Wednesday, May 22, 2024
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प्रधानमंत्री मोदी पद की गरिमा के प्रतिकूल बातें क्यों कर रहे हैं?

वर्ष 2014 के बाद देश की स्थिति से सभी वाकिफ हैं। बीजेपी ने सांप्रदायिक घृणा फैला कर ध्रुवीकरण करने में कोई कसर नहीं छोड़ी और इस काम का नेतृत्व किसके हाथ में है, सभी जानते हैं। इन्हीं बातों को उल्लेखित करते हुए डॉ सुरेश खैरनार ने देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम खुला पत्र लिखा।

लोकसभा चुनाव के लिए सभी दलों के लोग धुआँधार प्रचार कर जनसभा को संबोधित कर रहे हैं। इसी कड़ी  कल 21 अप्रैल को प्रधानमंत्री मोदी ने बंसवारा, राजस्थान की सभा में बहुसंख्यक समुदाय के लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि ‘कांग्रेस आपकी संपत्ति ज्यादा बच्चे पैदा करने  वालों को देने जा रही है।‘ यह बोलते हुए कांग्रेस पर हमला किया।

 इसके पहले आपने अपने मुख्यमंत्रित्व काल में गुजरात दंगों के विस्थापित शिविरों (जहां केवल मुस्लिम परिवार ही रह रहे थे) में रहने वालों को तंज़ कसते हुए, हम पांच और हमारे पच्चीस का जुमला बोला था (हालांकि सभी विस्थापित लोगों के परिवार के सदस्यों की हत्या से लेकर, उनके महिलाओं के साथ अत्याचार की घटनाओं के बावजूद, आपने उनके जख्मों पर नमक छिड़कने का काम किया है)

 इसके पहले कांग्रेस के चुनावी घोषणा पत्र को मुस्लिम लीग का घोषणापत्र बोला और उत्तर प्रदेश के अमरोहा की चुनावी सभा में मतदाताओं को खुले मंच से कांग्रेस के उम्मीदवार दानिश अली के लिए कहा कि ‘यह आदमी मुझे लोकसभा में दिखना नहीं चाहिए।‘

मुझे बहुत अच्छी तरह से याद है, नरेंद्र मोदीजी आपके भारत के प्रधानमंत्री बनने के बाद 15 अगस्त, 2014 के अपने लालकिले के पहले संबोधन में कहा था कि ‘मैं संपूर्ण देश की जनता को टीम इंडिया मानता हूँ और उन सभी के विकास के लिए मुझे जो भी करना संभव होगा, मैं करुंगा। और आपके  लालकिले के संबोधन के तुरंत बाद, मैंने नागपुर के ‘आवाज इंडिया’ टीवी के कार्यक्रम में जीवन मे पहली बार आपके किसी घोषणा का खुलकर समर्थन किया। मैंने सबसे पहले आपका का अभिनंदन करते हुए कहा कि ‘हालांकि आप 17 वर्ष की अवस्था से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक रहे हैं। अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ द्वेष करने के लिए संघ ने  आपको विशेष ट्रेनिंग संघ ने दी। इस वजह से आपके सांप्रदायिक होने की बात, मैं अच्छे से जानता था।‘

इस देश की आबादी 135 करोड़ है, जिसमें एक चौथाई हिस्सा अल्पसंख्यक समुदायों का है। मतलब इनकी आबादी अमेरिका या यूरोपीय देशों से भी अधिक है इसलिए आपको अच्छा लगे या न लगे, तब भी आपको सभी के हित में काम करना होगा।

आपने मई 2014 में शपथ ली। सौ से भी कम दिनों में भी आपने देश की 135 करोड़ की आबादी को लालकिले से संबोधित करते हुए कहा कि हमारी टीम इंडिया है। हम सभी को मिलजुल कर देश के विकास में योगदान देना है। वर्ष 2019 का चुनाव भी आपने ‘सबका साथ सबका विकास’ नारा देकर जीता।

लेकिन दस सालों के आपके कार्यकाल में  आपने सिर्फ चंद धन्नाराम सेठों की और खुद के दल की तिजोरियों को भरने के अलावा कुछ भी नहीं किया। (तथाकथित चुनावी बॉन्ड)

अब आप दोबारा सांप्रदायिक घृणा फैला कर ध्रुवीकरण कर कभी मुस्लिम समुदाय के बच्चों को लेकर टिप्पणी करते है, तो कभी भरी लोकसभा में आपके दल के सदस्य दानिश अली को ‘कटवा’ और असंसदीय गाली देने वाले सांसद को शह देते हैं। उन पर कार्रवाई करना तो दूर, उल्टा चुनाव प्रचार में दानिश अली के मतदाता संघ अमरोहा में भड़का कर कहा कि ‘यह आदमी मुझे संसद में दिखाई नहीं देना चाहिए।‘ मतलब नथूराम गोडसे की मानसिकता का आदमी कुछ भी कर सकता है?

(डॉ सुरेश खैरनार जी के सौजन्य से प्राप्त)

वैसे ही आपने दक्षिण भारत में राहुल गांधी के बारे में भी कहा कि इसे घर भेज दो? क्यों भाई लोकसभा आपकी प्राइवेट जागीर है? आपके मन में आया तो राहुल गांधी की सदस्यता खत्म करने से लेकर विपक्ष के डेढ़ सौ से अधिक सदस्यों को भी सदन से बर्खास्त करने के कारनामों को देखकर लगता है कि संसद को आपने अपनी जागीर समझ रखी है?

