एक सपना मेरा भी (डायरी 18 दिसंबर, 2021) 

नवल किशोर कुमार

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बात करीब दो दिन पुरानी है। पटना से एक साथी ने भारत सरकार के एक बड़े नौकरशाह की जाति पूछी। जिस नौकरशाह के बारे में उन्होंने पूछा वे 1980 के दशक के आईएएस अधिकारी हैं। मैं व्यक्तिगत रूप से उन्हें नहीं जानता। उनके बारे में गूगल के जरिए खोजा तो जानकारी मिली कि वे बिहार में भी विभिन्न पदों पर रहे और फिलहाल नरेंद्र मोदी की नौ रत्नों में एक हैं। इसी बहाने मैंने यह भी जानने का प्रयास किया कि ऐसे और कितने नौकरशाह हैं जो नरेंद्र मोदी को प्रिय हैं या यूं कहें कि जो नरेंद्र मोदी की हुकूमत चलाते हैं। जानकर आश्चर्य हुआ कि कुल 7 नौकरशाह हैं और इनमें पांच सवर्ण (चार ब्राह्मण), एक राजपूत और दो बनिया। जिनके बारे में पटना के साथी ने पूछा, वे नरेंद्र मोदी के नौ रत्नों में दूसरे दर्जे के नौ रत्न हैं और वे भी ऊंची जाति के ही हैं।

खैर, मेरा उपरोक्त अध्ययन केवल और केवल लोगों से बातचीत पर आधारित है, जिसमें कुछ त्रुटियां भी हो सकती हैं। लेकिन यह तो सच ही है कि भारत की हुकूमत असल में ऊंची जातियों के पास ही है। यह बात केवल पीएमओ तक सीमित नहीं है। मैं तो भारत सरकार के अधिकांश मंत्रालयों के आधिकारिक वेबसाइटों के जरिए यह देख रहा हूं कि ऊंची जातियों के लाेगों ने कैसे अपना वर्चस्व कायम रखा है। एक नये नवेले मंत्री हैं मोदी सरकार में। वे बिहार से आते हैं और पिछड़े वर्ग से संबंध रखते हैं। कल उनके मंत्रालय की भी खोज ली तो जानकारी मिली कि उनके मंत्रालय पर भी ब्राह्मण और बनिया वर्ग के नौकरशाहों का कब्जा है।

मैं भारत के विभिन्न राज्यों को देख रहा हूं तो मुझे पंजाब सबसे अलहदा दिख रहा है। वजह यह कि वहां एक ऐसा व्यक्ति मुख्यमंत्री है जो कि दलित वर्ग से आता है। आप अन्य राज्यों को देख लें। बिहार में कहने को ओबीसी वर्ग का मुख्यमंत्री है, लेकिन वहां भी राज सवर्णों का ही है। उत्तर प्रदेश में तो फिलहाल ठाकुर राज ही है। जबकि ये दोनों राज्य ऐसे हैं, जहां दलित-बहुजन बड़ी संख्या में हैं।

 

असल में देश में सरकारी नौकरियों को अनेक समूहों में बांटा गया है। इनमें से ग्रुप ए और ग्रुप बी को नौकरशाहों का ग्रुप कहा जाता है। बाकी ग्रुप सी और ग्रुप डी केवल तंत्र के हिस्से होते हैं। ग्रुप ए में आईएएस और आईपीएस जैसे अधिकारी शामिल होते हैं। भारत सरकार के कार्मिक मंत्रालय द्वारा हासिल सूचना बता रही है कि वर्तमान में ग्रुप ए में कुल 44 हजार 351 नौकरशाह हैं। अब इनमें हिस्सेदारी की बात करें तो दलित 5898, आदिवासी 2591 और ओबीसी 6770 हैं। इसके आधार पर अब हम सही तरीके से आकलन कर सकते हैं कि शासन व प्रशासन में किस वर्ग की कितनी भागीदारी है।
खैर, मैं भारत के विभिन्न राज्यों को देख रहा हूं तो मुझे पंजाब सबसे अलहदा दिख रहा है। वजह यह कि वहां एक ऐसा व्यक्ति मुख्यमंत्री है जो कि दलित वर्ग से आता है। आप अन्य राज्यों को देख लें। बिहार में कहने को ओबीसी वर्ग का मुख्यमंत्री है, लेकिन वहां भी राज सवर्णों का ही है। उत्तर प्रदेश में तो फिलहाल ठाकुर राज ही है। जबकि ये दोनों राज्य ऐसे हैं, जहां दलित-बहुजन बड़ी संख्या में हैं।

