सदियों में पैदा होते हैं हीरालाल          

बैजनाथ यादव

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बहुत दिनों तक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझते हुए अंततः चच्चा चले गए। चच्चा माने भोजपुरी के महान बिरहिया हीरालाल यादव। मुझे उनके नजदीक आने का जब मौका मिला तो यह इतनी बड़ी बात में बदल गया कि यह रिश्ता चाचा-भतीजे के रिश्ते में फूलता-फलता रहा। शायद ही मेरे यहां कोई मांगलिक काम-परोजन हो और चच्चा उसमें न शामिल हुये हों। वे मेरे लिए बनारस में अभिभावक थे। मेरा परिवार हमेशा उन्हें अपने बुजुर्ग का सम्मान देता रहा है। उनका जाना मेरे लिए बहुत बड़ी क्षति है। निजी रूप से वह केवल मुझे ही नहीं सम्पूर्ण बिरहा जगत और दुनिया भर में फैले उनके श्रोताओं और प्रशंसकों के लिए भी अकेला हो जाने का गहरा अहसास है। वे बिरहा के सम्राट थे और उनका होना ही लोकसंस्कृति के गौरव की उपस्थिति थी। उनके जैसा कोई दूसरा नहीं था।

पिछले दिनों मेरे छोटे भाई गाँव के लोग के संपादक रामजी यादव ने कई बार मुझसे कहा कि भईया चलिये, एक दिन चच्चा के यहां हो आया जाय। उस दिन हम दोनों उनसे मिलने गए और वह बहुत हृदयविदारक अनुभव था। उनके बड़े बेटे रामजी को बुलवाया गया और हालचाल के बाद वे हमें उस उस कोठरी के सामने ले गए, जिसमें चच्चा अकेले अपनी चारपाई पर बैठे थे। निपट अकेले, उदास और शून्य को ताकते हुये। उस समय वे अपने आप से न जाने क्या बातें कर रहे थे। दरवाजे की सांकल नहीं खोली गई क्योंकि रामजी ने बताया कि दरवाजा खोलते ही वे तुरंत निकल पड़ते हैं और बेचैन होकर बाहर भागने लगते हैं। कई बार तो उन्हें संभालना मुश्किल हो जाता है। इसलिए सांकल खोलना खतरे से खाली नहीं था। खिड़की खुली थी और वहीं बाहर से हमने हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया और निःशब्द देर तक खड़े रहे। आंखों से आंसू निकल पड़े लेकिन मुंह से शब्द नहीं निकले। क्या कहते? किससे कहते? ऐसी स्थिति में चच्चा को देखना कितना यातनादायक था इसे शब्दों में व्यक्त नहीं कर पा रहा हूं। पिछले चार दशक की न जाने कितनी स्मृतियां थीं जो उमड़-घुमड़ रही थीं और मन भींग रहा था।

मैं आजमगढ़ के एक गांव से बनारस आया था। काका गोला दीनानाथ में पल्लेदारी करते थे। वे हाथ से खींचे जानेवाले ठेले पर लादकर बोरे-बोरियों को पहुंचाते थे। बचपन में जब मैं बनारस आया तो काका ने अपने ठेले पर बिठाकर मुझे सारा शहर घुमाया। शहर की सारी सड़कों पर काका के पांवों के निशान थे। काका के पास रहकर मैंने पढ़ाई शुरू की। यहीं रहकर मैंने जाना कि दूरदराज़ से बनारस में कमाने वाले श्रमजीवियों ने कैसे और किस मशक्कत से अपने परिवार को पाला और अपनी पीढ़ियों के भविष्य की नई कहानियां लिखी। वे बनारस के अहीर नहीं थे कि गमछा बांधकर शहरी होने की हनक में दूसरों पर रौब झाड़ें और राजा बनारस का रथ खींचकर गौरव महसूस करें। वे सब लोग धरती की कर्मठ संतान थे। अपनी मेहनत से शहर की अर्थव्यवस्था में उन्होंने बहुत कुछ जोड़ा है। शाम को जब, सब लोग जुटते तो खाना बनाते और तरह तरह की बातों, किस्सों और गीत गवनई से माहौल गुलजार हो उठता था। वहीं रहकर मैंने यहां की लोकसंस्कृति और समाज की तकलीफ़ों का मर्म जाना। बाद में मैंने बीएचयू से कानून की पढ़ाई की और मेरे लिए एक नई दुनिया का द्वार खुलना शुरू हुआ।

