Wednesday, February 28, 2024
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जो बाजी ओहि बाची डायरी (28 अगस्त, 2021) 

कोई भी बदलाव एकवचन में नहीं होता। जब कुछ बदलता है तो उसके साथ बहुत कुछ बदल जाते हैं। ऐसा कभी नहीं होता कि केवल एक बदलाव हो। फिर बात चाहे मशीनरी की हो या फिर सियासत की। और फिर जब समाज के स्तर पर बदलाव होता है तो उसके असर भी व्यापक होते हैं। […]

कोई भी बदलाव एकवचन में नहीं होता। जब कुछ बदलता है तो उसके साथ बहुत कुछ बदल जाते हैं। ऐसा कभी नहीं होता कि केवल एक बदलाव हो। फिर बात चाहे मशीनरी की हो या फिर सियासत की। और फिर जब समाज के स्तर पर बदलाव होता है तो उसके असर भी व्यापक होते हैं। मसलन, अर्थव्यवस्था की नीति बदली है। न केवल अपने देश में बल्कि विश्व स्तर पर। फिलहाल जो आर्थिक नीतियां अपनायी जा रही हैं, उन्हें नवउदारवादी नीतियां कह सकते हैं जो कि पूंजीवाद का ही संशोधित संस्करण है।
इसे नवउदारवाद ही क्यों कहा गया? इसके पीछे भी अनेक कारण हैं। एक अहम कारण तो यही कि पूंजीवाद अपने मूल स्वरूप में अपनी क्रूरता के कारण बदनाम हो चुका था। यह औद्योगिक क्रांति का परिणाम था। इस पूंजीवाद ने उपनिवेशवाद को जन्म दिया और फिर इसका असर विश्वस्तर पर देखा गया। अंग्रेज इस मामले में सबसे आगे थे। उन्होंने विश्व के बड़े भूभाग को अपना उपनिवेश बना लिया था। भारत भी अंग्रेजों का उपनिवेश ही था और अस्ट्रेलिया तथा दक्षिण अफ्रीका भी। जहां पूंजीवादी शक्तियां पहले से ताकतवर रहीं, वहां अंग्रेज सफल नहीं हो सके और उन देशों के साथ उन्होंने व्यापार संधियां की।

[bs-quote quote=”मैंने पहले कहा कि बदलाव कभी एकवचन में नहीं होता, उपनिवेशवाद के दौर में भारत में बदलाव हुए और व्यापक बदलाव हुए। सामाजिक जकड़नें कमजोर हुईं। जोतीराव फुले जैसे चिंतक और विमर्शकारों ने गुलामगीरी के माध्यम से द्विजों के धर्म की मूल अवधारणा पर करारा प्रहार किया। यह प्रहार बेहद खास था। वजह यह कि उस समय द्विज अपने धर्म को सुधारने में लगे थे।” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

उपनिवेशवाद बेहद क्रूर था। हालांकि यह इसका एकमात्र स्वरूप नहीं था। अब यदि भारत को ही एक उदाहरण के रूप में लें तो अंग्रेजों ने भारत को अपना गुलाम भले बनाया लेकिन उन्होंने भारत के बहुसंख्यक वर्ग को सदियों की गुलामी से आजादी दी। यह गुलामी थी मनुवाद की गुलामी। अंग्रेजों ने गैर द्विजों को अपनी फौज में शामिल किया। उन गैर द्विजों को भी जिनके स्पर्श को भी द्विज नापाक मानते थे। संपत्ति का अधिकार भी नहीं था गैर द्विजों के पास। शिक्षा का तो सवाल ही नहीं उठता था। समााजिक स्तर पर वे गुलाम से अधिक कुछ नहीं थे।
तो जैसा कि मैंने पहले कहा कि बदलाव कभी एकवचन में नहीं होता, उपनिवेशवाद के दौर में भारत में बदलाव हुए और व्यापक बदलाव हुए। सामाजिक जकड़नें कमजोर हुईं। जोतीराव फुले जैसे चिंतक और विमर्शकार ने गुलामगीरी के माध्यम से द्विजों के धर्म की मूल अवधारणा पर करारा प्रहार किया। यह प्रहार बेहद खास था। वजह यह कि उस समय द्विज अपने धर्म को सुधारने में लगे थे। अंग्रेजों के कारण जो बदलाव की आंधी आयी थी, उसने द्विजों के पाखंड की पोल पट्टी खोल दी थी। बंगाल तब इस तरह के धर्म सुधार का सबसे बड़ा केंद्र था। बंगाल से हजारों मील दूर महाराष्ट्र में भी बदलाव का आगाज हो रहा था। लेकिन यह बदलाव द्विजों की धार्मिक मान्यताओं को खारिज कर रहा था।

