मृत्युंजय के लिए मेरे मन में आजीवन गिल्ट रहा क्योंकि मेरे लिए बच्चे से भी बढ़कर था -2

मूलचन्द सोनकर

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दूसरा और अंतिम भाग 

जी करता है घर छोड़कर भाग जाऊं लेकिन मैंने दो बच्चे पाले हैं। उनका ख्याल आते ही रुक जाता हूँ।’ मैंने पूछा कौन बच्चे? वे दोनों कुत्ते? उन्होंने तुरंत बात काटते हुए कहा – कुत्ते न कहो,उनका नाम चेरी और फेथ है। मृत्युंजय और टफी भी था अब दोनों नहीं हैं।  इस बातचीत से मूलचन्दजी के कुत्तों से विशेष प्रेम का पता चलता है।  मृत्युंजय …मूलचन्दजी का एक पालतू कुत्ता था, जिसके बारे में बहुत ही मार्मिक लेख उन्होंने उसके मृत्यु के बाद लिखा। कोई भी इंसान अपने पाले हुए जानवर के साथ रहते हुए कैसे उससे जुड़ जाता और उसे परिवार का एक सदस्य जैसा मानने लगते हैं। दो भागों में प्रकाशित इस लेख में मृत्युंजय के जीवन से लेकर मृत्यु तक की कहानी जो एक रूखे दिखने वाले व्यक्ति के मन की अंदरूनी परतों को खोलती है। वैसे बता दूँ कि हर किसी से दो-दो हाथ करने को तत्पर मूलचन्द सोनकर वास्तव में बहुत दोस्तना, सहयोगी और संवेदनशील इंसान थे — अपर्णा 

डॉ.सिंह यू.पी.कॉलेज के इतिहास विभाग से सेवानिवृत्त हैं। अध्ययनशील व्यक्ति हैं। मैं उन्हें कोई न कोई पत्रिका देता रहता हूँ। एक दिन वांग्मय पत्रिका का थर्ड जेंडर कहानियों पर आधारित विशेषांक देने के लिये उनके आवास पर गया था। उन्होंने बड़े स्नेह से मुझे बैठक में बैठाया और चाय-नाश्ता भी ऑफर किया। मेरी चाय की चुस्कियों के बीच उनका पामेरियन भी बैठक में आ गया। चूँकि मैं कई वर्षों से महेन्द्र प्रताप जी के आवास पर जब वह यू.पी.कॉलेज के परिसर में रहते थे, जाता रहता था, उनके पामेरियन से भी परिचित था। वह आयु में मेरे टफी से बड़ा है। मैंने उन्हें टफी की मृत्यु की खबर देते हुए यह पूछा कि वह अपने पेट्स की देखभाल कैसे करते हैं। तब उन्होंने मुझे डी.एन.यादव के बारे में बताते हुए कहा कि वही नियमित रूप से आकर इसे देख जाते हैं। मैंने यादव जी का मोबाईल नम्बर यह सोचकर ले लिया कि इमरजेंसी में काम आयेगा। वह इमरजेंसी मृत्युंजय के मामले में उपस्थित हो गयी।

मैंने यादव जी को फ़ोन किया। महेन्द्र प्रताप जी का हवाला देते हुए अपना परिचय और घर का पता बताकर उनसे आने का अनुरोध किया। वह दूसरे दिन सुबह आये। सम्भवतः दस या ग्यारह तारीख रही होगी। उन्होंने मृत्युंजय को देख कर एक इंजेक्शन लगाया और फिर आने के लिये कह कर चले गये। दूसरे दिन भी आकर इंजेक्शन दिया लेकिन उसकी हालत में बिलकुल भी सुधार नहीं हो सका। मैं बिलकुल निराश हो गया। इसी निराशा की हालत में मैं दिनांक 15 अप्रैल 2017 को लगभग आठ बजे रात्रि में उसे डॉ.एल.बी.सिंह के पास ले गया। डॉ. एल.बी.सिंह ही मेरे पेट्स का इलाज किया करते थे लेकिन बाद में साधन इत्यादि की परेशानी के कारण मैं अन्य डॉक्टरों को घर पर बुलाकर उनकी सेवाएँ लेने लगा। इनमें डॉक्टर आनंद सिंह प्रमुख थे जिन्होंने उक्त इलाज किया था। डॉ.एल.बी.सिंह ने उसे देखा। उन्होंने कीड़े की और उल्टी रोकने की दवा के साथ पेप्सिड नामक इंजेक्शन भी लिख दिया। मुझे कीड़े और उल्टी रोकने की दवा तो मिल गयी लेकिन इंजेक्शन नहीं मिला।