बिरहा के नायक हीरालाल जी

यूं चच्चा के नाम और आवाज से परिचय तो बचपन में ही हो गया था। मेरे गांव में एक पंडीजी के घर रेडियो था। वहां शाम को सब लोग जुटते थे। कृषि जगत कार्यक्रम आता था। एक तो वह कार्यक्रम खेती-किसानी और उसकी समस्याओं और उससे जुड़ी नई बातों को लेकर था और दूसरा वह भोजपुरी में होता था, जिसे समझने में अनपढ़ भी सक्षम था लेकिन सबसे बड़ा आकर्षण था कार्यक्रम के अंत में होने वाला लोकगीत। उन दिनों हीरा-बुल्लू की जोड़ी बहुत फेमस थी। कार्यक्रम में हर हफ्ते इन दोनों में से किसी न किसी का गया लोकगीत बजता। मैं भी इसी उत्कंठा में एक दिन वहां पहुंचा कि बाजा कैसे बोलता है और इतने छोटे से बाजे में कलाकार सब कैसे घुसते होंगे, जरा देखूं। बेशक वह एक अचरज ही था मेरे लिए। उस दिन कृषि जगत में हीरालाल का लोकगीत था। जैसे ही उन्होंने आलाप लिया तो चारों ओर खामोशी गई — आ …आ …. आ…. अरे कहवां से आवें राधा गोरी परेले झीर झीर बुनिया। सचमुच वह जादू था जो दिल में रह गया। भले ही उनको मैंने देखा नहीं था लेकिन वे उसी दिन से दिल के एकदम करीब बस गए।

यूं चच्चा के नाम और आवाज से परिचय तो बचपन में ही हो गया था। मेरे गांव में एक पंडीजी के घर रेडियो था। वहां शाम को सब लोग जुटते थे। कृषि जगत कार्यक्रम आता था। एक तो वह कार्यक्रम खेती-किसानी और उसकी समस्याओं और उससे जुड़ी नई बातों को लेकर था और दूसरा वह भोजपुरी में होता था, जिसे समझने में अनपढ़ भी सक्षम था लेकिन सबसे बड़ा आकर्षण था कार्यक्रम के अंत में होने वाला लोकगीत।

वह 1977-78 का ज़माना था। मेरे एक मित्र रामदुलार सिंह हुआ करते थे। उनका परिचय मंगल कवि से था। जो उन दिनों चौकाघाट में हीरा चच्चा के घर में ही रहते थे। एक दिन रामदुलार ने मुझसे कहा कि ‘चला तोहके मंगल कवि से मिलाई।’ उस समय मंगल यादव युवा गायक और कवि के रूप में पहचान बना रहे थे। तो हम दोनों उनसे मिलने चौकाघाट गए। उनसे तो मुलाक़ात हुई ही, हीरा चच्चा से भी वहीं मुलाक़ात हो गई। यह मुलाक़ात बहुत बड़े आश्चर्य के घटित होने जैसी थी। इतना बड़ा नाम और आज मैं उसे साक्षात देख रहा हूं। यह कुछ ऐसे ही है जैसे आप चांदी के सिक्के की उम्मीद में कहीं गए हों और वहां सोने की गिन्नियां मिल जाएं। बहुत देर तक तो भरोसा ही नहीं हुआ कि जिस हीरालाल यादव का अब तक केवल नाम जानते थे, वे सामने खड़े हैं और ऐसे सहज खड़े हैं कि उनको देखकर कहना मुश्किल है कि यह व्यक्ति सेलिब्रेटी है।

