Wednesday, February 28, 2024
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बातें कहानियों की, खिस्से भारत के मोदी की (डायरी 29 अक्टूबर, 2021)  

कहानी शब्द अपने आप में बहुत खास है। इस शब्द का निर्माण ‘कहना’ से हुआ है। मुझे लगता है कि इसका विकास नवपाषाण युग में हो गया होगा। लोग कहानियां कहने लगे होंगे। पूर्व पाषाण युग में भी कुछ कहानियां जरूर रही होंगी। यदि नहीं होतीं तो पत्थरों के बारे में मनुष्य कैसे जान पाता। […]

कहानी शब्द अपने आप में बहुत खास है। इस शब्द का निर्माण ‘कहना’ से हुआ है। मुझे लगता है कि इसका विकास नवपाषाण युग में हो गया होगा। लोग कहानियां कहने लगे होंगे। पूर्व पाषाण युग में भी कुछ कहानियां जरूर रही होंगी। यदि नहीं होतीं तो पत्थरों के बारे में मनुष्य कैसे जान पाता। लेकिन नवपाषाण युग में आदमी के पास कहानियां अधिक रही होंगी। मेरे इस अनुमान के पीछे नवपाषाण युग में बने पत्थरों के औजार वह दैनिक उपयोग की वस्तुएं हैं। हर औजार अथवा हथियार की कहानी रही होगी। फिर लोहे के बारे में जानकारी सामने आने के बाद तो निश्चित तौर पर कहानियां भी मजबूत हुई होंगी। कहानियों का विस्तार तब हुआ होगा जब कृषि का आविष्कार हुआ होगा। दरअसल कृषि लोगों को संगठित करती है और उन्हें स्थायित्व भी प्रदान करती है। खेती अकेले नहीं की जा सकती। आज भी खेती के लिए एक समूह की आवश्यकता होती है। यह इसके बावजूद कि आज खेती के लिए अत्याधुनिक उपकरण हैं। बैलों की आवश्यकता नहीं रही। रहट और करिंग जैसे उपकरण तो विलुप्त ही हो चुके हैं।

खैर, कहानियों पर ही फोकस रखते हैं। पहले की कहानियां कैसी रहती होंगी, इसका केवल अनुमान लगा सकता हूं। बचपन में मां सुनाया करती थी कहानियां। तब मां उन्हें कहानियां नहीं कहती थी, खिस्सा कहती थी। कहानियों से पहले जरूर यही शब्द रहा होगा। कहानी शब्द तो मेरे हिसाब से खड़ी हिंदी के अस्तित्व में अने के बाद ही आया है। कहना शब्द से कहानी को गढ़ दिया गया।

मां के खिस्सों में एक अलग तरह की दुनिया होती थी। कभी एक राजा होता था और वह घोड़े पर बैठकर जंगल में जाता होता था। रास्ते में उसे प्यास लगती तब वह एक कुएं के पास जाता और कुएं में उसे एक परी कैद में नजर आती। वह उसे बचाने की कोशिश करता और फिर एक जादूगर उसे कैद कर लेता था। जादूगर अपनी जान उस राजा के शरीर में डाल देता और फिर वह जब उस राजा के राज्य पहुंचता तब वह तरह-तरह के काम करता थ। कभी किसी आदमी को बकरा बना देता तो कभी बकरे को आदमी। और खुद को प्रचारित करता कि वह जादू सीखकर आया है। अपने जादू से वह पड़ोसी देशों के राजाओं को डराता था।

अब मेरी जेहन में तब सवाल रहता है कि मां के दिमाग में ऐसी बातें आती कहां से थीं। मेरी मां तो अनपढ़ है। उसने कोई साहित्य नहीं पढ़ा। उसने इतिहास भी नहीं पढ़ा। फिर राजा और उसके तमाम तरह के किस्से या फिर सात बहनों में सबसे छोटी फूल कुमारी की कहानी।

