीण इलाके लगभग वैसे ही दिखे जैसे तब थे। देश के तथाकथित विकास की चकाचौंध अभी यहाँ से कोसों से दूर लगी। महेश खूंट (खगड़िया) से सहरसा होते हुए सुपौल तक की सड़क मार्ग से लगभग 80 किलोमीटर की यात्रा में 4 घंटे से अधिक का समय लगना सड़कों की स्थिति को समझने के लिए काफी था, रास्ते में जहाँ कोसी, बागमती और उसकी अन्य धाराएं पास में थीं वहां विगत दिनों आयी बाढ़ के कारण हुयी खेती की तबाही का मंजर स्पष्ट दिख रहा था। एक विशेष बात यह लगी कि यह पूरा क्षेत्र पशुपालन में काफी समृद्ध दिखा, और यही यहाँ की आजीविका का एक प्रमुख साधन भी लगा। ग्रामीण इलाके में भैंस, गाय, बकरी सभी घरों में पाली जाती है लेकिन सड़कों पर छुट्टा पशु कहीं देखने को नही मिले। और हाँ, सीमेंट की नाद 5 फीट व्यास तक की दिखी जिसमे एक साथ 3-4 जानवर भोजन कर ले रहे थे। सामान्य जन-जीवन प्रायः चारा, इंधन, बाढ़-बारिश से क्षतिग्रस्त कच्चे घरों की मरम्मत आदि में व्यस्त दिख रहा था, इन कच्चे घरों के आस-पास अपने उत्तर प्रदेश की तरह रंगे पुते ‘इज्जत घर’ प्रायः नगण्य ही थे।

‘कोसी नव निर्माण मंच’ के साथी क्षेत्र में आन्दोलन के साथ साथ रचना का भी कार्य बखूबी कर रहे हैं इस क्रम में जहाँ स्कूल नही है अथवा शिक्षक नहीं आते हैं, वहां जीवन शाला का संचालन किया जा रहा है, डूबे क्षेत्र में ऐसी 4 जीवन शालायें वर्तमान में चल रही हैं यद्यपि आवश्यकता तो और अधिक की है, लेकिन संसाधन जुटाने की भी बड़ी चुनौती है।

कोसी केवल एक नदी नहीं एक संस्कृति भी है

सुपौल शहर से लगभग 3 किलोमीटर पर ‘बैरिया मंच’ नामक जगह पर कोेसी नदी की एक धारा के किनारे कोशी नव निर्माण मंच की स्थापना के 11 वर्ष पूरा होने के अवसर पर सम्मेलन के प्रथम सत्र का आयोजन किया गया था, ‘कोसी की चुनौतियाँ और हमारा दायित्व विषयक संगोष्ठी’ में वक्तागण अपना विचार रख रहे थे। मुझे वहाँ पहुंचने में लगभग 3 बज गये थे, आस पास के कोसी नदी बाढ़ प्रभावित कई जिलों, पटना और नेपाल तक से प्रतिनिधि आये थे, संख्या कोई चार सौ के आस पास रही होगी। मंच के संयोजक साथी महेंद्र और उनकी टीम के इतने वर्षों सतत संघर्ष का परिणाम स्पष्ट दिख रहा था। कई वक्ताओं को सुनने से कोसी की सालाना बाढ़ की विभीषिका और सरकारी औपचारिकताओं की काफी जानकारी मिल गयी थी। कुछ जमीनी तथ्य तो अंतर्मन को हिला देने वाले थे, लगभग 120 किलोमीटर लम्बे और 10 किलोमीटर चौड़े कोसी तटबंध के भीतर वाले इलाके में रहने वाली लगभग 1 करोड़ की आबादी की व्यथा कमोबेस एक जैसी ही है… एक परिवार प्रायः हर दूसरे तीसरे साल विस्थापित होता है और एक पीढ़ी करीब 15 से 20 बार विस्थापन का दंश झेल चुकी है, बावजूद इसके, वास्तव में कोसी इलाके के लोग बहुत बहादुर लोग हैं… उनकी संघर्ष क्षमता और जिजीविषा को सलाम।