नाम ही केवल इसलिए जानता था क्योंकि उन दिनों बिरहा सुनने के लिए टिकट लगता था। और मेरे जैसे युवक के लिए टिकट से बिरहा सुनना अय्याशी करने जैसा था। लेकिन एक मौका था जब बड़े-बड़े गायक शहर में अनेक जगहों पर गाते थे। वह मौका था विश्वकर्मा पूजा का। इसलिए मुझे और मेरे जैसे बिरहा रसिकों को साल भर बड़ी बेसब्री से विश्वकर्मा पूजा का इंतज़ार रहता था। बहरहाल, उस दिन के बाद मंगल कवि और हीरा चच्चा से लगातार बात होने लगी और संबंध निरंतर प्रगाढ़ होते गए। 1982 में मेरी छोटी बहन की शादी पड़ी। उस शादी में मेरे घर पहली बार हीरा बुल्लू आए थे। जैसा कि उन दिनों रिवाज था कि रात में तो बिरहा होता ही था, अगले दिन बड़हार के मौके पर भी बिरहा होता था।

रात में तो हीरा-बुल्लू का बिरहा हुआ और दिन में मंगल कवि ने गाया। मेरे छोटे भाई शोभनाथ की शादी में भी चच्चा गए थे। दूसरे गायक भी थे लेकिन कुछ लोगों ने अचानक शोर मचाना शुरू किया। वे चाहते थे कि हीरालाल गाएं। जब चच्चा उठे तब भी यह शोर बंद नहीं हुआ। तब उन्होंने लोगों से कहा कि भाई देखिये, मैं भी बाराती ही हूं। मेरे भतीजे की शादी है इसलिए आया हूं।  मैं भी एकाध गीत गा सकता हूं लेकिन अगर आप लोग ऐसे ही शोर करेंगे, तब मैं भी आराम से सो जाऊंगा। बिरहा गाने के लिए तो मुझे बुलाया नहीं गया है। इतने पर एकदम सन्नाटा पसर गया। तब चच्चा ने कुछ गाने सुनाये। मेरे बड़े बेटे बबलू की शादी में भी चच्चा शामिल हुये। लेकिन सेलिब्रिटी के रूप में नहीं। अपने पोते की शादी में दादा की तरह। मैं तो यहां-वहां इंतज़ाम ही देखने में लगा था। चच्चा ने एक कुर्सी मंगवाई और दरवाजे पर बनारसी भईया के साथ बैठकर लोगों की अगवानी करने लगे।

चच्चा के साथ ही मेरी अन्य बिरहियों से जान-पहचान हुई और सभी का स्नेह मुझे मिला। बुल्लू, रामदेव, राम कैलाश वगैरह सभी से बात-व्यवहार रहा। मैंने अधिकांश लोगों का बिरहा सुना है और पसंद भी आया लेकिन चच्चा को मैंने हमेशा ही अनूठा पाया। उनकी गायकी का अंदाज औरों से अलग था। जिसमें साज़ और साज़िंदे तो थे लेकिन सबसे ऊपर वह आवाज थी जो अपने आलाप से ही श्रोताओं को अपने भरोसे में ले लेती थी। दूसरी चीज यह कि अगर आप ध्यान देंगे तो पाएंगे कि वे कठिन और कभी-कभी ठेठ गद्यात्मक पंक्तियां भी जितनी गहरी लय में गा देते रहे हैं, वह बड़े-बड़े बिरहियों के लिए एक कठिन यात्रा थी। उनकी गायकी उस दौर में परवान चढ़ी जब एक से एक क्लासिक बिरहियों का जलवा आसमान छू रहा था। पारस हों या बुल्लू हों, रामदेव हों या रामकैलाश हों, कोई भी दूसरे को आसानी से आगे बढ़ने देने वाला नहीं था। बहुत ज़बरदस्त मुक़ाबले होते थे। और उस महाभारत की खूबसूरती यह थी कि मंच पर एक दूसरे की भूसी छुड़ा देने के लिए तत्पर होने के बावजूद उनमें कोई मतभेद नहीं था। पारस यादव बिरहा के चलते-फिरते इनसाइक्लोपीडिया हैं और उनकी याददाश्त सबसे अधिक भरोसे के साथ बची हुई है। जब-जब भी कभी दोनों आमने-सामने मंच पर आए तब-तब उनके बीच की बोली-ठिठोली ने गजब का रंग बिखेरा। कौन कब कहां, किस दांव से दूसरे को धराशायी कर दे इसकी कोई कल्पना नहीं कर सकता था।