[bs-quote quote=”बचपन में मां सुनाया करती थी कहानियां। तब मां उन्हें कहानियां नहीं कहती थी, खिस्सा कहती थी। कहानियों से पहले जरूर यही शब्द रहा होगा। कहानी शब्द तो मेरे हिसाब से खड़ी हिंदी के अस्तित्व में अने के बाद ही आया है। कहना शब्द से कहानी को गढ़ दिया गया।” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

मेरा अनुमान है कि कहानियां ऊर्जा की तरह होती हैं और ऊर्जा संरक्षण सिद्धांत का अनुसरण करती हैं। हम कहानियों में वही पाते हैं जो हमारे अस्तित्व से जुड़ा है। यह कहानियों के कहानी होने का पारामीटर भी है। इस बर जब पटना जाऊंगा तो मां से जरूर पूछूंगा कि उसके जेहन में खिस्सों के पात्र और घटनाएं कहां से आते थे। हालांकि मां के एक संभावित जवाब के बारे में जानता हूं। मतलब यह कि वह यह कह सकती है कि उसे सारे खिस्से उसकी मां, दादी या नानी ने सुनायी होगी।

खैर मां जो भी जवाब देगी, मेरे लिए वह महत्वपूर्ण होगा। फिलहाल मैं एक घटना के बारे में सोच रहा हूं। मुमकिन है कि यह घटना भी किसी दिन कहानी का रूप ले ले। यह कहानी दिल्ली के जहांगीरपुरी इलाके की है। दिल्ली पुलिस ने एक वकील के घर से करीब एक महीने की बच्ची को मुक्त कराया है। मुक्त करायी गयी बच्ची की मां आदिवासी है। उसका पिता भी आदिवासी है। जब वह बच्ची छह दिन की थी तब उसके पिता ने उसे केवल पांच हजार रुपए में बेच दिया। हालांकि बच्ची की मां ने पुलिस को जानकारी दी है कि उसके पति ने झूठ बोलकर बच्ची को बेचा और पैसे लेकर रांची भाग गया। वहीं वकील का कहना है कि उसने इस बच्ची को डेढ़ लाख में खरीदा है। इस पूरे मामले में जो बात सामने आयी है, वह यह कि बच्ची को उसके पिता ने एक दूसरी महिला को बेचा। यह मुमकिन है कि पांच हजार रुपए की बात झूठ हो और उसने अपनी बच्ची को अधिक पैसे में बेचा हो। बच्ची की मां का कहना है कि इसके पहले भी उसे बेटी हुई थी, जिसे उसके पति ने बेच दिया था। लेकिन बाद में उसकी मौत हो गयी थी।

मैं सोच रहा हूं कि उपरोक्त घटना जो कि एक कहानी का स्वरूप धारण कर चुकी है और मुमकिन है कि जहांगीरपुरी के शाहबाद इलाके के लोग एक-दूसरे को सुना रहे होंगे। कहने-सुनने वालों में बच्चियां भी होंगी। जब वे इस कहानी को सुनेंगी तो उनकी जेहन में क्या असर होगा? यही ना कि बेटी होने का मतलब ही गलत है।

[bs-quote quote=”जराइल के राजदूत ने यह साफ कर दिया है कि पेगासस के खरीदार केवल और केवल सरकारें हो सकती हैं। इसे किसी भी गैर सरकारी संगठन को नहीं बेचा जा सकता है। हालांकि गिलोन ने कहा है कि पेगासस को लेकर भारत में जो चल रहा है, वह भारत का अपना आंतरिक मामला है। इससे इजराइल को कुछ लेना-देना नहीं है।” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

कहानियों से एक बात याद आयी। कल भारत में इजराइल के नवनियुक्त राजदूत नाओर गिलोन ने अपना बयान दिया है। उनका बयान भी एक अजीब सी कहानी का हिस्सा हो चुका है। कहानी यह कि भारत में एक राजा है और उसके उपर आरोप है कि उसने दूसरे देश इजराइल की कंपनी एनएसओ के द्वारा बनाए गए सॉफ्टवेयर पेगासस के जरिए अपने ही देश के लोगों, जिनमें मुख्यमंत्रियों, मुख्य चुनाव आयुक्त, आइएएस, आईपीएस और सामाजिक कार्यकर्ताओं के फोन की जासूसी करवायी। चूंकि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक कमेटी का गठन कर दिया है तो मुझे लगता है कि इस कहानी में अभी बहुत कुछ आना शेष है।