हम एक आँख से देश को देखेंगे तो दूसरी आँख से कोशी के लोगों को

सम्मेलन के दौरान वक्ताओं ने बताया कि कोसी नदी तटबंध की स्थापना के समय प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेंद्र प्रसाद जी और प्रथम प्रधान मंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू जी दोनों सुपौल आये थे और वादा किया गया था कि तटबंध के भीतर के लोगों को जमीन के बराबर जमीन मिलेगी, रहने के लिए घर और परिवार के एक सदस्य को नौकरी का भी आश्वासन दिया गया था। यह कहा गया था कि हम एक आँख से देश को देखेंगे तो दूसरी आँख से कोसी के लोगों को। लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा कुछ भी नही हुआ। क्षेत्र के कुछ सुविधा सम्पन्न लोग शहरों में स्थापित हो गये और अधिकाँश लोग भाग्य भरोसे वहीँ हर साल बाढ़ की विभीषिका और पलायन झेलने के लिए छोड़ दिए गये। कुछ लोगों को पुनर्वास के तहत जमीन मुहैया भी कराई गयी तो उन्हें कब्जा नही मिल सका। अंततः उनके पास भी अपने गाँव में लौटने के अलावा कोई विकल्प नही बचा। कोशी तटबंध के भीतर के सैकड़ों वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में जीवन जीने की न्यूनतम सुविधाएं भी आज तक नही है। सम्पर्क मार्ग, स्वास्थ्य, शिक्षा और यहाँ तक कि पुलिस प्रशासन की पहुंच भी इन इलाकों में प्रायः नही है। कोई 14-15 विधायकों का चयन इस इलाके से होता है लेकिन उन्हें भी इनकी कोई परवाह कभी नही रही, साल दर साल सिल्ट जमा होने से अधिकाँश जमीन रेगिस्तान होती जा रही है, और कई स्थानों पर तटबंध के भीतर का स्तर बाहर की तुलना में 10 फीट तक ऊँचा हो गया है जो कभी भी दुर्भाग्य से तटबंध के टूटने की स्थिति में बाहर वालों के लिए भी काफी भयावह हो सकता है।

दो दिवसीय सम्मेलन

दिन का सत्र नदी के किनारे आयोजित था और उसके बाद का बाढ़ आश्रय स्थल (मुंगरार पुनर्वास) मेंइस बड़े से हाल में लगभग 150 लोग रुके हुए थे, मुश्किल से 10% लोग ऊंघ रहे होंगे लेकिन बाकी सभी चैतन्य होकर अपनी बात कह-सुन रहे थे, आगे के आन्दोलन को कैसे चलाना है, क्या रणनीति होगी, संगठन कैसे मजबूत होगा आदि बिन्दुओं पर गम्भीर चिंतन चल रहा था। तटबंध के भीतर के लोगों के लिए तमाम मूलभूत सुविधाओं जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, सम्पर्क, दूरसंचार, पेयजल, आजीविका, सुरक्षा आदि की समुचित व्यवस्था, भूमि पर लगान की त्रासदी  से मुक्ति और पलायन की समस्या से स्थाई निजात पाने के लिए जन दबाव बनाने की जरूरत सभी महसूस कर रहे थे, पटना से आये वरिष्ठ पत्रकार श्री रंजीव भाई ने जानकारी दी कि अस्सी के दशक में कोशी बाढ़ पीड़ितों के लिए एक प्राधिकरण की स्थापना हुयी थी किन्तु दुर्भाग्य से वह कागजों पर ही सीमित रह गया, उसे पुनर्जीवित करने के लिए भी सरकारों पर दबाव बनाना चाहिए।

गृहस्थी फिर से बसाने की जद्दोजहद 

21 अक्टूबर की सुबह हम लोगों ने तटबंध के भीतर के गाँव में जाने की सोची, कुछ दूर बाइक, फिर नाव और बाद में थोड़ा पैदल चल कर एक गाँव में पहुंचे। यह कोई 50 घरों की बस्ती थी, कुछ ही दिन पहले पानी घटने के बाद लोग यहाँ बाढ़ राहत कैम्पों से वापस लौटे थे, गृहस्थी फिर से बसाने की जद्दोजहद स्पष्ट दिख रही थी, झोपड़ियों की मरम्मत से लेकर, चूल्हे इंधन आदि की व्यवस्था में लोग लगे हुए थे, गाँव के अधिकाँश युवा धान काटने के लिए पंजाब चले गये हैं, छठ पर्व तक लौटेंगे। वहां से मिलने वाली मजदूरी के भरोसे ही तो आगे के दिनों में पेट भरने की व्यवस्था होनी है, बुजुर्ग, बच्चे और कुछ महिलाएं हैं जिन पर बाढ़ राहत कैम्प से लौट कर पुनः घर बसाने की जिम्मेदारी है। मैं स्तब्ध सा सब कुछ देखने समझने की कोशिश करता रहा लेकिन एक बात अंत तक समझ में नही आयी कि प्रायः हर साल की बाढ़ में 3 से 4 महीने तक जूझने के लिए इतना साहस और हिम्मत इन लोगों के पास कहाँ से आती है।

