यूक्रेन-रूस युद्ध का आज अंतिम दिन, लेकिन चर्चा पश्चिम बंगाल में चल रहे अजीबाेगरीब जंग की (डायरी 26 फरवरी, 2022)

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पश्चिम बंगाल विधानसभा का बजट सत्र आगामी सात मार्च को शुरू होगा। जाहिर तौर पर यह एक बेहद सामान्य खबर है। लेकिन इस खबर का अगला वाक्य इस खबर को सबसे खास बना देता है। अगला वाक्य यह है कि– बजट सत्र रात के दो बजे से शुरू होगा। है न बेहद दिलचस्प खबर? दरअसल, वहां के राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने ऐसा आह्वान अपनी मर्जी से नहीं किया है। उनका कहना है कि राज्य मंत्रिपरिषद द्वारा भेजे गए अनुरोध में सत्र की शुरुआत रात के दो बजे से करने की बात कही गयी थी, जिसे उन्होंने मान लिया है। हालांकि राज्य सरकार के मुख्य सचिव एच के द्विवेदी ने राज्यपाल को एक अैर अनुरोध पत्र भेजा, जिसमें उन्होंने यह लिखा कि मंत्रिमंडल के अनुरोध में टंकन त्रुटि थी। अतएव सत्र रात के दो बजे नहीं बल्कि अपराह्न दो बजे किया जाय।

पश्चिम बंगाल ने केंद्र को जबरदस्त चुनौती दे रखी है। यह भारतीय संघीय व्यवस्था में दोष को भी उजागर करता है। दरअसल, भाजपा के नेता रहे जगदीप धनखड़ पश्चिम बंगाल के राज्यपाल से अधिक वह केंद्र सरकार के एजेंट के रूप में काम कर रहे हैं। वहां आए दिन राज्यपाल और राज्य सरकार के बीच टकराव की खबरें आती रहती हैं। हालांकि यह तो अच्छा है कि वहां यूक्रेन और रूस जैसे हालात नहीं हैं। पश्चिम बंगाल भारत का एक प्रांत ही है और वहां की राज्य सरकार भी भारतीय संघीय व्यवस्था को मानती है। अब यह एक बड़ा सवाल है कि टंकन त्रुटि की वजह से राज्य मंत्रिपरिषद के अनुरोध पत्र में रात दो बजे का उल्लेख हुआ है या फिर राज्य मंत्रिपरिषद ने जानबूझकर ऐसा किया? यह सवाल इसलिए भी कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का सियासी आचरण भी कुछ कम नहीं रहा है। मौजूदा केंद्र सरकार के प्रति तो उनका रवैया स्वयं केंद्र सरकार से भी अधिक तीखा है। नरेंद्र मोदी हुकूमत तो खैर पहले से ही मर्यादाओं की सारी सीमाएं लांघ चुकी है।

नीतीश कुमार की मजबूरी है अैर दूसरी यह कि उनका स्वभाव महीन सियासतदान का है। वह सीधे से कभी हमला नहीं करते। पीठ में खंजर भोंकते आए हैं। पहले लालू प्रसाद के पीठ में खंजर भोंका। जार्ज फर्नांडीस को तो उन्होंने मार ही दिया। मारने का मतलब यह नहीं कि उनकी हत्या कर दी, बल्कि यह कि उनकी पूरी राजनीति समाप्त कर दी। शरद यादव जो कि उनकी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हुआ करते थे, उन्हें ऐसे दर-ब-दर किया कि बेचारे शरद यादव को हाल ही में कहना पड़ा कि दिल्ली में उनके पास अपना कोई घर नहीं है, अब कहां जाएं?