चच्चा के साथ ही मेरी अन्य बिरहियों से जान-पहचान हुई और सभी का स्नेह मुझे मिला। बुल्लू, रामदेव, राम कैलाश वगैरह सभी से बात-व्यवहार रहा। मैंने अधिकांश लोगों का बिरहा सुना है और पसंद भी आया लेकिन चच्चा को मैंने हमेशा ही अनूठा पाया। उनकी गायकी का अंदाज औरों से अलग था। जिसमें साज़ और साज़िंदे तो थे लेकिन सबसे ऊपर वह आवाज थी जो अपने आलाप से ही श्रोताओं को अपने भरोसे में ले लेती थी।

एक बार तो गोरखपुर के गायक ने बनारसी गायकों को चुनौती दी तब पारस ने ही लाठी ली और सात रातों तक बिरहा होता रहा। खचाखच भीड़ की पेशाब से कई बिगहा जमीन गीली हो गई। तब बहुत बड़ा गायक होने के बावजूद चच्चा ने ड्योढ़ी भरा और रामदेव-बुल्लू ने भी साथ दिया। वीररस के अप्रतिम गायक रामदेव अक्सर चच्चा से मुक़ाबले में उन्नीस पड़ जाते लेकिन चच्चा ने कभी इसके लिए उन्हें लज्जित नहीं होने दिया। वे हमेशा कहते थे कि रामदेव जैसा कोई दूसरा गायक इस धरती पर नहीं होगा। मैंने देखा है कि चच्चा प्रायः बुल्लू की कंजूसी और पैसे के मामले में किसी से कोई रू-रियायत न करने की उनकी आदत का खूब मज़ाक उड़ाते थे, लेकिन बुल्लू ने कभी इसका बुरा नहीं माना। बल्कि वे भी उसी मस्ती में मज़ाक उड़ाते थे कि हीरा भईया घोड़े ने जिस दिन घास से दोस्ती की उस दिन वह कोई रेस नहीं जीत पाएगा और देर तक दोनों के ठहाके गूंजते। मुझे याद है कि जब पहली बार मैं अपनी बहन की शादी में चच्चा के यहां से होकर बुल्लू के घर जाने लगा तो उन्होंने मुझे तिखारा – अरे बैजनाथ बुल्लू को ज्यादा पैसा देने की जरूरत नहीं है। बस नेवता दे दीजिये कि भतीजी की शादी में आना है बाकी मैं देख लूंगा।

खड़ी बिरहा के मामले में चच्चा का कोई जवाब नहीं था। यह संभवतः उस स्वतः स्फूर्त अभ्यास का ही नतीजा था जब अपनी भैंसों को चराने वरुणा के किनारे गए चच्चा मस्ती में अपनी तान छेड़ देते। और निर्बाध-निर्द्वंद्व तब तक गाते जब तक हींक न भर जाती। कभी-कभी जब मुक़ाबला अपने चरम पर होता, तब चच्चा खड़ी बिरहा गाकर उसे एक अलग ही गरिमा प्रदान कर देते। इसीलिए उनके प्रशंसकों में कई पीढ़ियों और वर्गों के लोग थे। जहां उनके श्रोताओं में ठेठ देहातियों का विशाल समूह था वहीं पढे-लिखे और अभिजात रसिकों का भी एक बड़ा वर्ग था। उन्होंने बिरहा को भदेसियत के संकोच से ऊपर उठाया और एक लोकविधा के रूप में उसे सम्मानजनक प्रतिष्ठा दिलाई। मुक्त बिरहा के साथ ही चच्चा ने मिथक गायन और कांड गायकी में भी अपनी एक अलग छाप छोड़ी है। उनकी जबान से निकलकर बिरहा लोक में क्लासिक का दर्जा पा जाता था। सूई के छेद में हाथी ऐसा ही एक बेजोड़ मिथक-गायन है। जिसे उन्होंने जितनी प्रांजलता और मस्ती में गाया है वह उतना ही अद्भुत और मार्मिक हो गया है। वह स्त्री-जीवन की तकलीफ़ों का अत्यंत भावप्रवण आख्यान है।

