भाजपा ने ही परिवार आधारित पार्टियों को पोसा है

एलएस हरदेनिया

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कुछ दिन पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि परिवार आधारित राजनीतिक दल लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं। मोदीजी के इस कथन से असहमत होना कठिन है क्योंकि इस तरह की पार्टियों के न तो कोई सिद्धांत होते हैं और ना ही उनमें आंतरिक प्रजातंत्र होता है। परंतु अफसोस की बात है कि स्वयं मोदी की पार्टी को ऐसी पार्टियों से सत्ता में भागीदारी करने में तनिक सा संकोच भी नहीं होता है। यदि ऐसी पार्टियां सचमुच में देश के लिए खतरनाक हैं तो भाजपा उनके साथ सत्ता में भागीदारी क्यों करती है या उन्हें सहयोग देकर सत्ता में क्यों आती है?

                                       

इस तरह के अनेक उदाहरण हैं। जैसे, भाजपा ने पंजाब में अकाली दल के साथ मिलकर अनेक बार सांझा सरकारें बनाई हैं। ऐसी सरकारों में प्रकाश सिंह बादल मुख्यमंत्री और उनके पुत्र सुखबीर सिंह बादल उपमुख्यमंत्री रहे और सुखबीर बादल की पत्नि हरसिमरत कौर बादल केन्द्र की भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में मंत्री रहीं। इसके अतिरिक्त महाराष्ट्र में शिवसेना भी पूर्ण रूप से पारिवारिक पार्टी है। शिवसेना के साथ भाजपा ने सत्ता का आनंद लिया। शिवसेना प्रमुख बालासाहेब ठाकरे ने अपने पुत्र उद्धव ठाकरे को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। इससे उनके भतीजे राज ठाकरे नाराज हो गए और उन्होंने अपना अलग संगठन बना लिया। उसी शिवसेना ने बाद में भाजपा को धोखा देकर कांग्रेस और एनसीपी से नाता जोड़कर सत्ता हथिया ली।

कई बार स्वयं भाजपा में पदाधिकारी बिना चुनावों के नियुक्त हुए हैं। ऐसा राष्ट्रीय स्तर पर भी हुआ है और राज्य स्तर पर भी। कांग्रेस भी इस रोग से पीड़ित है। यदि परिवार आधारित दलों का चलन रोकना है तो चुनाव आयोग से मान्यता प्राप्त सभी पार्टियों में आंतरिक चुनाव कानून बनाकर अनिवार्य करने होंगे। यदि ऐसी पार्टियां आंतरिक चुनाव नहीं करती हैं तो उन्हें आम चुनाव में भाग लेने से वंचित कर दिया जाना चाहिए। इसके साथ ही यह व्यवस्था भी कर देनी चाहिए कि इन पार्टियों के आंतरिक चुनाव, चुनाव आयोग करवाए।

 

इसी तरह का गठबंधन कश्मीर में भाजपा और पीडीपी के बीच हुआ और भाजपा पीडीपी के नेतृत्व वाली सरकार में शामिल हुई। यह सरकार बनने के बाद उसकी मुख्यमंत्री मेहबूबा मुफ्ती ने कहा था कि यदि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में कश्मीर समस्या हल नहीं होगी तो फिर वह कभी हल नहीं होगी। पीडीपी और भाजपा के गठबंधन की प्रशंसा अमित शाह समेत अनेक भाजपा नेताओं ने की। महत्वपूर्ण बात यह है कि दोनों दलों ने कश्मीर के संबंध में अपने-अपने विरोधाभासी रवैये के बावजूद गठबंधन किया।

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इस प्रकार न केवल राज्य स्तर पर बल्कि केन्द्र स्तर पर भी भाजपा ने इस तरह के परिवार आधारित दलों के साथ मिलीजुली सरकारें बनाईं। इसलिए मैं नहीं समझता कि मोदीजी को परिवार आधारित राजनीतिक दलों की आलोचना करने का नैतिक अधिकार है। इसमें संदेह नहीं कि परिवार आधारित दल बन ही न सकें इसके लिए कानूनी व्यवस्था करना आवश्यक है। वर्तमान में न सिर्फ परिवार आधारित दलों, वरन् बहुसंख्यक अन्य दलों में भी आंतरिक प्रजातंत्र नहीं है। कम्युनिस्ट पार्टियों को छोड़कर अधिकांश पार्टियां अपने पदाधिकारी आंतरिक चुनावों से नहीं चुनतीं वरन् प्रायः पदाधिकारी निर्विरोध ही चुने जाते हैं।

