धर्म भी एक सियासत है  

डॉ. सलमान अरशद

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भारत सहित दुनिया के बहुत से मुल्क धर्म आधारित सियासत का या तो हिस्सा हैं या इससे पीड़ित हैं या इस तरह की राजनीति से बचने की कोशिश कर रहे हैं। भले ही धर्म भी एक तरह की सियासत है लेकिन दुनिया के अधिकतर धार्मिक लोग इसके प्रति सजग नहीं हैं और वो इस बात से दुखी रहते हैं कि धर्म को राजनीति का हिस्सा नहीं बनाना चाहिए। इसलिए पहले ये समझ लेते हैं कि कैसे धर्म, धर्म ही नहीं राजनीति भी है।

हर धर्म एक तरह की आचार संहिता प्रस्तुत करता है। इस आचार संहिता के आधार पर पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक व्यवस्था भी अस्तित्व में आती है। सुन्नी मुसलमानों का बहुत बड़ा हिस्सा खलीफ़ा उमर को आदर्श प्रशासक के रूप में याद करता है। खलीफ़ा उमर राजकोष का पैसा अपनी निजी ज़रूरतों पर खर्च नहीं करते थे और आम नागरिकों की तरह साधारण ज़िन्दगी जीते थे। ये इस्लाम की तालीमात की वजह से था, उमर इस्लामिक आदर्शों के मुताबिक जीवन जीने वाले आदर्श मुसलमान थे। अब फिर से सोचिये, क्या इस्लाम एक ऐसा ही धर्म नहीं है जिससे राजनीति की एक विधा निकलती है?

हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग दो अलग देश के लिए लड़ते रहे, हिंदुओं और मुसलमानों को लड़वाते रहे, एक-दूसरे को कोसते रहे, लेकिन एक-दूसरे की मदद भी करते रहे, एक-दूसरे के साथ मिलकर सरकार भी बनाई, एक-दूसरे के साथ मिलकर आज़ादी की लड़ाई को कमज़ोर किया और खून-ख़राबे को सियासत में आगे बढ़ने के लिए इस्तेमाल किया।

हिन्दुओं में मनुसमृति की चर्चा हमेशा होती रहती है, अक्सर तो इसकी आलोचना होती है, ये आलोचना भी अभी पिछली दो सदियों में होने लगी है वरना भारत का समाज इसी स्मृति को सदियों से जीता चला आ रहा है और आज भी इस पर आधारित समाज पूरी तरह से बदला नहीं है। हालाँकि वर्ण व्यवस्था या जाति व्यवस्था का उल्लेख और भी ग्रंथों में है, लेकिन मनुस्मृति इसकी व्यवस्थित व्याख्या करती है और जाति व्यवस्था को वैधानिक आधार देती है। इसके अंतर्गत श्रम करने वालों को शूद्र कहा गया और उन्हें सम्पदा व सम्मान से वंचित रखा गया, जबकि उनके द्वारा उत्पादित वस्तुओं और सुविधाओं का उपभोग सवर्ण कही जाने वाली दलक जातियों के हिस्से आया। क्या इसे धर्म आधारित राजनीति नहीं कहेंगे, जो एक पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक व्यवस्था निर्मित करती है?

पोप और खलीफ़ा, दोनों ही कई सदियों तक सुप्रीम राजा की भूमिका में बने रहे, बड़े-बड़े राजाओं और सुल्तानों की हैसियत इनके सामने घर के नौकर जैसी थी। क्या ये धर्म आधारित राजनीति नहीं थी? धीरे-धीरे मुस्लिम राजाओं ने खलीफ़ा से और इसाई राजाओं ने पोप से आज़ादी हासिल की और इस अलगाव ने दुनिया का नक्शा बदल दिया। पोप और चर्च को अलग व  सीमित करने के बाद यूरोप में विज्ञान, उद्योग एवं व्यापार की बिलकुल नयी दुनिया वजूद में आयी। इस दुनिया में नये विचार पनपे, दर्शन की कई शाखाएं वजूद में आईं, विज्ञान और तकनीक ने जीवन को समृद्ध किया साथ ही राजनीति में उपनिवेशवाद का एक नया निज़ाम वजूद में आया। यूरोप ने सबसे पहले धर्म की दुनिया के लोगों के अधिकार सीमित किये और उनकी दुनिया एशिया के देशों से सदियों आगे चली गयी, एशिया के देश अभी भी धर्म आधारित सियासी कीचड़ में लोट लगा रहे हैं।

