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वीरेंद्र यादव बनाम ज्वालामुखी यादव

आज सुबह अभी हम इलाहाबाद से आई प्रो राजेंद्र कुमार के न रहने की दुखद खबर से उबरे भी नहीं थे कि लखनऊ से प्रख्यात आलोचक वीरेंद्र यादव के जाने की स्तब्धकारी खबर आई। सहसा भरोसा करना मुश्किल था कि यह कैसे हो सकता है? दो दिन पहले उनके बीमार होने की सूचना मिली थी, लेकिन यह बीमारी इतनी घातक है यह न मालूम था। उनके जाने से बहुत कुछ खाली हो गया. वह गर्मजोशी से भरे बुद्धिजीवी थे जो केवल किताबी आलोचना तक सीमित नहीं थे, बल्कि लगभग सभी समकालीन मुद्दों पर लिखते और बोलते थे और बेलाग बोलते थे। उनके व्यक्तित्व के इन्हीं पहलुओं को छूता प्रख्यात कथाकार मधु कांकरिया की एक छोटी टिप्पणी जो उनके बहत्तरवें जन्मदिन पर चार साल पहले प्रकाशित की गई थी। आज पुनः उनको श्रद्धांजलिस्वरूप प्रकाशित की जा रही है।

लेखक के स्मृति चिन्हों की बदहाली के दौर में प्रेमचंद

गोरखपुर से प्रेमचंद का नाता बहुत भावप्रवण और आत्मीय था। यहीं पर उन्होंने जीवन की बुनियादी नैतिकता और आदर्श का पाठ सीखा। लेकिन आज गोरखपुर में उनके स्मृतिचिन्ह लगातार धूसरित हो रहे हैं। ऐसा लगता है नयी पीढ़ी की टेक्नोसेंट्रिक प्रवृत्ति ने उन्हें इस बात से विमुख कर दिया है कि उनके शहर में एक कद्दावर लेखक की जवानी के दिन शुरू हुये थे और वह लेखक पूर्वांचल की ऊर्जस्विता और रचनाशीलता को आज भी एक ज़मीन देता है। प्रेमचंद जयंती के बहाने अंजनी कुमार ने गोरखपुर की नई मनःसंरचना की पड़ताल की है।

जौनपुर: गाय-भैंसों के संकटमोचक  

हर काम का प्रशिक्षण नहीं लिया जाता, कुछ काम ऐसे होते हैं जो व्यक्ति स्थितियों को देखते-सुनते सीख लेता है। जौनपुर जिले के बेलापार गाँव के निवासी भानु प्रताप यादव ऐसे ही भगत परंपरा के आदमी है। जो गाय-भैंसों के बच्चे पैदा होते समय होने वाली परेशानियों का मिनटों में निपटारा करते हैं।

प्रेमचंद को याद करते हुए सर्व सेवा संघ ने अन्याय के खिलाफ बांटा पर्चा

वाराणसी। कथा सम्राट प्रेमचंद के गांव लमही में अनेक सरकारी और गैर सरकारी व्यक्ति, संस्थाएं जुटी हुई थीं। कहीं नाटक का मंचन हो रहा...

प्रेमचंद को याद करते हुये मणिपुर को कैसे भुलाया जा सकता है

आज के लोग कार्पोरेट से मिलकर या उनकी तरह काम कर रहे हैं : चौथीराम यादव  साम्प्रदायिकता प्रेमचंद के समय से नहीं अपितु कबीर के...

प्रेमचंद के गाँव लमही में अब प्रेमचंद को कोई नहीं पढ़ता

किसी जमाने में लमही एक गाँव था और प्रेमचंद ने बहुत सारे चरित्रों को इसी गाँव से उठाया। मसलन! गाँव में जो पोखरा दिखाई पड़ता है और रामलीला का जो मैदान है। हम समझते हैं कि उनकी प्रसिद्ध कहानी रामलीला में उसका जिक्र है। लमही के पास ही एक ऐसी बस्ती है, जहां से निकल कर ईदगाह का हामिद और उसके साथी नदेसर स्थित ईदगाह की तरफ रुख करते हैं।

भाजपा के चुनावी पैंतरे और सामाजिक न्याय से समर जीतने को तैयार समाजवाद

अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव को लेकर उत्तर प्रदेश की राजनीतिक पार्टियाँ अभी से अपनी सियासी जमीन तैयार करने में लग गई हैं।...

प्रेमचंद ने समाज की विसंगतियों से कलम के बल पर होड़ लिया – कृष्ण कुमार यादव

  वाराणसी। मुंशी प्रेमचंद एक साहित्यकार, पत्रकार और अध्यापक के साथ ही आदर्शोन्मुखी व्यक्तित्व के धनी थे। एक पत्रकार को कभी भी पक्षकार नहीं होना...

