अलोकतांत्रिक नरेंद्र मोदी का ‘मोदीयापा’ (डायरी, 20 नवंबर, 2021)

नवल किशोर कुमार

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अहा! कल का दिन बहुत खूबसूरत था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कल सुबह नौ बजे देश को संबोधित करते हुए घोषणा की कि वे तीन कृषि कानूनों को वापस निरस्त करेंगे और इसके लिए संसद के शीतकालीन सत्र में विधेयक लाएंगे। उन्होंने बहुत कुटिलतापूर्वक देश से माफी मांगी। उन्होंने लाखों किसानों को ‘कुछ’ की संज्ञा दी और अपने कुकृत्य को ‘नेकनीयती’ कहा। खैर यह बहुत अहम घोषणा है। इसकी अनेकानेक महत्वपूर्ण वजहें हैं। सबसे अधिक तो यह कि अब किसान जो कि पिछले एक साल से दिल्ली की सीमाओं पर ठंड, बरसात और गर्मी की परवाह किए बगैर डटे रहे, वे अब अपने घरों को लौट सकेंगे। मेरे लिए इससे भी अधिक सुकून की बात यह रही कि लोकतांत्रिक उम्मीदें जीवित रहीं। बहुमत का अहंकार टूटा। जिस तरह से तीनों कृषि कानूनों को पारित करवाने में सत्तापक्ष ने संसदीय मर्यादाओं का उल्लंघन किया था, वह भारत के संसदीय इतिहास में एक काला अध्याय ही है।
लेकिन मैं मानता हूं कि अब भी यह अधूरा ही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर लोकतांत्रिक मूल्यों का हनन किया। इसके अलावा उन्होंने लोकतंत्र के साथ दूसरे तरीके से भी मजाक किया है, इनकी चर्चा आगे करता हूं। फिलहाल तो यह कि जो तीन कानून पहले बनाए गए और अब उन्हें वापस लेने की बात कही जा रही है, वे कानून हैं– कृषि उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अधिनियम, 2020, मूल्य आश्वासन एवं कृषि सेवाओं पर कृषक (सशक्तिकरण एवं संरक्षण) अनुबंध विधेयक 2020 और आवश्यक वस्तु संशोधन अधिनियम, 2020। जब इन तीनों कानूनों से संबंधित विधेयक संसद में लाए गए थे, तब इस बात की सूचना तक नहीं दी गयी थी। यहां तक कि इन तीनों विधेयकों के संबंध में केंद्रीय मंत्रिपरिषद में विचार-विमर्श भी किया गया था या नहीं, इसकी जानकारी आजतक सामने नहीं आयी है। इसके आधार पर कहा जा सकता है कि ये तीनों विधेयक केंद्रीय मंत्रिपरिषद की सहमति के बगैर संसद में लाए गए। या यह हो सकता है कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने विधेयक लाए जाने के दिन महज खानापूर्ति के लिए इसके बारे में मंत्रिपरिषद को सूचित किया हो। लेकिन इस स्थिति में भी यही कहा जाएगा कि ये तीनों विधेयक केवल और केवल प्रधानमंत्री के कहने पर संसद में लाए गए थे।

कल संयोग ही कहिए कि इंदिरा गांधी की जयंती थी। इंदिरा गांधी ने भी एक समय यही रूतबा हासिल कर लिया था। संसदीय आचरण का मजाक उन्होंने भी उड़ाया था और तब यह कहावत आम थी कि इंदिरा इज इंडिया, इंडिया इज इंदिरा। यह ठीक ऐसा ही है, जैसे कि आज इंडिया इज नरेंद्र मोदी, मोदी इज इंडिया।

 