मेरा चीखता हुआ मन उसकी तरफ देखकर कह उठा, 'कैसा सो रहा है बदमाश ! अब न कोई शिकायत करेगा और न ही कोई शिकायत सुनेगा। माया-मोह से परे, स्वामी-भक्ति के आरोप से तो तू मुक्त हो गया मगर बता जीते-जी मैं कैसे तेरी यादों के मोह से मुक्त होऊँगा। क्या तुझे पता नहीं था कि जीवन और विरक्ति का कोई मेल नहीं होता लेकिन तू तो मेरे खिलाफ जीवन में ही जीवन से विरक्त होने की साजिश रच कर चला गया।

मैंने बहुत मशक्कत से वह दवा उसे पिलायी लेकिन इंजेक्शन के बिना यह इलाज पूरा नहीं था और इंजेक्शन मिला नहीं। दूसरे दिन अर्थात् 16 अप्रैल को डॉ. अम्बेडकर जयन्ती के सिलसिले में मुझे जनपद प्रतापगढ़ में स्थित ढकवा नामक स्थान में आयोजित कार्यक्रम में जाना था। एक सप्ताह पहले ही मैंने इसके लिये अपनी सहमति दे दी थी। मेरे साथ द्विमासिक पत्रिका गाँव के लोग के सम्पादक रामजी यादव को भी जाना था। मेरा मन जाने के लिये बिल्कुल भी तैयार नहीं था लेकिन मन मारकर जाना पड़ा। पता नहीं मृत्युंजय की मौत नियति बनकर प्रेरित कर रही थी या वह भ्रम था जिसे मैं वादा निभाने का नाम दे रहा था।

बहरहाल मैं गया और अपने एक पारिवारिक मित्र धर्मराज से यह अनुरोध करते हुए कि वह पेप्सिड इंजेक्शन की व्यवस्था करा देंगे, दवा की पर्ची उन्हें देता गया। उन्हें भी उसी दिन मेरी वाइफ के साथ जौनपुर जाना था, बावजूद इसके उन्होंने मुझे यह कहकर आश्वस्त किया था कि अपने भाई से मँगवा देंगे लेकिन वह भूल गये और पर्ची अपनी जेब में ही लेते चले गये। मैंने आयोजन स्थल ढकवा से दो बार घर पर फोन करके मृत्युंजय का हाल-चाल और इंजेक्शन के बारे में पूछताछ की थी। मृत्युंजय उसी तरह था लेकिन इंजेक्शन के बारे कोई कुछ बता नहीं पाया।

17 अप्रैल की सुबह जब मैंने धर्मराज से फोन पर सम्पर्क किया तब उन्होंने अपनी भूल के बारे में बताया। बहरहाल दोपहर से थोड़ा पहले वह आये और इंजेक्शन लेने के लिये उसी मेडिकल स्टोर पर गये जहाँ से डॉ.एल.बी.सिंह की लिखी दवाएँ मिलती हैं लेकिन वह इंजेक्शन उपलब्ध नहीं था। दुकानदार ने डॉ.सिंह से पूछ कर उसका स्थानापन्न दिया। इंजेक्शन तो आ गया अब उसे लगाने की समस्या पैदा हो गयी। न तो कोई कम्पाउंडर और न ही कोई डॉक्टर मिल पा रहा था। डी.एन.यादव भी अपने गाँव गये थे। बड़ी मुश्किल से लगभग सात बजे एक डॉक्टर से सम्पर्क हो पाया। वह घर आये, इंजेक्शन देखा और बोले कि यह पेप्सिड का उचित स्थानापन्न नहीं है। उन्होंने एक अन्य इंजेक्शन टी.एन.सी.फोर्ट लगवाने की सलाह दी लेकिन मेरे पास  उपलब्ध स्थानापन्न इंजेक्शन जिसका नाम  कांसिप्लेक्स था, उसे लगा भी दिया।

मेरा चीखता हुआ मन उसकी तरफ देखकर कह उठा, 'कैसा सो रहा है बदमाश ! अब न कोई शिकायत करेगा और न ही कोई शिकायत सुनेगा। माया-मोह से परे, स्वामी-भक्ति के आरोप से तो तू मुक्त हो गया मगर बता जीते-जी मैं कैसे तेरी यादों के मोह से मुक्त होऊँगा। क्या तुझे पता नहीं था कि जीवन और विरक्ति का कोई मेल नहीं होता लेकिन तू तो मेरे खिलाफ जीवन में ही जीवन से विरक्त होने की साजिश रच कर चला गया। जानते हो न मिट्ठू ! मैंने तुम्हें किसी को नहीं दिया था, सिर्फ इस डर से कि तुम्हारा लालन-पालन पता नहीं कैसे हो।