[bs-quote quote=”तमाम बड़ी पार्टियां अब एक कारपोरेट फर्म के रूप में तब्दील हो चुकी हैं। एडीआर की हालिया रपट का आंकड़ा चौंकाने वाला है। यह आंकड़ा चुनावी बांड से जुड़ा है। रपट के मुताबिक 2019-20 के दौरान भाजपा को तीन हजार 623 करोड़ 28 लाख रुपए की प्राप्ति हुई। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस की आय भी वित्तीय वर्ष 2019-20 के दौरान 682 करोड़ 21 लाख रुपए रही। भाजपा ने उस वित्तीय वर्ष के दौरान जबरदस्त मुनाफा कमाया। रपट कहती है कि 3 हजार 623 करोड़ 28 लाख रुपए में से उसने आधी राशि (एक हजार 651 करोड़ 2 लाख रुपए) व्यय किया। ” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

मैं तो यह मानता हूं कि यदि अंग्रेज भारत नहीं आए होते तो भारत कभी भारत बन ही नहीं पाता। हालांकि जब अंग्रेज गए तो यह मुल्क दो मुल्कों में तक्सीम कर दिया गया जो कि बदलाव की शर्तों के अनुरूप ही था। भारत के ब्राह्मण सत्ता अपने हाथ में रखने के लिए जिद पर अड़े थे और अशराफ मुसलमान भारत में फिर से अपनी सल्तनत स्थापित करना चाहते थे। लार्ड माउंटबेटन एक कुशल प्रशासक रहे जिनकी देख-रेख में भारत और पाकिस्तान के बीच विभाजन हुआ। यदि माउंटबेटन ने सूझबूझ से काम नहीं लिया होता तो निश्चित तौर पर तब जो तबाही का मंजर था, वह और भयावह होता। निस्संदेह आज जो अमेरिका के द्वारा अफगानिस्तान से अपने सैनिकों को वापस बुलाए जाने के बाद की स्थिाति है, उससे भी भयावह। चूंकि तब भारत में एक शासक नहीं, अनेकानेक शासक थे।
खैर, बदलाव की प्रकृति ही ऐसी होती है। आप बदलाव को नहीं रोक सकते हैं। यदि कुछ कर सकते हैं तो केवल इतना कि अपनी नीतियों के द्वारा इसके असर को सकारात्मक या नकारात्मक बना सकते हैं। पूंजीवाद एक बदलाव था और इसका असर बेहद नकारात्मक था। यह कहना भी अतिश्योक्ति नहीं कि हर बदलाव की एक मियाद होती है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद दुनिया का नक्शा बदल चुका था।
उपनिवेशवादी ताकतें कमजोर हुई थीं। भारत सहित कई मुल्क आजाद हो चुके थे। उनके सामने बड़े संकट थे। सबसे बड़ा संकट तो अर्थव्यवस्था की थी। साम्यवाद पूंजीवाद को कड़ी चुनौती जरूर दे रहा था, लेकिन उसकी अपनी सीमाएं रहीं। फिर विश्व के पटल पर नवउदारवाद का आगाज हुआ। इसने पूरे विश्व को एक बाजार घोषित किया। देशों के बीच संधियों का विस्तार किया गया। यह बदलाव भी एकांगी नहीं था। इसका सामाजिक और सांस्कृतिक पक्ष भी था। बाजार ने सभी को प्रभावित किया।
सियासत पर भी इसका खूब असर हुआ। इस असर का परिणाम आज यह है कि तमाम बड़ी पार्टियां अब एक कारपोरेट फर्म के रूप में तब्दील हो चुकी हैं। एडीआर की हालिया रपट का आंकड़ा चौंकाने वाला है। यह आंकड़ा चुनावी बांड से जुड़ा है। रपट के मुताबिक 2019-20 के दौरान भाजपा को तीन हजार 623 करोड़ 28 लाख रुपए की प्राप्ति हुई। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस की आय भी वित्तीय वर्ष 2019-20 के दौरान 682 करोड़ 21 लाख रुपए रही। भाजपा ने उस वित्तीय वर्ष के दौरान जबरदस्त मुनाफा कमाया। रपट कहती है कि 3 हजार 623 करोड़ 28 लाख रुपए में से उसने आधी राशि (एक हजार 651 करोड़ 2 लाख रुपए) व्यय किया।
अब वह बात जिसे मैं अपनी डायरी में दर्ज करना चाहता हूं और वह यह कि आज के दौर में वही राजनीति कर सकता है, जिसके पास पूंजी होगी। और पूंजी आएगी कहां से? इसके लिए राजनीतिक दलों को बाजना होगा। बाजने का मतलब प्रतिस्पर्धा में बने रहना होगा। समझौते करने होंगे और ये समझौते भी एकवचन में नहीं होंगे। भाजपा भी यही कर रही है। वह समझौते कर रही है। देश को निजीकरण की तरफ तेजी से धकेलकर उसने इसका आगाज कर दिया है। वैसे भी आर्थिक ताकतें मुफ्त में करोड़ों की राशि चंदा नहीं देती हैं। चंदा लेने वाले को पांव में घुंघरू बांधकर नाचना पड़ता है। इसे बाजना भी कह सकते हैं। लेकिन बाजना सकारात्मक शब्द है और नाचना नकारात्मक।
फिलहाल के लिहाज से बाजना शब्द ही ठीक है। मतलब यह कि जो बाजेगा, वही बचेगा।

 नवल किशोर कुमार फारवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

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