अब जबकि कल प्रधानमंत्री ने इन कानूनों को वापस लेने की बात कही तब एक बार फिर उन्होंने अपने ही मंत्रिपरिषद को हाशिए पर रखा। जबकि भारतीय संविधान में मंत्रिपरिषद का खास महत्व है। इसे इग्नोर कर संसद में कोई विधेयक नहीं लाया जा सकता है। वैसे भी केंद्रीय मंत्रिपरिषद में एक नरेंद्र सिंह तोमर हैं, जिनके पास कृषि मंत्रालय की जिम्मेदारी है। जब उपरोक्त कानूनों को बनाने के लिए सदन में विधेयक लाए जा रहे थे तब प्रधानमंत्री ने विधेयकों को प्रस्तुत करने की जवाबदेही तोमर को ही दी थी। उस वक्त भी जब वे सदन को संबोधित कर रहे थे, तब एक कठपुतली अथवा रोबोट की तरह व्यवहार कर रहे थे। मुझे लगता है कि जो संसदीय व्यवस्था, संसदीय आचरण और संसदीय आदर्शों का अध्ययन करने के इच्छुक हैं, उन्हें उपरोक्त तीनों कानूनों से संबंधित विधेयकों के पारित कराए जाने की कार्यवाही को जरूर देखनी चाहिए। निस्संदेह भारतीय संसद के अंदर के दृश्यों को देख मन कोफ्त होगा, लेकिन इस लिहाज से ऐसा करना सकारात्मक होगा कि अल्पमत वाला विपक्ष बहुमत के नशे में चूर सत्तापक्ष का खुलकर विरोध कर रहा था और वे जिनके उपर सदन को चलाने की जिम्मेदारी थी, संसदीय आदर्शों की धज्जियां उड़ा रहे थे। और यह सब केवल एक आदमी के फैसले को लागू करवाने के लिए किया जा रहा था। यहां तक कि भारत के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद जो कि स्वयं दलित किसान परिवार से आते हैं, ने तीसरे ही दिन विधेयकों पर मुहर लगा दी। इस प्रकार हम पाते हैं कि इस देश पर वर्तमान में केवल एक आदमी की हुकूमत है और उसका नाम है नरेंद्र मोदी।
कल संयोग ही कहिए कि इंदिरा गांधी की जयंती थी। इंदिरा गांधी ने भी एक समय यही रूतबा हासिल कर लिया था। संसदीय आचरण का मजाक उन्होंने भी उड़ाया था और तब यह कहावत आम थी कि इंदिरा इज इंडिया, इंडिया इज इंदिरा। यह ठीक ऐसा ही है, जैसे कि आज इंडिया इज नरेंद्र मोदी, मोदी इज इंडिया।
सवाल यह है कि क्या प्रधानमंत्री ने कल तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा करने से पहले अपने मंत्रिपरिषद से विचार-विमर्श किया? चूंकि इस आशय से संबंधित कोई सूचना भारत सरकार के स्तर पर पहले से भारतीय मीडिया को नहीं दी गयी थी, इसलिए यह कहा जा सकता है कि वापस लेने का फैसला भी केवल और केवल एक व्यक्ति का है, जो कि खुद को सरकार का पर्याय मानता है। यही तानाशाही है और यही फासीवाद है।
अब सवाल यह है कि आखिर मोदी ऐसा करते क्यों हैं, जिसके कारण सरकार पर सवाल उठता है, संसद पर सवाल उठता है, अदालतों पर सवाल उठता है, संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल उठते हैं? तो क्या नरेंद्र मोदी ने यह ठान रखा है कि वे हर संवैधानिक संस्था को मूल्यहीन साबित करके रहेंगे?