हो सकता है कुछ मित्रों को यह बात कुछ ‘बोरिंग’ लग रही हो तो वे कृपया इसे ‘इग्नोर’ करें, लेकिन मुझे यह बेहद जरूरी लग रहा है कि देश के एक हिस्से की वस्तुस्थिति सामने आये, हम विकास के ऐसे चकाचौंध में जी रहे हैं जहाँ हमारे लिए ऐसी दुरूह स्थितियों की कल्पना करना भी कठिन है किन्तु सच्चाई यही है कि देश में अभी बहुत से स्थान ऐसे हैं या शायद इससे से भी कठिन परिस्थितियों वाले होंगे, वहां रहने वाले भी हमारे अपने लोग हैं, उनके लिए इन 72 सालों में बहुत कुछ सोचा, लिखा और समझा गया होगा, काम भी हुआ होगा लेकिन धरातल पर कितना फलीभूत हुआ इसका निष्पक्ष मूल्यांकन होना चाहिए। खैर आगे बढ़ते हैं। हम जिस बस्ती में थे वहां एक सरकारी स्कूल भी है जिस में 4 अध्यापकों की पोस्टिंग है, शायद ही कभी स्कूल खुल पाता है, फिर यूनिफार्म, किताबें और मध्याह्न भोजन आदि की बात सोचना ही बेमानी है। अरे हाँ, यह झोंपड़ी एक सरकारी स्कूल है। बाढ़ घटने के बाद अभी तक यहाँ ताला नही खुला है।

इस इलाके में सरकार की नगण्य पहुंच होने का तथ्य जान कर मन खिन्न था लेकिन एक सुखद बात भी दिखी विगत 2-3 वर्षों में तटबंध के भीतर के कुछ गाँवो में सोलर सिस्टम लगा कर लाईट की सुविधा प्रदान कराई गयी है, इससे घोर अँधेरे में कुछ रौशनी की किरण जरूर दिखने लगी है, इतने भर से यहाँ के लोगों को काफी राहत हो जाती है, ऐसा सब गाँवो में होना चाहिए और अगर सरकार इच्छाशक्ति तथा जन प्रतिनिधि थोड़ी जिम्मेदारी उठायें तो संभव भी है।

कोसी नव निर्माण मंच

यह देख कर सुखद लगा कि ‘कोशी नव निर्माण मंच’ के साथी क्षेत्र में आन्दोलन के साथ साथ रचना का भी कार्य बखूबी कर रहे हैं। इस क्रम में जहाँ स्कूल नही है अथवा शिक्षक नहीं आते हैं, वहां ‘जीवन शाला’ का संचालन किया जा रहा है। डूबे क्षेत्र में ऐसी 4 जीवन शालायें वर्तमान में चल रही हैं यद्यपि आवश्यकता तो और अधिक की है, लेकिन संसाधन जुटाने की भी बड़ी चुनौती है। इन जीवन शालाओं में शिक्षक स्थानीय ही रखे गए हैं जिससे बाढ़ के समय जब पूरी बस्ती बाढ़ राहत केन्द्रों में चली जाय तो बच्चों की पढाई अधिक बाधित न हो। इसके लिए पुस्तकों, बैग, कपड़े आदि का सहयोग कभी कभार शहर के संवेदनशील साथी कर दिया करते हैं। इस सद्प्रयास के लिए मंच के साथियों को बधाई।