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इसलिए ये कहना कि धर्म और सियासत को अलग किया जाना चाहिए या अलग किया जा सकता है, ये दो तरह की सोच पर आधारित है, प्रथम ऐसे लोग मासूम हैं जो सियासत की वृहत्तर दुनिया से वाकिफ़ नहीं हैं या फिर वो ख़ुद चतुर राजनीतिज्ञ हैं। जब तक धर्म हमारे जीवन का हिस्सा है धर्म आधारित सियासत भी हमारे जीवन में किसी न किसी शक्ल में बनी रहने वाली है, ज़्यादा से ज्यादा हम यह कर सकते हैं कि धर्म और राजसत्ता को एक-दूसरे के इस्तेमाल से रोकने की कोशिश करें, हालाँकि इसे भी पूरी तरह रोकना संभव नहीं है।

भारत के सन्दर्भ में धर्म और धर्म की सियासत को समझ लेते हैं। इस देश में कोई भी राजा रहा हो उसने जाति आधारित सामाजिक व्यवस्था को डिस्टर्ब नहीं किया। इस व्यवस्था के अनुसार ब्राह्मण हिन्दू समाज के स्वाभाविक प्रतिनिधि बने हुए थे, किसी हद तक आज भी ये स्थिति बनी हुई है। तमाम सुल्तानों और हिन्दू राजाओं के दरबारों में ब्राह्मण की सम्मानजनक उपस्थिति बनी रही। अंग्रेजों ने पहली बार भारत की सामाजिक व्यवस्था में दखल दिया और बहुत से अमानवीय परम्पराओं पर रोक लगाई। यही वजह है बहुत से लोग ऐसा सोचते हैं कि अंग्रेजों के सवर्ण हिन्दुओं द्वारा विरोध की ये भी एक वजह थी, अगर वो ऐसा नहीं करते तो भारतीय सवर्ण हिन्दू और मुस्लिम सवर्ण या अशराफ़ उनके साथ बने रहते और उनका राज आगे भी कायम रहता, हालाँकि मैं इस सोच से सहमत नहीं हूँ, लेकिन इस पर बात फिर कभी।

धर्म आधारित सियासत कितनी निरंकुश और अमानवीय होती है, आज इसे समझने के लिए बहुत से उदहारण मौजूद हैं। लेकिन आज ही ऐसा हुआ हो, ऐसा भी नहीं है। यूरोप में मुसलमानों के कत्लेआम को चर्च ने लीड किया था, हर मुस्लिम राजा ने अपनी राजनीतिक लड़ाइयों को ज़ेहाद कहा, भारत में दलितों के कितने ही नरसंहार हुए, ये सभी धर्म आधारित राजनीति के उदहारण हैं।

भारत में देश को आज़ाद कराने के लिए लड़ी गयी शुरुआती लड़ाइयों को धार्मिक मुसलमानों ने ही लीड किया, अगर वो जीत जाते तो देश में इस्लामिक हुकूमत कायम होता, जो हर हाल में पूँजीवादी लोकतंत्र से बुरा ही होता। 19वीं सदी के अंत में उदारवादी हिन्दू और मुसलमान भारत की सियासत में सक्रिय होते हैं ये समूह अनेक बदलावों से गुज़रते हुए पूंजीवादी लोकतंत्र के मज़िल तक पहुँचता है। इस सफ़र में मुसलमानों की संख्या हिन्दुओं की अपेक्षा कम ही रहती है लेकिन इस समूह की सबसे खूबसूरत बात ये है कि ये सभी जातीय और धार्मिक समूहों को एक साथ लेकर चलना चाहता है और इस चाहत की सबसे मुखर आवाज़ बनते हैं जवाहर लाल नेहरू, लेकिन धार्मिक घुसपैठ से ये लोग खुद अपने संगठन यानि कि कांग्रेस को बचा नहीं पाते, जिसका खामियाज़ा आज देश भुगत रहा है।