नरेंद्र मोदी की तरह ही नीतीश कुमार भी अपने कबीना सहयोगियों को दोयम दर्जे का समझते हैं। दोनों के बीच समानता यह भी कि दाेनों से मिलने के लिए उनके कबीना के सहयोगियों को अप्वाइंटमेंट लेना पड़ता है। मैं तो नीतीश कुमार की बात कर रहा हूं। कल ही बिहार के एक बड़े मंत्री से बात हो रही थी, उनका साफ कहना था कि नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी दोनों में कोई फर्क नहीं है।

 

ये सवाल भी बहुत महत्वपूर्ण हैं। लेकिन जब मैं यह लिख रहा हूं तो मेरा आशय बिल्कुल साफ है कि तीनों कृषि कानूनों को वापस लिया जाना बेहद जरूरी है और यह एक स्वागतयोग्य निर्णय है, लेकिन जिस सवाल को मैं यहां दर्ज कर रहा हूं, वह यह कि सरकार केवल एक आदमी का नहीं होता है। मैं तो उनके मंत्रिपरिषद के सहयोगियों के बारे में सोच रहा हूं। मैं सोच रहा हूं नरेंद्र सिंह तोमर के बारे में, जिन्होंने किसानों के आंदोलन के बारे में तल्खपूर्ण टिप्पणियां की थीं। मुझे उम्मीद है कि संसद के शीतकालीन सत्र में जब तीनों कानूनों को निरस्त करने के लिए विधेयक लाए जाएंगे तब नरेंद्र मोदी अपनी नैतिक जिम्मेदारी से पीछे हट जाएंगे और सदन में जवाब देने की जवाबदेही नरेंद्र सिंह तोमर की होगी। बेचारे नरेंद्र सिंह तोमर के मन पर क्या बीतेगी? क्या उन्हें नहीं लगेगा कि नरेंद्र मोदी ने उन्हें अपना वफादार बनाकर रख दिया है?
खैर, यह परेशानी अकेले केवल नरेंद्र सिंह तोमर की नहीं है। मैं तो निर्मला सीतारमण के बारे में सोच रहा हूं। वे केवल कहने को वित्त मंत्री हैं और सारे फैसले पीएमओ से लिये जाते हैं। यही हाल विदेश मंत्री और अन्य मंत्रालयों के मंत्रियों के हैं। इनमें से एक अपवाद है तो गृह मंत्रालय। उसके मंत्री अमित शाह अपने हिसाब से न केवल फैसले लेते हैं, बल्कि जिम्मेदारी भी लेते हैं। फिर बेशक वे नरेंद्र मोदी के फैसलों को ही अमलीजामा पहनाते हैं, लेकिन उनके पास इतनी हैसियत तो है कि वे बोलते हैं। दूसरों को खांसने की अनुमति भी नहीं।
अब बात यह कि नरेंद्र मोदी की तरह ही नीतीश कुमार भी अपने कबीना सहयोगियों को दोयम दर्जे का समझते हैं। दोनों के बीच समानता यह भी कि दाेनों से मिलने के लिए उनके कबीना के सहयोगियों को अप्वाइंटमेंट लेना पड़ता है। मैं तो नीतीश कुमार की बात कर रहा हूं। कल ही बिहार के एक बड़े मंत्री से बात हो रही थी, उनका साफ कहना था कि नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी दोनों में कोई फर्क नहीं है। दोनों केवल अपने मन की करते हैं। पूरी की पूरी सरकार उनकी अपनी बपौती है। संसदीय व्यवस्था व मर्यादाएं हाशिए पर।
दिलचस्प यह कि कल नीतीश कुमार ने भी अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि– ‘कानूनों को बनाने का फैसला प्रधानमंत्री का था और अब उन्हें वापस लेने का फैसला भी उनका ही है। इस पर क्या बात करनी है।’
बहरहाल, यह सुकूनदायक है कि भारत सरकार तीनों कृषि कानूनों को वापस लेगी। यह जन आंदोलन की जीत है। कल जब मैं गाजीपुर बार्डर जाकर किसानों से मिला तब मैंने पाया कि उनकी आंखों में अपने सात सौ लोगों के खोने का गम था। क्या किसान नरेंद्र मोदी को उनकी सनक के लिए माफ कर सकेंगे? क्या हम भारत के लोग उन्हें माफ कर सकेंगे?

नवल किशोर कुमार फारवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

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