कन्हैया के कातिल ये दोनों ही नहीं और भी हैं…

सलमान अरशद

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आसिफ़ा के बलात्कार और हत्या के आरोपियों के पक्ष में जिन्होंने तिरंगा यात्रा निकाली थी, जो इस तिरंगा यात्रा के पक्ष में तर्क दे रहे थे, जो इसका समर्थन कर रहे थे और जो लोग इस अपराध के आरोपियों को बचाने की कोशिश कर रहे थे, वो वकील जो आसिफ़ा के लिए लिए लड़ने से इनकार कर रहे थे, जो केस लड़ने वाले वकीलों के लिए मुश्किलें खड़ी कर रहे थे, जो महिला वकील की अपमानजनक वीडियो बना रहे थे, वे सभी उदयपुर के कन्हैया के क़ातिल हैं।

जो लोग शम्भू रैगर को हीरो बना रहे थे, जो उसके बैंक अकाउंट में पैसे डाल रहे थे और वे सभी जो मुसलमानों को मार कर उनके वीडियो बनाकर वायरल कर रहे थे, वे सभी लोग भी कन्हैया के क़ातिल हैं। सत्ता के विभिन्न अंग जिनकी जिम्मेदारी थी कि वो अपराध के जिम्मेदारों की पहचान करते, उन्हें कानून सम्मत कार्यवाही करके यथोचित सज़ा देते, लेकिन अगर उन्होंने अपने कर्तव्य पालन में कोताही बरती और इनके कारण अपराधी बच गये या बचा लिए गये तो वे भी कन्हैया के क़ातिल हैं।

अब इस घटना को टूल बनाकर मीडिया और सियासत कुछ लाख और शम्भू रैगर बना देगी, फिर इधर अल्लाह मियां के सिपाही भी तैयार हो जाएँगे जन्नत में सीट बुक करवाने के लिए। मीडिया, सोशल मीडिया और जनता के बीच लगातार इन्हीं पर चर्चा होती रहेगी, लेकिन जब ये सब हो रहा होगा, किन्हीं बैंकों से कुछ हज़ार करोड़ के कुछ और घोटाले हो चुके होंगे।

दिल्ली और देश के दूसरे इलाक़ों में पुलिस के वो जवान जो मुसलमानों के ख़िलाफ़ दंगाई बन गये वो भी, जो गैरमुस्लिमों के अपराध पर आंख बंद कर लिए वो भी और जो यूनिवर्सिटीज में नौजवानों को सिर्फ़ मुसलमान होने के लिए पीटते रहे वो भी कन्हैया के क़ातिल हैं।

वो किसान जो साल भर सड़कों पर बैठे रहे, अपने 700 साथियों की जान गंवाने के बाद फिर से मुसलमान विरोधी साम्प्रदायिक नफ़रत के आधार पर सत्ता निर्मित करते रहे वो भी, सालों से मुसलमानों से नफ़रत को जो वोटो में बदलने की सियासत करते रहे वो भी और जो इस सियासत पर खामोश तमाशाई बने रहे वे भी कन्हैया के क़ातिल हैं।

रामनवमी और हनुमान जयंती पर जो मुसलमानों पर हमले करते रहे, जो मस्जिदे और दरगाहें जलाते और गिराते रहे, जो मुसलमानों के घरों पर बुलडोज़र चलाते रहे, जो इस पर खुश होते रहे और जो इन कार्यवाहियों का समर्थन करते रहे, वे सभी कन्हैया के क़ातिल हैं।

हाँ, ये सही है कि जिन हाथों ने कन्हैया का क़त्ल किया वो दो मुस्लिम नौजवानों के थे, लेकिन ये हाथ उन हाथों से बिलकुल भी अलग नहीं थे जो भगवा गमछा लपेटे हाथों में त्रिशूल, कुल्हाड़ी, फरसे और कुछ तो बन्दूक तक लेकर मुसलमानों से नफ़रत में सराबोर होकर सड़कों पर निकलते हैं। फ़र्क बस इतना है कि इन दोनों नौजवानों के गले में भगवा गमछा नहीं है, चेहरे पर दाढ़ी है लेकिन इनके बेख़ौफ़ चेहरों पर ज़हरीली मुस्कराहट बिलकुल उन्हीं के जैसी है।

दरअसल, कन्हैया के क़ातिलों की सूची बहुत लम्बी है, टीवी के डब्बे से चीखते वो एंकर भी कन्हैया के क़ातिल हैं जिन्होंने इन दोनों मुश्लिम नौजवानों की ही तरह देश में करोड़ों नौजवानों को तैयार किया है, लेकिन कन्हैया के क़त्ल के मास्टरमाइंड वो हैं जिनके धंधे के लिए देश में करोड़ों नौजवानों को क़ातिल बना देने की मुहिम चलाई जा रही है।