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धार्मिक सियासत कितनी निकृष्ट, मानवद्रोही और पतित है, इसे भी भारत के ही उदाहरण से समझा सकता है। हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग दो अलग देश के लिए लड़ते रहे, हिंदुओं और मुसलमानों को लड़वाते रहे, एक-दूसरे को कोसते रहे, लेकिन एक-दूसरे की मदद भी करते रहे, एक-दूसरे के साथ मिलकर सरकार भी बनाई, एक-दूसरे के साथ मिलकर आज़ादी की लड़ाई को कमज़ोर किया और खून-ख़राबे को सियासत में आगे बढ़ने के लिए इस्तेमाल किया। हिन्दू महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को अपनी पसंद का राष्ट्र नहीं मिला लेकिन मुस्लिम लीग ज़रूर अपने मकसद में कामयाब हो गया। लेकिन आज पाकिस्तान दो टुकड़ों में बंट गया है और धर्म आधारित सियासत से निकलने की लगातार कोशिश कर रहा है। इस सियासत ने पाकिस्तान को तबाह कर रखा है।

भारत की बात करें तो हिंदुत्व कि सियासत करने वालों के पास अपने काम का ऐसा कोई ब्यौरा नहीं है जिसे ये देश हित में बता सकें। ये गाँधी, नेहरू, मुसलमानों पर देश के बंटवारे का इल्ज़ाम लगाते हैं लेकिन इतिहास हमें बताता है कि देश को बाँटने की सारी कवायद में ये शामिल रहे हैं। इन्होनें आज़ादी की लड़ाई को कमज़ोर किया, लड़ने वालों के खिलाफ़ लड़ते रहे और मुसलमानों के खिलाफ़ हिन्दुओं को भड़काते रहे, आज तक ये यही कर रहे हैं। अफ़सोस, आज मीडिया इन्हें ही राष्ट्रवादी कहती है और ये देश के लोगों को देशभक्ति की सनद बाँटते हैं। यहीं पर ये भी देख लेना चाहिए कि धर्म आधारित राजनीति कैसे बड़े पैमाने पर लोगों को प्रभावित करती है बावजूद इसके ये क्यों देश और दुनिया के लिए घातक है!

धर्म एक इन्सान के जीवन में उसके पैदा होने के साथ ही दाख़िल हो जाता है। ज़्यादातर धार्मिक लोगों ने अपना धर्म चुना नहीं है, बल्कि उस धर्म में वे संस्कारित हुए हैं। जैसे लोग अपने माँ, बाप, भाई, बहन आदि को बस हासिल कर लेते हैं, चुनते नहीं हैं, लगभग वही सूरत धर्म की भी है। चूँकि हमारा जीवन धर्म को जीते हुए ही शुरू और विकसित होता है। इसलिए धर्म हमारी भावनाओं और विचारों का हिस्सा बन जाता है। यहाँ तक कि हम तर्क को भी महत्व नहीं देते, अगर कोई तार्किक रूप से भी ऐसा कुछ कहे जो हमारे धर्म के ख़िलाफ़ जाता हो तो हम उसे स्वीकार नहीं कर पाते। हमारी इसी कमज़ोरी का फायदा उठाया सियासत ने।

लेकिन धर्म हो या कोई और अवधारणा, उसका एक आर्थिक पक्ष भी होता है। इसके बहुत विस्तार में न जाते हुए हम सिर्फ़ धर्म आधारित सियासत के विकास के एक चरण को समझने की कोशिश करेंगे। लेकिन इससे पहले ये ध्यान में रखें कि हम जिस भी देश में रहते हैं, उस देश का आर्थिक और राजनीतिक गतिविधियों का हिस्सा होते हैं। देश की शासन व्यवस्था हमारे प्रत्यक्ष और परोक्ष टैक्स से चलती है। राजसत्ता इसके बदले हमारे जीवन को सहज, सरल और सुखमय बनाने के काम करती है। कोई भी राजनीतिक व्यवस्था हो, उसकी ये जिम्मेदारी है कि अपने नागरिकों की शिक्षा, सेहत और रोज़गार जैसे बुनियादी ज़रूरतों को पूरा करे। अगर सरकारें ऐसा नहीं करतीं तो जनता बगावत करती है और राजसत्ता को पलट देती है।

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पूँजीवादी लोकतान्त्रिक व्यवस्था ने हालांकि जीवन को बहुत समृद्ध किया है लेकिन जैसे-जैसे इस व्यवस्था में एकमात्र पूँजीपति का ही हित सर्वोपरि होता गया, आम लोगों का जीवन मुश्किल होता गया। आज राजसत्ताएँ अपने नागरिकों को कुछ भी देने को तैयार नहीं है। भारी टेक्स देने के बावजूद आपको शिक्षा और सेहत दोनों के संसाधन ख़रीदने पड़ते हैं। जीवन की हर सुविधा पे एंड यूज़ मोड में आ गयी है। 19वीं सदी में ही लोगों को समझ में आ गया था कि इस व्यवस्था को बदलना पड़ेगा, क्योंकि इसमें अमीरों का हित तो किसी हद तक सुरक्षित है लेकिन दुनिया भर के आम लोगों का जीवन दुरूह होता जा रहा है। ऐसे में एक नया विचार सामने आया।

