तानाशाही और इंसाफ (डायरी 17 जून, 2022) 

नवल किशोर कुमार

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संविधान और कानूनों की व्यवस्था किसी भी मुल्क के लिए सबसे अधिक जरूरी है। इसके जरिए न केवल आंतरिक सुरक्षा व सामाजिक सामंजस्य बनाए रखने में सहायता मिलती है बल्कि इसका असर बाहरी सुरक्षा पर भी पड़ता है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह हुकूमत की साख को बनाए रखने का उपक्रम भी है और जनसामान्य के लिए बंधन भी। लेकिन यह एकांगी बिल्कुल भी नहीं है। संविधान में जहां हुकूमत को तमाम ताकतें दी गयी हैं तो जनसामान्य के हितों की सुरक्षा की गारंटी भी है। यही कारण है कि आज भी कहीं कोई घटना घटित होती है तो जनसामान्य अदालत की ओर रुख करते हैं। उन्हें लगता है कि अदालतों में इंसाफ मिलेगा। इस लिहाज से देखें तो अदालतें भी देश की अंत: और बाह्य दोनों तरह की सुरक्षा सुनिश्चित करने में बेहद महतवपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
ऐसे ही भारतीय दंड संहिता में कुछेक प्रावधान किये गये हैं, जिनके तहत आरोपी की घर की कुर्की-जब्ती का आदेश जारी किया जाता है। ऐसे प्रावधान भी हैं, जिनका उपयोग करके किसी का घर ढाहा जा सकता है। लेकिन इसकी एक वैधानिक प्रक्रिया है। परंतु, इन दिनों देश में एक अलग तरह की कार्यप्रणाली हुकूमतों द्वारा अपनायी जा रही है। अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद (वर्तमान में इसका नाम प्रयागराज कर दिया गया है) में एक व्यक्ति का घर ढाह दिया गया। इस व्यक्ति पर हिंसक प्रदर्शन का मास्टरमाइंड होने का आरोप है।
इस घटना के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ट्वीट किया– ‘माहौल खराब करने की कोशिश करने वाले अराजक तत्वों के साथ पूरी कठोरता की जाएगी। ऐसे लोगों के लिए सभ्य समाज में कोई स्थान नहीं होना चाहिए। एक भी निर्दोष को छेड़ा नहीं जाएगा और कोई भी दोषी छोड़ा नहीं जाएगा।’ इसके पहले 21 अप्रैल, 2022 को देश की राजधानी दिल्ली के जहांगीरपुरी इलाके में ऐसे ही ऑन द स्पॉट इंसाफ करने का दावा किया गया। उनलोगों के घर और दुकानें ढाह दी गईं, जिन्होंने एक दिन पहले हुए विरोध प्रदर्शन में भाग लिया था। और इसके भी पहले मध्य प्रदेश सरकार ने बुलडोजर का उपयोग करते हुए ऐसे ही आरोपी प्रदर्शनकारियों का घर ढाह दिया था।

नफरत भरे भाषण लगभग हमेशा एक समुदाय की तरफ लक्षित होते हैं, जिससे उनकी मनोदशा पर प्रभाव पड़ता है, इससे उनमें भय पैदा होता है। घृणाास्पद भाषण लक्षित समुदाय के खिलाफ हमलों का शुरुआती बिंदु है, जो भेदभाव से लेकन निर्वासन और यहां तक कि नरसंहार हो सकते हैं। यह तरीका किसी विशेष धर्म या समुदाय तक ही सीमित नहीं है।