गंगा में लाशों का मंजर और हुकूमत का सच (डायरी 17 दिसंबर, 2021)

मैं बिहार की बात करता हूं जो कि मेरा गृह प्रदेश भी है। यहां की राजधानी पटना में कम से कम एक शख्स ऐसे हैं जिनसे मैं हमेशा ऊर्जा हासिल करता हूं। हालांकि अब उनसे मिले भी करीब पांच साल हो गए। जब कभी पटना जाता हूं, मन में ललक रहती है कि उनसे मिल लूं। परंतु हो नहीं पाता। एक बार प्रयास भी किया लेकिन उस समय वह बीमार चल रहे थे। इनका नाम है डॉ. रजी अहमद। ये पटना के गांधी संग्रहालय के निदेशक हैं। जिन बातों के लिए मैं इनके प्रति आजीवन अहसानमंद रहूंगा, उनमें एक शे’र शामिल है जो किसी पाकिस्तानी शायर की है।
यह शेर है –
खंजर बकफ खड़े हैं गुलामिन-ए-मुंतजिर,
आका कभी तो निकलोगे अपने हिसार से।
इसका भावार्थ भी रजी अहमद सर ने ही बताया था। उनके मुताबिक, गुलाम पीठ के पीछे अपने हाथों में खंजर लिए सिर झुकाए खड़े हैं। वे इस ताक में हैं कि उनका शासक कभी तो अपने सुरक्षा घेरे से बाहर निकलेगा।
इस एक शेर ने विश्व के परिदृश्य को समझने में बड़ी सहायता की है। यह मामला केवल भारत का नहीं है। न पाकिस्तान का और ना ही अमेरिका का। मामला पूरे विश्व का है। शासक अपना महत्व खोते जा रहे हैं। फिर चाहे वे चीन के शासक हों या फिर इजरायल के। वे रूस के शासक हों या फिर दक्षिण अफ्रीकी देशों के। नवउदारवाद ने सभी को प्रभावित किया है। किसी को थोड़ा तो किसी को कुछ ज्यादा। प्रभावित तो सभी हुए हैं।
अब चूंकि मैं भारत का रहनेवाला हूं तो भारत की बात करना मेरे लिए सबसे आसान है। वजह यह कि यहां की आबोहवा में जीता हूं। यहां के किसानों द्वारा उपजायी गयी फसल खाता हूं। यहां के शिल्पकारों द्वारा तैयार कपड़े, बर्तन आदि इस्तेमाल करता हूं। हालांकि इन सभी वस्तुओं के व्यापार में अब विदेशी कंपनियां शामिल हैं, इसलिए यह तो नहीं कह सकता कि मैं पूर्ण तरीके से अपने देश के उपर आत्मनिर्भर हूं।
खैर, यदि इस दिशा में बात करने लगा तो भंवर में फंस जाऊंगा। अर्थशास्त्र का सवाल बड़ा जटिल है। इसमें अनंत गिरहें हैं। पहले इन्हें मुझे स्वयं समझना होगा कि आखिर वे हैं क्यों?

लेकिन मैं यह मानता हूं कि बंटवारा और संसाधनों पर समुचित अधिकार दो अलग-अलग बातें हैं। राजनीतिक शब्दावली के लिहाज से बंटवारा शब्द भी गैर वाजिब नहीं। मैंने कल यह बात फेसबुक पर लिखी कि मैं भारत का एक और विभाजन चाहता हूं। 85 फीसदी भूभाग आदिवासी, धुमंतू, दलित, पिछड़े और पसमांदा समाज के लोगों के पास हो। शेष 15 फीसदी अगड़े अपने पास रखें। इससे उन्हें बहुसंख्यक बहुजनों को आरक्षण देने की महान कृपा नहीं करनी होगी।

 