कायदे से होना यह चाहिए था कि राज्यपाल को राज्य मंत्रिपरिषद के अनुरोध को वापस कर देते और राज्य सरकार को ताकीद करते कि टंकन त्रुटियों का ध्यान रखें। यह इसके बावजूद भी यदि ममता बजर्नी मंत्रिमंडल ने आपे से बाहर होते हुए रात के दो बजे बजट सत्र आरंभ करने की बात कही थी। राज्यपाल को अपने पद की गरिमा का ख्याल रखना ही चाहिए। वह किसी दल का कोई आम कार्यकर्ता नहीं होता। वैसे राज्य मंत्रिमंडल को भी अपने गुस्से पर नियंत्रण रखना ही चाहिए। सियासी मतभेद तो बेहद सामान्य हैं।

बिहार में ही देखिए कि कितना मतभेद है वहां के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और वहां के राज्यपाल फागू चौहान के बीच। अभी हाल ही में गुप्त सूत्रों से जानकारी मिली कि बिहार के विश्वविद्यालयों में लूट-खसोट के संबंध में मुख्यमंत्री ने कुलाधिपति यानी राज्यपाल से बातचीत की। इस संदर्भ में राज्यपाल ने उन्हें साफ-साफ कह दिया कि मुख्यमंत्री राजभवन के काम में हस्तक्षेप न करें। यदि राज्यपाल भाजपा के नहीं होते और नीतीश कुमार भाजपा के पिछलग्गू नहीं होते तो निश्चित तौर पर वे कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते।

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लेकिन एक तो नीतीश कुमार की मजबूरी है अैर दूसरी यह कि उनका स्वभाव महीन सियासतदान का है। वह सीधे से कभी हमला नहीं करते। पीठ में खंजर भोंकते आए हैं। पहले लालू प्रसाद के पीठ में खंजर भोंका। जार्ज फर्नांडीस को तो उन्होंने मार ही दिया। मारने का मतलब यह नहीं कि उनकी हत्या कर दी, बल्कि यह कि उनकी पूरी राजनीति समाप्त कर दी। शरद यादव जो कि उनकी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हुआ करते थे, उन्हें ऐसे दर-ब-दर किया कि बेचारे शरद यादव को हाल ही में कहना पड़ा कि दिल्ली में उनके पास अपना कोई घर नहीं है, अब कहां जाएं?

वैसे नीतीश कुमार के मामले में मध्यांतर हो चुका है और गोल पोस्ट भी बदले जा चुके हैं। भाजपा अब उनके पीछे पड़ गई है। अभी हाल ही में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला बिहार विधानसभा के कार्यक्रम में शामिल होने गए थे। वहां उन्हें अशोक स्तंभ के उपर स्वास्तिक के निशान वाला स्मृति चिन्ह दिया गया। दिलचस्प यह कि उस समय नीतीश कुमार भी मौजूद थे। जाहिर तौर पर नीतीश कुमार इतने बेवकूफ तो नहीं ही हैं कि यह नहीं समझते हैं कि अशोक स्तंभ पर स्वास्त्तिक निशान का मतलब क्या है।

रूसी सेना लगभग यह लड़ाई जीत चुकी है। वहां के राष्ट्रपति # भूमिगत हो चुके हैं। रूसी सेना ने राजधानी कीव पर एक तरह से कब्जा कर लिया है। जेलेंस्की ने पुतिन को वार्ता के लिए अनुरोध किया है जबकि पुतिन ने शर्तें रख दी हैं कि पहले यूक्रेनी सेना आत्मसमर्पण करे। उधर नाटो रूस की सामरिक क्षमता से घबरा गया है और उसे डर है कि कहीं रूस यूरोप की तरफ आगे न बढ़ जाए। इसे देखते हुए नाटो ने चालीस हजार से अधिक सैनिकों – जिनमें थल सेना, वायु सेना और जल सेना भी शमिल हैं – को पूर्वी यूरोप की सीमाओं पर तैनात कर दिया है।