ज्ञान-सृजन एवं निर्माण सामूहिक है, हर तरह का विकास सामूहिक है, दुनिया का हर तरह का उत्पादन सामूहिक है, इसलिए इनका उपभोग भी सामूहिक होना चाहिए। पिछली सदी में इस विचार पर आधारित कुछ क्रांतियाँ हुईं, रूस में समाजवादी गणतंत्र बना, चाइना, क्यूबा जैसे सामावादी देश वजूद में आये। इसने पूँजीवादी देशों को डरा दिया। अतः दो तरह के उपाय तुरंत किये गये। प्रथम, जनता को बग़ावत से रोकने के लिए उन्हें बहुत से अधिकार दिए गये, दूसरे उनको भावनात्मक मुद्दों पर उलझाने की रणनीति पर काम हुआ। इसलिए 1970 के बाद आप दुनिया भर में धर्म आधारित आन्दोलन देखेंगे, जिसमें आतंकवादी आन्दोलन भी शामिल है।

भारत में जातीय और धार्मिक अंतर्विरोधों पर सियासत शुरू हुई एवं जनता के जीवन से जुड़े मुद्दे धीरे-धीरे गायब होते गये। 1990 के बाद हम देखते हैं कि जाति आधारित सियासत को मुस्लिम नफ़रत पर आधारित सियासत निगल जाती है। आज पूरा देश इस सियासत की गिरफ़्त में है। यहाँ दो और बातों पर ध्यान देने की ज़रूरत है। चूंकि धर्म आपकी भावनाओं से जुड़ा है, इसलिए सियासत को बड़ी चतुराई से धर्म के आवरण में लपेट दिया जाता है, मीडिया अमीरों की है इसलिए वो इस पूरी मुहिम को लगातार आप तक पहुंचाते हैं।

इस तरह की सियासत में हमेशा सामने एक दुश्मन खड़ा किया जाता है और उसके विरोध में एकता का आह्वान किया जाता है। पाकिस्तान जैसे देशों में शियाओं, कदियानियों और सेकुलरों को धर्म का दुश्मन क़रार दिया जाता है, भारत में ये काम मुसलमानों को दुश्मन बनाकर किया जाता है। धीरे-धीरे उन सियासी गतिविधियों को भी आप धर्म का हिस्सा मान लेते हैं, जो वास्तव में आपराधिक गतिविधियाँ होती हैं। एक और कमाल की बात होती है, धर्म आधारित सियासत जीवन से जुड़े मुद्दों पर बात नहीं करती।

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जब छात्र आन्दोलन कर रहे थे, जब नौजवान नोकरी के लिए आन्दोलन कर रहे थे, जब लोग कोरोना में मर रहे थे, जब लोग आक्सीजन के लिए तड़प रहे थे तब धर्म आधारित सियासत करने वाले समूह आपके साथ नहीं थे। हाँ, जनांदोलनों में इन्होंने राजसत्ता की ओर से मोर्चा जरूर संभाला, इन्होंने नागरिकता कानून का विरोध कर रहे नागरिकों पर हमला किया, यूनिवर्सिटीज के छात्रों पर हमला किया और किसान आन्दोलन में किसानों पर भी हमला किया। आज भी महंगाई, बेरोज़गारी और तरह-तरह की हिंसा को लेकर ये आपके साथ नहीं हैं। यानि ये बात साफ़ हो जानी चाहिए कि धर्म आधारित सियासत अमीरपरस्त निज़ाम की सुरक्षा में खड़ा किया गया है, जिसका काम है जनता को जनता के मुद्दों पर सोचने से रोकना ताकि जनता अपने हितों के लिए संघर्ष करने की न सोचे। अब आपको तय करना है कि अपने ही अड़ोस-पड़ोस के अपने ही जैसे परेशान लोगों से लड़ते हुए अपनी मुश्किलें और बढ़ानी है या मिलकर सबके सुखमय जीवन के लिए प्रयास करना है।

डॉ. सलमान अरशद स्वतंत्र पत्रकार हैं।

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