कोशी तटबंध के भीतर रहने वाले लोगों को स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत कठिनाई का सामना करना पड़ता है, अगर किसी को चोट लग जाय, कोई जहरीला जानवर काट ले या कोई गम्भीर बीमारी हो जाय तो चारपाई पर लाद कर कई किलोमीटर पैदल चल कर और कोशी की कई धाराओं को पार कर किसी बाजार में पहुंचना पड़ता है जहा प्राथमिक उपचार हो सके, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, टीकाकरण, एम्बुलेंस जैसी आवश्यक सुविधाओं के बारे में तो अनेक क्षेत्रों में सोचा भी नही जा सकता और तो और तटबंध क्षेत्र में पुलिस/प्रशासन की पहुंच नगण्य है। चोरी, डकैती, हत्या, बलात्कार, मारपीट जैसे अपराधों के घटित होने पर भी प्रायः इन इलाकों में पुलिस नही पहुंच पाती। पहले बाढ़ के घटने पर जमीन उपजाऊ रहती थी तो खेती कम लागत में ही अच्छी हो जाती थी लेकिन अब कई फीट रेत जमा हो जाने से जमीन, रेगिस्तान हो रही है, इसलिए खेती लाभकारी नही रही। कुल मिला कर प्रकृति की मार और सरकार तथा प्रशासन की उपेक्षा के चलते यहाँ के लोगों का जीवन साल दर साल कठिन ही होता जा रहा है, फिर भी हिम्मत अभी बाकी है।

इस इलाके में सरकार की नगण्य पहुंच होने का तथ्य जान कर मन खिन्न था लेकिन एक सुखद बात भी दिखी विगत 2-3 वर्षों में तटबंध के भीतर के कुछ गाँवो में सोलर सिस्टम लगा कर लाईट की सुविधा प्रदान कराई गयी है, इससे घोर अँधेरे में कुछ रौशनी की किरण जरूर दिखने लगी है, इतने भर से यहाँ के लोगों को काफी राहत हो जाती है, ऐसा सब गाँवो में होना चाहिए और अगर सरकार इच्छाशक्ति तथा जन प्रतिनिधि थोड़ी जिम्मेदारी उठायें तो संभव भी है। शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, आजीविका, दूरसंचार, खाद्य सुरक्षा जैसी मूलभूत सुविधाएं मुहैया कराने के लिए सरकारों को संकल्पित होना ही पड़ेगा, देश के न्यायालयों और आयोगों को भी स्वतः संज्ञान में लेकर इस मुद्दे पर सरकार पर दबाव बनाना चाहिए दूसरी ओर एक मजबूत जनांदोलन भी जरूरी है जिस दिशा में ‘कोशी नव निर्माण मंच’ अग्रसर है।

बिहार की इस यात्रा के दौरान मैंने महसूस किया कि बिहार की पूर्ण शराब बंदी की घोषणा बिल्कुल वैसी ही है जैसी पूरे देश को ओडीएफ (खुले में शौच मुक्त) होने की घोषणा, धरातल की स्थिति विपरीत है, गाँव गिरांव से लेकर शहर तक या टोटो से लेकर ट्रेन और बस तक के सफर में मदिरापान किये हुए लोग प्रायः मिलते ही रहे।

कोसी नव निर्माण मंच के सम्मेलन के अगले दिन मुझसे मिलने रंजीत चौधी भाई आये ये, रायसाहब (श्री प्रकाश राय) के ट्रेड यूनियन के साथी है, जल संसाधन विभाग में कार्यरत थे और तटबंध की सुरक्षा के प्रोजेक्ट में 15 साल कार्य किये हुए थे। उन्होंने बताया कि विभाग में सत्तर के दशक के बाद कर्मचारियों की नयी पोस्टिंग नही हुयी, संविदा और ठेकेदारी पर सब काम हो रहा है। पहले तटबंध के दोनों तरफ नियमित पेट्रोलिंग की जाती थी जिससे कोई टूटफूट या दरार आदि की समय रहते मरम्मत हो जाती थी। अब सभी कैम्प कार्यालय प्रायः निष्क्रिय हैं जिससे कभी भी कोई बड़ी दुर्घटना संभावित है। तटबंध के भीतर लगातार सिल्ट जमा होने से वहां का स्तर बाहर की तुलना में काफी ऊपर हो गया है, बाँध का समुचित रखरखाव न होने से दबाव पड़ने पर इसके टूटने का खतरा है जो बाहरी इलाकों में रहने वालों के लिए भी अत्यंत ही भयावह हो सकता है। व्यापक ठेकेदारी और कमीशनखोरी के चलते तटबंध के बाहर के लोगों के जीवन भी भविष्य में संकट में पड़ सकता है, उन्होंने सुझाव दिया कि तटबंध के अंदर की सिल्ट को नियमित रूप से मशीनों के माध्यम से हटा कर किनारे की तरफ एकत्र किया जाना चाहिए, इसके साथ ही भीतर के लोगों को आश्वासन के अनुसार जमीन के बराबर जमीन देकर बाहरी इलाकों में धीरे धीरे ढंग से पुनर्वासित किया जाना चाहिए।