लेकिन पश्चिम बंगाल और केंद्र के बीच जो हालात हैं, मुझ जैसे पत्रकार के लिए मजेदार भी है और चिंतनीय भी। राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने राज्य सरकार के मुख्य सचिव के अनुरोध खारिज करने के बाद ट्वीट कर कहा कि ‘संवैधानिक दृष्टिकोण से, मुख्य सचिव के अनुरोध पर कोई संज्ञान नहीं लिया जा सकता, जिसमें कैबिनेट के निर्णय में बदलाव का अनुरोध किया गया है और अधिकार क्षेत्र की कमी के कारण इसे वापिस किया जा रहा है।’

अब इस आधार पर देखें तो धनखड़ गलत नहीं दिखते हैं। लेकिन वे गलत हैं। वे एक अदना कार्यकर्ता की भूमिका निभा रहे हैं। उन्हें राज्यपाल की तरह व्यवहार पहले ही करना चाहिए था, जब उन्हें अनुरोध पत्र मिला था। राज्य सरकार की टंकन संबंधी त्रुटि की स्वीकारोक्ति से पहले ही इस मामले को खत्म किया जा सकता था। लेकिन वहां तो न तो राज्यपाल को अपने पद की गरिमा का ख्याल है और ना ही राज्य सरकार को।

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खैर, आज की डायरी में यूक्रेन से संबंधित खबर भी दर्ज करता हूं। रूसी सेना लगभग यह लड़ाई जीत चुकी है। वहां के राष्ट्रपति # भूमिगत हो चुके हैं। रूसी सेना ने राजधानी कीव पर एक तरह से कब्जा कर लिया है। जेलेंस्की ने पुतिन को वार्ता के लिए अनुरोध किया है जबकि पुतिन ने शर्तें रख दी हैं कि पहले यूक्रेनी सेना आत्मसमर्पण करे। उधर नाटो रूस की सामरिक क्षमता से घबरा गया है और उसे डर है कि कहीं रूस यूरोप की तरफ आगे न बढ़ जाए। इसे देखते हुए नाटो ने चालीस हजार से अधिक सैनिकों – जिनमें थल सेना, वायु सेना और जल सेना भी शमिल हैं – को पूर्वी यूरोप की सीमाओं पर तैनात कर दिया है।

बहरहाल, यूक्रेन में युद्ध का आज अंतिम दिन हो सकता है। संभव है कि इसका एलान आज हो जाये। वैसे मैं भी यही चाहता हूं कि युद्ध खत्म हो। वजह यह कि लोग मारे जा रहे हैं। कल ही एक कविता सूझी–

जो घिर जाते हैं युद्ध में

ईश्वर की बाट नहीं जोहते

देखने लगते हैं आसमान और जमीन

तलाशने लगते हैं कोई कोना ताकि

अगर बारूद का गोला गिरे तो

बच सके जान

फिर करते हैं इंतजार

टैंकों के आगे बढ़ने का

और फिर खुद निकल पड़ते हैं

उधर जिधर से नहीं होता कोई रास्ता

और वे लोग हुक्मरान नहीं होते कि

उनके लिए खाली रहेंगे बंकर

और बंकर में होगी

आराम से सांस लेने की जगह

वे तो बस भागते रहते हैं

अपने बच्चों को पीठ पर लाद

गोया उनके भागते रहने से

युद्धोन्मादी फतह की तसल्ली कर लेंगे।

हर बार ऐसा ही होता है

जब कहीं युद्ध होता है

बच्चे रोते हैं

दूध के लिए

अनाज के लिए

माताएं खोजती हैं अनाज

इस डर के साथ कि

कहीं उसके बच्चे 

घर से बाहर ना निकल जाएं

और कोई गोली

उनके बच्चे को बेध दे

और पिताओं को रखना पड़ता है

अपना कलेजा मजबूत ताकि

अगर कोई गोली चले तो

अपना कलेजा सामने कर सकें।

सचमुच कितना अजीब होता है युद्ध

और कितने अजीब होते हैं

युद्ध करनेवाले?

नवल किशोर कुमार फॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।
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