2018 में हीरालाल जी को पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया

एक जननी की पीड़ा और मां के रूप में उसकी फजीहत को एक फैंटेसी के माध्यम से उन्होंने लोक में अमर कर दिया है। कथानक के अनुसार एक बार अर्जुन ने कृष्ण से सूई के छेद में हाथी जाने की विधि पूछी तब कृष्ण उन्हें घुमाने ले गए। रास्ते में एक बहुत सुंदर सरोवर मिला और अर्जुन अपने आपको नहाने से रोक न सके। लेकिन नहाते ही वे एक युवती में बदल गए और वहीं बैठकर रोने लगे। कृष्ण गायब। थोड़ी देर में एक राजकुमार आया उसने युवती से प्रेम निवेदन किया और अपनी पत्नी बना लिया। बाद में उसे कई बच्चे पैदा हुये, जिनकी सेवा-सभाखन करते हुये वह परेशान हो गई। बहुत आर्त होकर उसने कृष्ण को पुकारा कि अब तो मुझे यहां से निकालो भगवन। मैंने जान लिया कि सूई के छेद से हाथी कैसे निकलता है। गौरतलब है कि इस आख्यान में शृंगार और ऐंद्रियता के ऐसे प्रसंगों की भरमार है। जिसे दूसरा गायक बड़ी आसानी से अश्लीलता और फूहड़पन की सीमा तक ले जा सकता था लेकिन चच्चा ने इसे अत्यंत अर्थवान और सुसंस्कृत ऊंचाई पर ले जाकर प्रतिष्ठित कर दिया।

इसी तरह मनुष्य के लालच और अपराध को लेकर उन्होंने मछलीशहर कांड गाया और कई दशक तक यह कांड गायकी का सिरमौर बना रहा। इसमें एक युवक का अपने जीवन साथी को शादी से पहले-जानने समझने की ललक और बिना मां के बच्चों की नियति को बेहद मार्मिक रूप से उन्होंने अपनी आवाज के सांचे में ढाल दिया था।

इसी तरह मनुष्य के लालच और अपराध को लेकर उन्होंने मछलीशहर कांड गाया और कई दशक तक यह कांड गायकी का सिरमौर बना रहा। इसमें एक युवक का अपने जीवन साथी को शादी से पहले-जानने समझने की ललक और बिना मां के बच्चों की नियति को बेहद मार्मिक रूप से उन्होंने अपनी आवाज के सांचे में ढाल दिया था। ठग से ठगी से लेकर काली दुलहिन, आजमगढ़ कांड, शंकर जी की लीला, विदुर भक्त, शवरी की शादी, महाभारत का शुभ मुहूर्त, फैजाबाद दहेज कांड, दुल्हन बड़ी कि भैंस, राजकुमारी बनी बंदरिया, अमर शहीद क्रांतिकारी खुदी राम बोस और अमर शहीद चन्द्र शेखर आज़ाद जैसे दर्जनों आख्यान उनके सुरों के रथपर चढ़कर चारों दिशाओं में गूंज उठे। वे रेडियो के ए ग्रेड के कलाकार थे। देश के विकास और देशभक्ति से जुड़े हुये उनके कई गीत ज़बरदस्त लोकप्रिय हुये जिनमें झण्डा लहर लहर लहराये … बेहतरीन है। उनके कई एल्बम निकले जिनमें ‘जनकपुर में राम, खड़ी अहिरऊ बिरहा, बिरहा, लोरकी, लाचारी, रामभक्त घुरहू किसान, झूरी संग्राम सिंह, दहेज में कश्मीर, दगाबाज बलमा और डोली और अर्थी आदि बहुत लोकप्रिय हुये थे।  बहुत कम लोगों को पता होगा कि वे भारत के अलावा मॉरीशस, त्रिनिदाद, टुबैगो, फ़िजी जैसे दक्षिणी कैरिबियाई देशों में ही नहीं, अमेरिका और यूरोप के कई देशों में भी सुने जाने वाले बिरहिया रहे हैं। पूरी दुनिया में उनके प्रशंसक थे और अनेकों की स्मृतियों में वे हीरे की तरह चमक हैं।