जो क़त्ल किये जा रहे हैं और जो क़त्ल कर रहे हैं, दोनों की पहचान कीजिये। दोनों की हैसियत समान है, ये जिन्हें आप मुसलमान के रूप में देख रहे हैं ये अभी कुछ सदी पहले शूद्र थे, शूद्र जिन्हें सम्मान और सम्पदा से न सिर्फ़ वंचित कर दिया गया था, बल्कि पल-पल अपमान ही उनका सरमाया था, उस जीवन से मुक्ति के लिए ये उन दिनों मुसलमान बन गये जिन दिनों यहाँ के राजा मुसलमान थे। इन मुसलमानों के ख़िलाफ़ जो हाथों में हथियार लिए आज खड़े हैं ये भी शूद्र (दलित एवं पिछड़ा) हैं, आज भी दोनों की आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक एवं सांस्कृतिक हैसियत में ज़्यादा अंतर नहीं है। उदयपुर के इन दोनों नौजवानों ने प्रधानमंत्री को धमकाया ज़रूर है लेकिन क़त्ल एक दर्जी का किया है, एक मेहनतकश जिसकी हैसियत आम मुसलमानों से ज़्यादा अलग नहीं है।

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अब इस घटना को टूल बनाकर मीडिया और सियासत कुछ लाख और ‘शम्भू रैगर’ बना देगी, फिर इधर अल्लाह मियां के सिपाही भी तैयार हो जाएँगे जन्नत में सीट बुक करवाने के लिए। मीडिया, सोशल मीडिया और जनता के बीच लगातार इन्हीं पर चर्चा होती रहेगी, लेकिन जब ये सब हो रहा होगा, किन्हीं बैंकों से कुछ हज़ार करोड़ के कुछ और घोटाले हो चुके होंगे, मज़दूरों पर कुछ और जनविरोधी कानून मुसल्लत हो चुके होंगे, देश के किसी कोने में कुछ हज़ार किलो नशे की खेप उतर जाएगी जो दूसरे तरीके से नौजवानों के नशों में ज़हर घोलेगी, जनसुविधाओं में कुछ और कटौतियां हो चुकी होंगी, सड़कों पर नौकरी के लिए उतरा नौजवान अपने भविष्य को संवारने की लड़ाई लड़ने के बजाये मुल्लों को सबक सिखाने की लड़ाई लड़ने लगेगा, अब तक लिंचिंग में मारे गये मुसलमानों के पक्ष में कुछ और तर्क गढ़ लिए जाएँगे। कल को इसी तरह लिंचिंग की और घटनाएँ होंगी और अब इन्हें पहले से ज़्यादा जनसमर्थन मिलेगा।

इस तरह देश अन्यायपूर्ण सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक व्यवस्था के लिए और अधिक ग्रहणशील होता जाएगा। इसी दौरान बड़ी ख़ामोशी से अरक्षित वर्ग को अरक्षित सीटों तक समेट दिया जायेगा और उसे भी उन्हें दिया नहीं जायेगा। दूसरी तरफ 15 प्रतिशत को 80 प्रतिशत सीटें दे दीं जाएँगी, इस पर कोई लड़ाई भी खड़ी नहीं होगी क्योंकि आरक्षण का लाभ ले रही जातियां इस वक़्त मुल्लों को सबक सिखा रही होंगी।

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यही नहीं ऐसे नौजवान मुसलमान विरोधी सियासत को और बुलंदी पर पहुँचायेंगे, अब प्रशासन के लिए मुसलमानों के घरों पर बुलडोज़र चलाने को पहले से ज़्यादा समर्थन मिलने लगेगा, कोर्ट में बैठे जज़ों पर भी इन्हें न्याय न देने का नैतिक दबाव बढ़ जायेगा। नफ़रत की इस सियासत से लाभ लेने वाले और मज़बूत होंगे और जनता की तबाही की किस्तें भी अब ज़रा और बड़ी हो जायेंगी।

नफ़रत की सियासत या इस सियासत के प्रतिशोध में अगर आप क्रोध से भरे हुए हैं तो सोचिये कि इस क्रोध से उपजी आपकी क्रिया और इस क्रिया पर प्रतिक्रिया क्या आपके हित में हैं, क्या आपके जीवन से जुड़ी किसी भी समस्या का समाधान यहाँ हो रहा है, क्या सेहत, तालीम, रोज़गार और सुरक्षा जैसे किसी भी मुद्दे का इससे कोई समाधान निकल रहा है? सियासी हिंसा और प्रतिहिंसा के इस दौर में इन प्रश्नों पर सोचना बहुत मुश्किल है, पर क्या इन पर सोचना और सही रास्ते की तलाश करना ही आज की ज़रूरत नहीं है?

डॉ. सलमान अरशद स्वतंत्र पत्रकार हैं।

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