गुजरात में पहली बार आप चुनाव के माध्यम से विधायक बने और उसके बाद मुख्यमंत्री।

 वर्ष 2014 और 2019 में लोकसभा पहुँच कर प्रधानमंत्री हुए और अभी भी लोक सभा में जाने की कोशिश में है। लेकिन विरोधियों को शत्रुओं के तरह दिखाकर अलोकतांत्रिक मानसिकता का परिचय दे रहे हैं।

 और सबसे संगीन बात हमारे देश के सर्वोच्च न्यायालय की भाषा में, बगैर कान, मुंह और आंख की वजह से अंधे बने हुए हैं। चुनाव आयोग को आपके और आपके दल के अन्य सदस्यों के भडकाऊ भाषण न सुनाई दे रहे हैं और न ही दिखाई दे रहे हैं क्योंकि जब आप अपनी मनमर्जी से चुनाव आयोग का गठन करते हैं, तब वह भी आपके दल की अन्य इकाइयों जैसे ईडी, सीबीआई, एनआरआई के जैसा ही व्यवहार करेंगे।

अभी कुछ दिन पहले रूस में भी चुनाव हुए और पुतिन ने पाँचवीं बार बहुमत से चुनाव ‘जीत लिया।‘ ‘जीत लिया’ इसका इस्तेमाल मैंने जानबूझकर किया है। जिस तरह से सौ वर्ष पहले जर्मनी में हिटलर भी चुनाव के माध्यम से ही चुनाव जीतता था। यहूदी धर्म के लोगों के खिलाफ अनर्गल बोलते हुए, उसके पहले उसने जर्मनी के संपूर्ण विरोधी दलों के नेताओं के दफ्तरों पर अपने लोगों द्वारा हमले करवाकर, उनकी हत्या करने से लेकर, उन्हें झूठे आरोपों में जेल में बंद किया। पूरी मीडिया को अपनी डफली बजाने के लिए मजबूर कर, अपने विरोधियों को जर्मनी के विरोधी और शत्रु कहकर, चुनाव में धांधली करते हुए तथाकथित चांसलर का पदग्रहण करता था। आज पिछले दस सालों से भारत में आप हूबहू वही मॉडल दोहरा रहे हैं।

शायद कांग्रेस के इतिहास का इतना जनमुखी चुनावी घोषणा पत्र पहली बार घोषित किया गया है। जिसे आपने मुस्लिम लीग का घोषणापत्र कहा है। (जबकि केरल के चंद हिस्से में छोड़ दिया जाये तो) मुस्लिम लीग का अस्तित्व भारत में नहीं बचा है। उसके बावजूद उसे मुस्लिम लीग का घोषणापत्र बोलना, दानिश अली पर अमरोहा मतदाता संघ में भाजपा के उम्मीदवार के मतदाताओं को भड़काना। इन सदस्यों पर पीठासीन अधिकारी ने किसी प्रकार कोई भी कारवाई नहीं की।

आप खुद तीन बार गुजरात के मुख्यमंत्री रहे। अभी भी दो बार भारत के प्रधानमंत्री के रूप में चुनाव के माध्यम से ही प्रतिष्ठित हुए हैं। लेकिन आपके अंदर जनतांत्रिक मन नही है क्योंकि आपको विरोधी दल के लोग शत्रु नजर आते हैं। जैसा हिटलर या पुतिन को भी नजर आते हैं। राहुल गांधी या दानिश अली, आपकी गलत नीतियों के खिलाफ बोलते हैं, जिस वजह से आप उनसे बेतहाशा नफरत करते हैं। राहुल गांधी द्वारा किसी जनसभा को संबोधित करते हुए कही गई बात ‘यहां तक की सिर्फ मोदी नाम के ही लोग क्यों होते हैं?’  इतनी सी टिप्पणी पर एफआईआर कर संसद सदस्यता खत्म करने की कार्रवाई की गई।

अरे, मोदी जी आपके चुनावी सभाओं से लेकर लोकसभा में मिमिक्री करते हुए बोलने के ऑडियो रेकॉर्ड मौजूद हैं। आप दूसरे सदस्यों के संविधान से निष्कासित करने से लेकर उनके खिलाफ किस स्तर से बोलते हैं? अब तक के सभी प्रधानमंत्रियों और आपके भाषणों को देखकर व सुनकर लगता है, यह हमारे देश की किसी ग्रामपंचायत के मुखियाओं से भी, असभ्य और तिरस्करणीय है। आप भूल  रहे हैं कि आप 145 करोड़ आबादी वाले देश के प्रधानमंत्री है। और तीसरी बार बनने की कोशिश में हैं। आप ही सोचिए आप खुद एक तरफ विश्व के मंच पर बोलते हुए भारत के लोकतंत्र को ‘विश्व के लोकतंत्र की माँ’ तक बोलते हैं। भारत में चुनाव से लेकर संसद सदन के भीतर बोलते हुए आप उसी लोकतंत्र की इज्जत की भाजीपाला करते हैं। क्या देश के प्रधानमंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद पर बैठे हुए को यह शोभा देता है?

डॉ. सुरेश खैरनार
डॉ. सुरेश खैरनार
लेखक चिंतक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं।

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