सन 1930 में गूदर सरदार और कौशल्या देवी की तीसरी संतान के रूप में जन्मे हीरालाल यादव ने शायद ही सोचा होगा कि वे एक दिन बिरहा के पर्याय हो जाएंगे। लेकिन वे बिरहा में बहुत ऊंचे मुकाम तक पहुंचे। गूदर सरदार मुर्दहा के पास बेलवरिया गांव के मूल निवासी थे। लेकिन अपने परिवार के साथ सराय गोवर्धन चेतगंज वाराणसी में रहकर दूध का पुश्तैनी काम करने लगे थे। वे खुद भी बिरहा और चनैनी गाने के शौकीन थे और उनके बड़े बेटे रम्मन भी। हीरालाल को प्रारम्भिक गायन की प्रेरणा और शिक्षा अपने पिता और बड़े भाई से ही मिली। बहुत छोटी उम्र में ही बड़े भाई उनको कंधे पर बिठाकर बिरहा कार्यक्रमों में ले जाने लगे। जब नन्हें हीरा की रुचियों को उन्होंने बिरहा की ओर जाते पाया तब सराहना और प्रोत्साहन भी देना शुरू किया। उन्हीं दिनों दशाश्वमेध में उस समय के लोकप्रिय गायकों करिया और गोगा का बिरहा होने वाला था। उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि बच्चे रहट्ठे की करताल और मोबिल का डिब्बा बजाकर गाते – छेदी ढोल बजावें गोगा गावें गनवा, कुकुरिया बुजरी तोरै तनवा। अर्थात गोगा का गाना और छेदी की ढोलक इतनी मोहक थी कि पशु-पक्षी भी झूमते थे। ज़ाहिर है कि बालक हीरा लाल पर भी इसका असर था। तब बड़े भाई ने खाली समय में हीरालाल को मंच पर खड़ा कर दिया। यही शुरुआत थी। पंद्रह-सोलह साल का होते-होते हीरा अपने भीतर छिपी अद्भुत गायन प्रतिभा से श्रोताओं के दिल में जगह बनाने लगे। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

बुल्लु यादव, राम खेलावन, लक्ष्मी नारायण, पंधारी, पारस, मुहम्मद खलील, रामकैलाश उस दौर के धुरंधर बिरहिया थे। हीरालाल ने सबसे मुक़ाबला किया। उन दिनों बिरहियों की जोड़ियां मशहूर होने लगी थीं। उनकी पहली जोड़ी पारस के साथ बनी और बाद में बुल्लू के साथ उनकी जोड़ी बहुत हिट हुई। हर जबान पर हीरा-बुल्लू चढ़ गया था। उन्नीसवीं सदी के पांचवें दशक से शुरू हुई यह यात्रा इक्कीसवीं सदी के एक-डेढ़ दशक को छूती हुई अपनी मंजिल तक पहुंची। 1960 से वे रेडियो पर गाने लगे और इसकी अर्धशताब्दी उन्होंने पूरी कर डाली। बिरहा में उनके योगदान के लिए 1991-92 में उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी अवार्ड मिला और उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा दो हज़ार चौदह में यशभारती से सम्मानित किया गाया। 2018 में उन्हें भारत सरकार द्वारा पद्मश्री प्रदान किया गया।

फूहड़ता और अश्लीलता के बोझ से दम तोड़ते हुये बिरहा को लेकर अंतिम दिनों में वे बहुत दुखी थे। लेकिन अपनी विविधताओं के चलते दशकों तक लोगों के दिलों पर राज करनेवाले हीरालाल अपने अंतिम दिनों में स्मृतिभ्रंश के शिकार हो गए। 12 मई 2019 को उन्होंने इस संसार को अलविदा कहा! कह सकता हूं कि गायकी के बल पर उनका दौर बिरहा का स्वर्णयुग रहा है। जिसमें एक-से-एक शाहकार थे और सबकी अपनी-अपनी विशेषता थी। बाद के दौर में अत्यधिक व्यावसायिकता ने बिरहा को बहुत नीचे, बल्कि पतन के गर्त में गिराने में कोई कसर नहीं छोड़ा है। आज बिरहा गायकों की  विशाल भीड़ है लेकिन बिरहा रसिकों की निगाहें हीरा को ढूँढ़ेंगी और वे कहीं न होंगे। कभी न होंगे!

बैजनाथ यादव बिरहा के मर्मज्ञ हैं। वे वाराणसी में रहते हैं।

1 Comment
  1. Umesh Yadav says

    एक लोकगायक को लेख द्वारा सच्ची श्रद्धांजलि.

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