मेरे गांव में एक दालचंद साव रहते थे। रहते थे का मतलब यह कि अब नहीं हैं। बहुत पहले जब मैं कॉलेज का छात्र था तभी उनका निधन हो गया था। लेकिन उसके पहले दालचंद साव का हमारे गांव में नाम था। सफेद लंबी दाढ़ी उनकी विशेष पहचान थी। पूरे गांव में वह एकमात्र थे जो आटा चक्की चलाते थे। दाल व तेल निकालने के लिए मशीनें भी उनके पास थीं। मेरा उनसे साबका तब हुआ जब पापा ने मुझे उनके यहां से खल्ली ले आने की जिम्मेदारी दी।
खल्ली एक अपशिष्ट पदार्थ है जो सरसों की पेराई के बाद निकलता है। पापा के मुताबिक, यह मवेशियों के लिए बेहतर है। खासकर ठंड के दिनों में इसे खाने से मवेशियों को गर्मी मिलती है। वैसे पापा हर भैंस को प्रत्येक सप्ताह आधा लीटर सरसों तेल भी पिलाते थे। यह तेल भी तब दालचंद साव के यहां से ही आता था।
तो गांव में दालचंद साव का नाम था। उनका घर एक मिनी फैक्ट्री के जैसा था। मैं उनसे कहता था – बड़का बाबू, दिन भर तो चक्की चल हव, रात में नींद कैसे पड़ हव। रातवों में लग होतव कि मोटर चलते हे। तब हंसते और कहते – धत्, इ मशीन खाली थोड़े हे। जहिया इ बंद उ दिन से हम बंद।
यही हुआ। उनके निधन के पहले उनके बेटों ने बंटवारा किया। बड़े बेटे के हिस्से में मिल आयी। उसने पहले तो दालचंद साव को उनके काम से दूर किया। और फिर खुद भी दूर हो गया। एक दिन मिल बंद हो गई। उसके दो-तीन महीने बाद ही दालचंद साव भी नहीं रहे।
वैसे यह कहानी केवल यह नहीं है कि गांवों में परंपरागत अर्थव्यवस्था कैसे दम तोड़ रही है। यह कहानी बंटवारे की भयावह तस्वीर भी प्रस्तुत करती है।
लेकिन मैं यह मानता हूं कि बंटवारा और संसाधनों पर समुचित अधिकार दो अलग-अलग बातें हैं। राजनीतिक शब्दावली के लिहाज से बंटवारा शब्द भी गैर वाजिब नहीं। मैंने कल यह बात फेसबुक पर लिखी कि मैं भारत का एक और विभाजन चाहता हूं। 85 फीसदी भूभाग आदिवासी, धुमंतू, दलित, पिछड़े और पसमांदा समाज के लोगों के पास हो। शेष 15 फीसदी अगड़े अपने पास रखें। इससे उन्हें बहुसंख्यक बहुजनों को आरक्षण देने की महान कृपा नहीं करनी होगी। वे अपना आरक्षण अपने पास रखें। 15 फीसदी भूभाग को यदि वे हिंदू राष्ट्र या ब्राह्मणों का राष्ट्र भी बनाना चाहें तो हमें कोई आपत्ति नहीं होगी। जैसे धर्म के आधार पर विभाजन हुआ और एक पाकिस्तान बना वैसे ही एक राष्ट्र ब्राह्मणों का भी हो और उनका भी हो जो स्वयं को इंसान से अधिक हिंदू मानते हों।
विभाजन अलगाव नहीं है। विभाजन एक प्रक्रिया है। रसायन शास्त्र में इसकी एक सुसंगत परिभाषा है। राजनीति शास्त्र में भी। जब पुणे पैक्ट में डॉ. आंबेडकर ने पृथक मतदान का अधिकार मांगा तब भी वह अलगाव नहीं था। एक तरह का विभाजन था ताकि दलित जो अछूत थे, उन्हें संसद में समुचित हिस्सेदारी मिल सके। वे आज के दलित सांसदों की तरह निष्क्रिय और निकम्मे न रहें।
बहरहाल, यह तो मेरे लिए सपना है कि इस देश के संसाधनों पर बहुसंख्यक बहुजनों का अधिकार हो। कल ही मैंने अपनी जीवनसंगिनी से कहा कि मैं एक ऐसे हवाईजहाज में सफर करना चाहता हूं जिसमें 85 फीसदी दलित-बहुजन हों।
नवल किशोर कुमार फॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं। 
2 Comments
  1. Ratnakar says

    बेहद जानकारी पूर्ण लेख बहुत-बहुत धन्यवाद नवल किशोर जी।

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