 लोरिक महोत्सव

उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में वीर लोरिक के बारे में अनेक कथाएँ हैं, उनकी वीरता और प्रेम की कहानी किस्से भोजपुरी के गीतों, आल्हा, कौव्वाली आदि में भी बहुत मिलते हैं लेकिन यहाँ से 500 किलोमीटर दूर कोशी इलाके में भी लोग वीर लोरिक को मानते और पूजते हैं यह मेरे लिए अनोखा अनुभव था। सुपौल शहर से कोई 15 किलोमीटर दूर हल्दी गाँव में बिहार सरकार के पर्यटन विभाग द्वारा लोरिक महोत्सव का आयोजन प्रतिवर्ष किया जाता है, साथी धर्मेन्द्र मुझे बाइक से हल्दी गाँव लेकर गये। वहां वीर लोरिक और उनके समय के अन्य बहादुरों की 10-12 फीट की प्रतिमा का निर्माण चल रहा था, स्थानीय लोगों ने बताया कि हर वर्ष मिटटी से प्रतिमा निर्मित की जाती है, कार्तिक पूर्णिमा को मूर्ति स्थापित होती है और फिर सप्ताह भर पूजन के साथ साथ अन्य सांस्कृतिक गतिविधियाँ होती है। पता चला कि वीर लोरिक प्रेम संबंधो में पारिवारिक विरोध के चलते उत्तर प्रदेश से चल कर अपनी पत्नी सहित कोशी इलाके में आ गये थे और वहां उन्होंने आतताई राजाओं से भीषण संघर्ष करके आम जनता को उनके अधिकार दिलाने के लिए प्रयास किया था। इस इलाके में मैथिली भाषा में लोरिक गीत भी गाये जाते हैं।

बिहार की इस यात्रा के दौरान मैंने महसूस किया कि बिहार की पूर्ण शराब बंदी की घोषणा बिल्कुल वैसी ही है जैसी पूरे देश को ओडीएफ (खुले में शौच मुक्त) होने की घोषणा, धरातल की स्थिति विपरीत है, गाँव गिरांव से लेकर शहर  तक या टोटो से लेकर ट्रेन और बस तक के सफर में मदिरापान किये हुए लोग प्रायः मिलते ही रहे। यहाँ तक कि पर बेंच पर बगल में बैठे व्यक्ति की सांस से भी मदिरा की गंध मिलती रही। इस बाबत बात करने पर लोगों ने बताया कि यहाँ हर प्रकार की मदिरा पहले की तुलना में कई गुना मंहगी लेकिन आसानी से मिल जाती है, सुविधा सम्पन्न वर्ग के लिए होम डिलेवरी की भी सुविधा उपलब्ध है। खैर शायद यह बात पूरे बिहार के लिए शायद सच न हो और आंशिक क्षेत्र की स्थिति के अनुसार हासिल मेरा अनुभव गलत हो लेकिन अगर ऐसा नही है तो राजस्व का इतना बड़ा नुक्सान करके वास्तव में बिहार राज्य ने पाया क्या और जो लोग इस नये तंत्र में लाभ उठा रहे हैं, जिनमे सफेदपोश भी शामिल हैं उन पर प्रभावी नियंत्रण की सरकार की कोई इच्छाशक्ति है या नही ?

खानपान के बारे में बात किये बिना कुछ अधूरा सा लग रहा है, राय साहब ने पहले ही बताया था कि वहां जा रहे हैं तो सुपौल का खाजा जरूर चखियेगा, यही नहीं उन्होंने अपने मित्र रणजीत चौधरी जी से भी इस बारे में फोन पर कह दिया था, लिहाजा चौधरी जी ने स्वादिष्ट खाजा खिलाया भी और साथ में घर लाने के लिए मुझे गिफ्ट भी किया… वाकई ‘गजब का स्वाद’ इससे अधिक कुछ नही कहना। मुझे लगा इस इलाके में ‘आलू की भुजिया’ खाने का एक जरूरी हिस्सा है। सहरसा स्टेशन के थोडा दूर हट के एक होटल वाले ने शायद मुझे परदेसी समझ के दाल के साथ थाली में 5 अलग अलग सब्जियां परसी और अचार चटनी अलग से पैसा लिया मात्र 50 रूपये, लेकिन इन सबसे ऊपर रही महेश खूंट (खगड़िया) चौराहे की सतुई लस्सी।

वल्लभाचार्य पाण्डेय जाने माने समाजिक कार्यकर्ता है। 

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