Wednesday, May 29, 2024
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भारत के ब्राह्मणों से कम नहीं हैं पश्चिम के श्वेत (डायरी  5 अक्टूबर, 2021)  

बीता हुआ कल सिर्फ मेरे लिए ही नहीं, दुनिया भर के लोगों के लिए महत्वपूर्ण रहा। देर शाम करीब सवा नौ बजे सोशल मीडिया के तीन महत्वपूर्ण माध्यमों फेसबुक, व्हाट्सएप और इंस्टाग्राम ने काम करना बंद कर दिया। हालांकि प्रारंभ में मुझे ऐसा लगा कि इंटरनेट की समस्या के कारण ऐसा हो रहा है, लेकिन […]

बीता हुआ कल सिर्फ मेरे लिए ही नहीं, दुनिया भर के लोगों के लिए महत्वपूर्ण रहा। देर शाम करीब सवा नौ बजे सोशल मीडिया के तीन महत्वपूर्ण माध्यमों फेसबुक, व्हाट्सएप और इंस्टाग्राम ने काम करना बंद कर दिया। हालांकि प्रारंभ में मुझे ऐसा लगा कि इंटरनेट की समस्या के कारण ऐसा हो रहा है, लेकिन वजह तो कुछ और ही थी। थोड़ी ही देर में वैश्विक स्तर पर इसकी जानकारी मिलनी शुरू हो गई। चूंकि ट्विटर काम कर रहा था तो बड़ी संख्या में लोग इसके जरिए अपने विचार रख रहे थे। लेकिन मैं एक बात से दंग रह गया और यह सोचने को मजबूर हो गया कि भेदभाव के मामले में पश्चिम के देश हमारे अपने देश भारत से बहुत आगे हैं। वहां इतनी नफरत और घृणा है, इसकी जानकारी भी कल ही देखने को मिली।

दरअसल, भारत में भेदभाव जाति, धर्म और लिंग आदि के आधार पर किया जाता है। यह सर्वविदित भी है कि मनुवादी समाज होने के कारण भेदभाव इतना अधिक है कि एक इंसान दूसरे के स्पर्श मात्र से दूषित हो जाता है। नफरत इतनी है कि यदि कोई दलित घोड़ी पर चढ़कर शादी करने जाता है तो उसकी मूंछें उखाड़ ली जाती हैं। उसके साथ मारपीट की जाती है। घृणा और नफरत की पराकाष्ठा ही कहिए कि हरियाणा के हिसार में करीब सात साल पहले एक दलित का हाथ काट दिया गया था। उसका अपराध केवल इतना था कि उस दलित ने प्यास लगने पर एक सवर्ण के घड़े से पानी निकालकर पी लिया था जो कि सवर्ण ने पुण्य कमाने के लिए प्याऊ के रूप में अपने घर के आगे रखा था। भेदभाव, नफरत और घृणा से भरी ऐसी खबरें खत्म होने का नाम नहीं लेती हैं। उन्मादियों ने इस घटना का भी वीडियो बनाया।

[bs-quote quote=”अभी तो एकदम हाल ही में दिल्ली के ही नजदीक उत्तर प्रदेश की सीमा में ब्राह्मणों के मंदिर में एक मुसलमान बच्चे को तबतक मारा-पीटा गया जबतक कि वह अधमरा न हो गया। हैवानियत की पराकाष्ठा का प्रदर्शन करनेवालों ने इस पूरी घटना का वीडियो बनाया और अपने बाप का राज समझते हुए उस वीडियो को सोशल मीडिया पर इस मकसद से डाल दिया ताकि अन्य मुसलमान उनसे खौफ खाएं। इसी तरह की एक घटना और भी सामने आयी थी। वह भी नोएडा इलाके में ही। एक बूढ़े मुसलमान जो कि फेरीवाला था और घूमघूमकर कपड़े बेचता था, उसे जयश्री राम कहने के लिए मजबूर किया गया और उसकी दाढ़ी नोंची गयी।” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

नफरत और घृणा को रेखांकित करतीं ये घटनाएं केवल दिल्ली-एनसीआर तक सीमित नहीं हैं। देश के सभी हिस्से में यह व्याप्त है। मैं तो बिहारवाला हूं। वहां से मेरे पास हर सप्ताह खबर आती ही रहती है कि केवल जातिगत दुर्भावना से ग्रस्त होकर दलितों पर कहर ढाया गया है। हाल की एक घटना ने तो मुझे यह सोचने पर मजबूर कर दिया था कि आदमी कैसा होगा, यह समय के साथ बदलते उसके परिवेश पर भी निर्भर करता है। घटना भोजपुर जिले के जगदीशपुर की थी। एक कुशवाहा जाति के मुखिया जो कि एक गाड़ी पर सवार था, उसे नट जाति के लोगों को कुचलने की कोशिश की थी। लोगों ने उसका विरोध किया तो नटों की पूरी बस्ती पर हमला बोल दिया। महिलाओं को घरों से खींचकर मारा-पीटा गया। जवान लड़कियों के साथ बदतमीजी उनके परिजनों के सामने ही की गई। अब इस घटना के आरोपियों के पक्ष में यदि कोई ऐसा नेता सामने आए जो कि खुद को उस महान क्रांतिकारी का रिश्तेदार बताता है जिसने बिहार में सामंतवाद के खिलाफ निर्णायक लड़ाई की शुरूआत की। इस नेता का नाम है भगवान सिंह कुशवाहा और जिस महान क्रांतिकारी की बात मैं कह रहा हूं वह कोई और नहीं जगदीश मास्टर थे। जगदीश मास्टर ने ही रामनरेश राम और रामेश्वर अहीर के साथ मिलकर 1970 के दशक में नक्सलवादी आंदोलन का बिगुल फूंका था।