कई बार स्वयं भाजपा में पदाधिकारी बिना चुनावों के नियुक्त हुए हैं। ऐसा राष्ट्रीय स्तर पर भी हुआ है और राज्य स्तर पर भी। कांग्रेस भी इस रोग से पीड़ित है। यदि परिवार आधारित दलों का चलन रोकना है तो चुनाव आयोग से मान्यता प्राप्त सभी पार्टियों में आंतरिक चुनाव कानून बनाकर अनिवार्य करने होंगे। यदि ऐसी पार्टियां आंतरिक चुनाव नहीं करती हैं तो उन्हें आम चुनाव में भाग लेने से वंचित कर दिया जाना चाहिए। इसके साथ ही यह व्यवस्था भी कर देनी चाहिए कि इन पार्टियों के आंतरिक चुनाव, चुनाव आयोग करवाए। इससे इन पार्टियों की अन्य गतिविधियां भी नियम-कानूनों से संपन्न होंगीं।

भारतीय जनता पार्टी और उसके पूर्ववर्ती जनसंघ की यह परंपरा रही है कि जो भी व्यक्ति संघ की विचारधारा से जरा सा भी मतभेद दर्शाता है, वह यदि किसी महत्वपूर्ण पद पर आसीन है तो उसे वह पद छोड़ना पड़ता है और भविष्य में कभी उसे महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व नहीं सौंपा जाता, भले ही वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्वयंसेवक रहा हो। ऐसा बलराज मधोक, लालकृष्ण आडवाणी, जसवंत सिंह, वीरेन्द्र कुमार सकलेचा, गोविंदाचार्य और कई अन्य दिग्गज नेताओं के साथ हुआ।

 

वैसे यहां यह उल्लेख करना प्रासंगिक होगा कि भाजपा य़द्यपि परिवार (रिश्तेदारी) आधारित पार्टी नहीं है परंतु वह भी एक पृथक प्रकार के परिवार से संचालित पार्टी है। भाजपा संघ परिवार आधारित पार्टी है। जब से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने राजनीति में प्रवेश किया है तबसे न तो जनसंघ और ना ही भारतीय जनता पार्टी का कोई प्रमुख पदाधिकारी ऐसा व्यक्ति बना है जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सदस्य न रहा हो। चाहे मामला संगठन का हो या सरकारों का, एक-दो अपवादों को छोड़कर मुखिया बनने वाले सभी व्यक्ति आरएसएस से संबद्ध रहे हैं।

भारतीय जनता पार्टी और उसके पूर्ववर्ती जनसंघ की यह परंपरा रही है कि जो भी व्यक्ति संघ की विचारधारा से जरा सा भी मतभेद दर्शाता है, वह यदि किसी महत्वपूर्ण पद पर आसीन है तो उसे वह पद छोड़ना पड़ता है और भविष्य में कभी उसे महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व नहीं सौंपा जाता, भले ही वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्वयंसेवक रहा हो। ऐसा बलराज मधोक, लालकृष्ण आडवाणी, जसवंत सिंह, वीरेन्द्र कुमार सकलेचा, गोविंदाचार्य और कई अन्य दिग्गज नेताओं के साथ हुआ।

इस तरह एक प्रकार से भाजपा देश की सबसे बड़ी (संघ) परिवार आधारित पार्टी है। अंत में मैं पुनः यह बात दुहराना चाहूंगा कि यदि हमें अपने देश में प्रजातंत्र की नींव को मजबूत रखना है तो राजनीतिक पार्टियों में आंतरिक लोकतंत्र की व्यवस्था लागू करनी होगी।

एल एस हरदेनिया भोपाल स्थित वरिष्ठ पत्रकार हैं। 

1 Comment
  1. Gulabchand Yadav says

    बढ़िया विश्लेषण और सही बात। बधाई।

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