फिलहाल तो यह इजराइल के राजदूत ने यह साफ कर दिया है कि पेगासस के खरीदार केवल और केवल सरकारें हो सकती हैं। इसे किसी भी गैर सरकारी संगठन को नहीं बेचा जा सकता है। हालांकि गिलोन ने कहा है कि पेगासस को लेकर भारत में जो चल रहा है, वह भारत का अपना आंतरिक मामला है। इससे इजराइल को कुछ लेना-देना नहीं है।

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तो एक तरह से यह तो साफ है कि पेगासस की खरीद भारत सरकार के स्तर पर ही की गयी है और इसके आधार पर यदि राहुल गांधी के बयानों को देखें कि कैसे पेगासस के उपयोग से कर्नाटक में सरकार पलट दी गयी तो असली खतरा हमारे सामने आता है। यह खतरा है हमारे लोकतंत्र के ऊपर। हमारे देश में प्रधानमंत्री जब पद ग्रहण करता है तो उसके पहले उसे शपथ दिलायी जाती है कि देश से संबंधित जो भी जानकारियां उसके संज्ञान में आती हैं अथवा लायी जाती हैं तो वह उन्हें गोपनीय बनाए रखेगा। लेकिन नरेंद्र मोदी ऐसे पीएम के रूप में सामने आए हैं जो इस शपथ का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन करते दिख रहे हैं। और दिलचस्प यह कि वे तथा उनके सहयोगी बार-बार यह कहते फिर रहे हैं कि नरेंद्र मोदी सबसे सफल प्रधानमंत्री हैं।

कुल मिलाकर पेगासस की कहानी बड़ी दिलचस्प होनेवाली है। कल एक कविता जेहन में आयी। कविता का शीर्षक है– सोने की पानी वाले टिन के चश्मे बांट रही हुकूमत। इस कविता में उस बच्ची की कहानी भी है जिसे उसके पिता ने बेचा दिया और पेगासस का खिस्सा भी।

शहर में सब ठीक हो

इसकी गारंटी हुकूमत नहीं दे सकती

और हुकूमत का काम

रोटी देना और आंखों में नींद सुनिश्चित करना नहीं है

और यदि ऐसा कुछ किसी संविधान में लिखा भी है तो

हुकूमत जानती है 

आइंस्टीन के ई इक्वल टू एमसी स्कवॉयर का फार्मूला

और उसे पता है कि

काम की गणना का सूत्र क्या है

अब यह काम हुकूमत का नहीं है कि

वह काम भी करे और हिसाब भी रखे कि

बल कितना लगाया गया

और संसद कितनी दूर रेंगी।

हुकूमत ने काम का आंकड़ा

अखबारों में घोषित कर रखा है

और बल का परिमाण बताने का ठेका 

चाणक्यों के पास है

अब यह काम तुम्हारा है इस मुल्क के लोगों कि

तुम दूरी की गणना करो

और तुम्हें यदि कोई परेशानी हो तो

टिन के चश्मे पहन लो

मुंह पर टेप लगा लो

और रेंगते रहो

किसी कीड़े-मकोड़े की तरह।

तुम इंसान हो या कीड़े-मकोड़े,

यह तय करना तुम्हें है

सरकार ने तुम्हारा ठेका नहीं ले रखा है।

सरकार के हिस्से में है

सोने की परत वाली 

टिन के चश्मे बांटने का काम

और तुम्हें यदि नहीं चाहिए

और तुम वरवरा राव की तरह

कविताएं लिखोगे

तो सरकार तुम्हारी आंखें फोड़ देगी।

लेकिन मैं अब भी कहता हूं

तुम्हें कविताएं चाहिए या अपना अंधापन

यह फैसला तुम्हारा है

आंखें तुम्हारी हैं

कविताएं तुम्हारी हैं

और यह जो मुल्क है

वह भी तुम्हारा ही है।

 नवल किशोर कुमार फॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं ।

गाँव के लोग
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