इतिहास में थोड़ा और ताक-झांक करें तो हम पाएंगे कि आज जो कुछ भी भाजपा शासित हुकूमतें कर रही हैं, वह पहले बिहार में नीतीश कुमार की हुकूमत कर चुकी है। दरअसल, वहां मई, 2016 में शराबबंदी कानून लागू किया गया। लेकिन अवैध तरीके से शराब बनाने और बेचनेवालों ने समानांतर व्यवस्था खड़ी कर दी। ऐसा करनेवालों में अधिकांश गरीब रहे और समाज के निचले तबके के लोग रहे। राज्य सरकार ने शराबाबंदी कानून के और सख्त बनाते हुए तय किया कि अब यदि कहीं भी शराब बनाने और बेचने की खबर मिली तो सरकार पूरे गांव/मुहल्ले के लोगों के खिलाफ मुकदमा करेगी। लेकिन सरकार का यह तरीका नहीं चल सका। फिर सरकार ने शराबबंदी कानून में संशोधन किया, जिसके तहत आरोपी के घर ढाहा जा सकता है। बड़े पैमाने पर यह किया भी गया। गरीब लोगों के घर बुलडोजर से ढाह दिये गये। पहले यह सरकार समझ रही थी कि ऐसे सख्त कदम का असर पड़ेगा और लोग शराबबंदी कानून का सम्मान करते हुए शराब पीना-बेचना बंद कर देंगे। लेकिन यह बहुत सख्त कदम था और जब इसका कोई सकारात्मक परिणाम सामने नहीं आया और सरकार के कृत्य की चहुंओर आलोचना हुई तब जाकर राज्य सरकार ने घरों को ढाहने जैसा ‘त्वरित न्याय’ को बंद किया।
बिहार का उपरोक्त उदाहरण यह दिखाता है कि त्वरित न्याय का बुलडोजर फार्मूला कामयाब नहीं रहा है। यह खास तबके के लोगों को आक्रोश से भर देता है। इसकी अभिव्यक्ति वे दूसरे रूप में करते ही हैं। लेकिन हालिया घटनाएं यह भी बताती हैं कि दमन के इस तरीके से लोगों का आंदोलन तो नहीं थमा, लेकिन वे अधिक संगठित और मजबूत हुए। बानगी के तौर पर हम चाहें तो किसानों के आंदोलन को कोशिश करने की सरकारी कोशिशों को देख सकते हैं। केंद्र सरकार हर हाल में तीन कृषि कानूनों को लागू करना चाहती थी। दूसरी तरफ किसान थे, जो दृढ़ इच्छाशक्ति से ओत-प्रोत थे। सरकार द्वारा वहां भी बुलडोजर की रणनीति का अनुपालन किया। सरकार ने न केवल सड़कों पर कंटेनर से लेकर कीलें तक गड़वा दी, यहां तक कि सड़कें भी खुदवा दी। यानी दमन के सारे तकनीक अपनाए गए, लेकिन किसानों के हौसले पर इसका असर तक नहीं पड़ा।
दरअसल, त्वरित न्याय की कार्यशैली न्यायपालिका के सिद्धांत के बिल्कुल विपरीत है। सामान्य प्रक्रिया तो यह है कि यदि किसी व्यक्ति ने कोई ऐसा अपराध किया है, जिसकी सजा उसके घर को ढाहने का प्रावधान है तो उसके लिए पहले उसके ऊपर लगे आरोपों की जांच और संपुष्टि होना अनिवार्य है। फिर इस दिशा में अदालतें अपना काम करती हैं।
दरअसल, हाल की घटनाएं इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं कि ऐसी अधिकांश घटनाएं खास धर्म के लोगों के खिलाफ हैं। हाल ही में भाजपा नेत्री रहीं नुपूर शर्मा का विवादित बयान, जिसके वायरल होते ही देश के अनेक हिस्सों में विरोध प्रदर्शन किये गये। जिस दिन इलाहाबाद में लोग जुटे थे, वैसी एकजुटता रांची और पटना में भी दिखी। रांची में भी हिंसक प्रदर्शन किया गया। इस प्रदर्शन के दौरान कुछ पुलिसकर्मियों को भी चोटें लगीं। बदले में राज्य पुलिस की गोली से तीन लोगों की मौत भी हो गई। पटना में कोई अप्रिय घटना इसलिए नहीं घटित हुई क्योंकि पुलिस पूरे प्रदर्शन को सुरक्षा प्रदान कर ही थी।

त्वरित न्याय का बुलडोजर फार्मूला कामयाब नहीं रहा है। यह खास तबके के लोगों को आक्रोश से भर देता है। इसकी अभिव्यक्ति वे दूसरे रूप में करते ही हैं। लेकिन हालिया घटनाएं यह भी बताती हैं कि दमन के इस तरीके से लोगों का आंदोलन तो नहीं थमा, लेकिन वे अधिक संगठित और मजबूत हुए। बानगी के तौर पर हम चाहें तो किसानों के आंदोलन को कोशिश करने की सरकारी कोशिशों को देख सकते हैं।

बहरहाल, नफरती और घृणास्पद बयानबाजी के मामले में दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश चंद्रधारी सिंह ने सोमवार को वृंदा करात द्वारा दायर एक याचिका की सुनवाई के दौरान सख्त टिप्पणी की है। जस्टिस चंद्रधारी सिंह ने अपने फैसले में यह कहा– ‘नफरत भरे भाषण लगभग हमेशा एक समुदाय की तरफ लक्षित होते हैं, जिससे उनकी मनोदशा पर प्रभाव पड़ता है, इससे उनमें भय पैदा होता है। घृणाास्पद भाषण लक्षित समुदाय के खिलाफ हमलों का शुरुआती बिंदु है, जो भेदभाव से लेकन निर्वासन और यहां तक कि नरसंहार हो सकते हैं। यह तरीका किसी विशेष धर्म या समुदाय तक ही सीमित नहीं है।’
जस्टिस चंद्रधारी सिंह
वहीं प्रयागराज में जावेद मोहम्मद का घर ढाहे जाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कल हस्तक्षेप किया है और उत्तर प्रदेश सरकार से तीन दिनों के अंदर जवाब मांगा है कि घर ढाहा जाना नगरपालिका कानूनों के अनुपालन में कैसे था। यह जवाब सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश एएस बोपन्ना और न्यायाधीश विक्रम नाथ की खंडपीठ ने मांगा है।
बहरहाल, यह उम्मीद करनी चाहिए कि हुकूमतें चाहे किसी भी दल अथवा गठबंधन की हों, यदि किसी ने कानून तोड़ा है तो उसके साथ कानून स्म्मत व्यवहार ही करेंगीं। यदि ऐसा नहीं किया गया तो विवादों का कोई समाधान नहीं हो सकेगा और देश में अराजकता फैलती ही जाएगी।

नवल किशोर कुमार फ़ॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

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