छोटे किसान क्यों लगातार बनते जा रहे हैं मजदूर

शहरों में बैठे जिन लोगों को लगता है कि खेती करना बहुत आसान है, ऐसे लोगों को प्रेमचंद की कहानी पूस की रात जरूर...

कफनचोर (डायरी 6 नवंबर, 2021)

साहित्य को लेकर एक सवाल मेरी जेहन में हमेशा बना रहता है। सवाल यही कि उस साहित्य को क्या कहा जाय, जिसके पात्र और...

सत्यनारायण पटेल भारतीय गांव के समकालीन हालात के चितेरे हैं

'लाल छींट वाली लुगड़ी का सपना' सत्यनारायण पटेल की दूसरी कहानी संग्रह है। इस संग्रह में चार कहानियां संकलित है- सपने के ठूँठ पर...

कितना झूठा था गाँव का मंजर

कभी गाँव को सहज, सरल और स्वाभाविक मानते हुए यह किवदंती प्रचलित हो गई थी कि भारत की आत्मा गांवों में निवास करती है।...

क्या आपने आधा बाजा पढ़ा है ?

अगर नहीं तो जरूर पढ़िए आधा बाजा रामजी यादव का कथा संग्रह है जिसमें कुल जमा 8 कहानियां है, सूदखोर के पांव, अंतिम इच्छा, अंबेडकर होटल, एक सपने की मौत, परजुनिया,आधा बाजा और उपनिवेश. रामजी यादव कौन हैं,  इनके व्यक्तित्व का विकास कैसे हुआ इस पर बात करने की जगह मैं सीधे कहानियों पर बात करना चाहूंगा और कहानियों पर बात करने से पहले मैं अपनी पाठकीय प्रतिक्रिया देना चाहूंगा।

कबीर से लेकर प्रेमचंद तक, सभी ने चुनौतियों का सामना किया

पथ जमशेदपुर के रंगकर्मी और निर्देशक निज़ाम का पिछले दिनों ऑल इंडिया थिएटर एसोसिएशन के वार्षिक सम्मेलन मे शामिल होने के लिए वाराणसी आना...

दिल्ली दंगा और यादव बनाम ब्राह्मण जज ( डायरी  15 अक्टूबर, 2021)

समाज को कैसे देखा और समझा जाय, इसका निर्धारण समाज के मानदंडों से ही होता है और ये मानदंड वे बनाते हैं जो समाज...

उत्तर भारत में पेरियार के बदले क्यों पूजे जाते हैं विश्वकर्मा? डायरी (17 सितंबर, 2021)  

बंगाल और बिहार में अनेकानेक सांस्कृतिक समानताएं हैं। फिर चाहे वह खाने-पीने का मामला हो या तीज-त्यौहारों का। भाषा में भी बहुत अधिक अंतर...

सहना को सरकारी सुविधा, हलकू अब भी कांप रहा है

प्रेमचंद का साहित्य आज भी कम प्रासंगिक नहीं हैं क्योंकि उस समय में और आज के समय में समस्याओं का स्वरूप बेशक बदल गया हो लेकिन समस्याएँ समाप्त नहीं हुई हैं। बल्कि कुछ समस्याएँ और गहरी हो गई हैं। ग्रामीण व शहरी बेरोज़गारी, बिना लाभ की खेती, दलितों व ग़रीबों का आर्थिक शोषण व उत्पीड़न, ऊँच-नीच व छूआछूत, अकर्मण्यता, अंधविश्वास व धार्मिक पाखण्ड, रिश्वतख़ोरी व भ्रष्टाचार आज भी ज्यों के त्यों बने हुए हैं। ग़रीबी का स्वरूप बदल गया है लेकिन ग़रीबी नहीं। खेतिहर किसान मज़दूर में बदल गया है। कुछ समस्याएँ ऐसी भी हैं जिनका स्वरूप तक नहीं बदला है।

राजेंद्र यादव को मैं इसलिए भंते कहता हूँ कि उन्होंने साहित्य में दलितों और स्त्रियों के लिए जगह बनाई

राजेंद्र यादव के बारे में मैं जब भी सोचता हूँ, प्रसिद्ध शायर शहरयार की ये पंक्तियाँ मेरे जेहन में उभरने लगती हैं - उम्र भर...

जो भी कन्ना-खुद्दी है उसे दे दो और नाक ऊंची रखो। लइकी हर न जोती ! (तीसरा हिस्सा)

मेरे अरियात-करियात की बहुत कम औरतें स्वतंत्र और आत्मचेतस रही हैं l मजबूरी में कोई-कोई विधवा स्त्री भले ही अपनी मर्ज़ी से अपना जीवन...

इंटरनेट के ज़माने में बटनिया साहित्य और प्रेमचंद

 प्रेमचंद की कविताएं-कल एक अगस्त को मुंबई से उषा आठले ने ज़ूम मीटिंग के माध्यम से देश के अलग-अलग भागों में बैठे इप्टा और...

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