खैर, भारत में ऐसी घटनाएं होती हैं तो मन दुखी से अधिक आक्रोशित होता है। परंतु कल तो मैं हैरान रहा गया। विश्व स्तर पर नस्लभेद कितना गहरा है, यह देखकर। दरअसल हुआ यह कि विश्व भर के लोगों की तरह मैं भी ट्विटर को देख रहा था। मैं ट्विटर का उपयोग सूचनाएं पाने के लिए करता हूं। इसकी भी वजह है। वजह यह कि भारत के तमाम नेता जिनमें छुटभैया नेताओं से लेकर प्रधानमंत्री के पद पर बैठे व्यक्ति भी खुद से जुड़ी सूचनाएं साझा करते हैं। तो कल नरेंद्र मोदी की अंतरात्मा सोती हुई मिली।

[bs-quote quote=”कल मैं यह देखना चाहता था कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी की घटना, जिसमें आठ लोग मारे गए हैं और आरोप उनकी कैबिनेट में शामिल एक सदस्य पर भी है। सरकार तो कटघरे में है ही। लेकिन मैंने देखा कि मोदी ने मारे गए लोगों के बारे में कोई टिप्पणी नहीं की है। खैर, मोदी की अंतरात्मा मेरे गृह प्रदेश बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अंतरात्मा के जैसी है। वह सियासत के हिसाब से जगती है और सियासत के हिसाब से ही सोती रहती है।” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

 

ट्विटर की खासियत यह है कि यह केवल वांछित जानकारी ही नहीं देता है, अनेकानेक सूचनाएं खुद-ब-खुद दे देता है। ट्विटर पर मोदी की अंतरात्मा के सोने के अलावा यह जानकारी भी मिली कि लोग फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग की आलोचना कर रहे हैं। एक महत्वपूर्ण टिप्पणी जैक डोरसे, जो कि ट्वीटर के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं, के द्वारा दी गयी थी। उन्होंने एक ऐसे ट्वीट पर टिप्पणी की थी, जिसमें यह लिखा था कि फेसबुक डॉट कॉम का डोमेन बिक्री के लिए उपलब्ध है। डोमेन का मतलब वह टेक्सट जो कि इंटरनेट के ब्राउजर में हम डालते हैं। ठीक वैसे ही जैसे जीमेल को हासिल करने के लिए हमें जीमेल डॉट कॉम टाइप करना होता है, वैसे ही फेसबुक का उपयोग करने के लिए एफबी डॉट कॉम अथवा फेसबुक डॉट कॉम टाइप करते हैं। डोरसे ने अपनी टिप्पणी में लिखा- कितना?

जैक डोरसे वाली टिप्पणी तो बेहद सामान्य टिप्पणी थी। लेकिन अन्य अधिकांश टिप्पणियों में जो तस्वीर मार्क जुकरबर्ग की आलोचना करने के लिए लगाए गए थे, उनमें अश्वेत नागरिक थे। कुछ टिप्पणियां बेहद अपमानजनक थीं और उन्हें प्रतिबिंबित करने के लिए अश्वेत नागरिकों की तस्वीरें। वहीं कुछ टिप्पणियां जिनमें भाव यह था कि मार्क जुकरबर्ग जबतक फेसबुक और व्हाट्सएस का सर्वर ठीक करें, तबतक वे सो रहे हैं। ऐसी टिप्पणियों में श्वेतों ने अपनी तस्वीरें लगाई थीं। कुछेक भारतीय ब्राह्मणों ने तो इस मौके पर पाकिस्तान के झंडे का भी उपयोग किया।

खैर जब मैं ब्राह्मण कहता हूं तो उसमें केवल वे ब्राह्मण ही शामिल नहीं होते हैं, जो जनेऊ पहनते हैं। इनमें ऊंची जातियों के लोग और ओबीसी जातियों के वे लोग भी शामिल हैं जो दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों पर जुल्म करते हैं। मैं कल इस शब्द को लेकर भी विचार कर रहा था। ब्राह्मणों को द्विज ही कहना चाहिए या फिर सवर्ण कहने से काम चल जाएगा।बहरहाल, इस शब्द को लेकर मेरा दिमाग अपना काम करता रहेगा। यूपी के लखीमपुर खीरी में हुई घटना के दस्तावेजीकरण के उद्देश्य से मैंने एक कविता भी लिखी।

यूपी के लखीमपुर खीरी में मारे गए लोग

इसलिए मारे गए क्योंकि वे शासक नहीं थे।

इस देश में मारा वही जाता है

जो किसान होता है

मजदूर होता है

बेरोजगार होता है।

हां, नेताओं की हत्या भी होती है

लेकिन वे सचमुच के अपवाद होते हैं!

नवल किशोर कुमार फॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

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