 

इन डॉक्टर साहब का नाम पन्ना लाल सिंह है। यह पशु चिकित्सालय आयर वाराणसी से सेवानिवृत्त हैं। विभागीय सहयोगी होने के नाते वह डॉ.एल.बी.सिंह से परिचित थे। मोबाईल पर उनसे सम्पर्क करके उन्हें लगाये गये उस इंजेक्शन के बारे में बताते हुए यह सलाह ली कि क्या अब टी.एन.सी.फोर्ट इंजेक्शन लगाया जा सकता है। उनकी सहमति मिल जाने पर वह मुझे अपने घर ले गये और वहाँ उस इंजेक्शन को लगाने के अलावा उसी की एक शीशी सिरप भी देकर बोले कि अब और इंजेक्शन लगवाने की ज़रूरत नहीं है। इसी सिरप को पिला दीजियेगा। उन्होंने एक अन्य पशु चिकित्सक डॉक्टर जे.एन. सिंह का परिचय भी बताया। जो ‘जय डॉग केयर’ के नाम से भोजूबीर वाराणसी में क्लीनिक चलाते हैं। यह भी पशु विभाग के सहायक अथवा उप निदेशक के पद से सेवानिवृत्त हैं।

दूसरे दिन अर्थात् 18 अप्रैल 2017 को मैंने पूरी उम्मीद के साथ मृत्युंजय को टी.एन.सी.फोर्ट सिरप पिलाया। उल्टी रोकने के लिये भी दवा देता रहा लेकिन उसकी तबीयत में कोई सुधार नहीं हुआ। एक रात और गुज़री। 19 अप्रैल 2017 को आखिरी उम्मीद के रूप में मैंने डॉ.जे.एन.सिंह को फोन किया लेकिन वह कहीं बाहर थे और दूसरे दिन मिलने का आश्वासन दिया। कहना अन्यथा नहीं होगा कि मौत के साथ मृत्युंजय की आँखमिचौली का खेल जारी था और मेरी मायूसी लगातार बढ़ रही थी। 20 तारीख को फोन पर मैंने डॉ. जे.एन. सिंह की उपस्थिति की पुष्टि की और लगभग दो बजे अपरान्ह अपनी वाइफ को साथ लेकर रिक्शे से उसे डॉक्टर के पास ले गया। उन्होंने उसका टेम्प्रेचर लिया। वह नार्मल से कम था। डॉक्टर के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आयीं। बहुत दुखी होकर बोले कि इसके बचने की मात्र पाँच प्रतिशत ही गुंजाइश है।

उसके टेम्परेचर में सुधार हेतु इंजेक्शन लगाकर बोले कि यदि इसका टेम्परेचर कुछ भी बढ़ जाता है तो इसे बचाने के लिये मैं पूरी कोशिश करूँगा। उन्होंने उल्टी रोकने के लिये होमियोपैथिक की दवा इस हिदायत के साथ दी कि हर आधे घंटे के बाद दो बूँद उसे पिला दिया जाये और यदि इसके बाद भी उल्टी न रुके तो स्टेमेटिल की आधी टेबलेट दे दी जाये। उसकी उल्टी नहीं रुकी। शाम को लगभग छः बजे मैंने डॉक्टर को फोन पर इसकी सूचना दी। उन्होंने स्टेमेटिल के साथ एसिलोक (बपसवब) टैबलेट की आधी-आधी टैबलेट एक साथ पीसकर पिलाने को कहा।

मैंने विकास जी से दोनों दवाएँ मँगाकर हिदायत के अनुसार उसे पिलाया लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। उल्टी करते-करते वह बिल्कुल पस्त तो हो ही गया था उसके मुँह के चारों तरफ उल्टी का झाग लिथड़ा हुआ था। लगभग साढ़े नौ बजे मैंने डीटाल से उसका बदन साफ़ करके लिटा दिया। वह ख़ामोशी से लेट गया और फिर बिल्कुल खामोश हो गया। कहाँ की बीमारी, कहाँ का दुःख, कहाँ का दर्द, कहाँ की उल्टी और कैसा इलाज! सब कुछ निरर्थक हो गया। वह 13 अप्रैल 2010 को सायंकाल सात-साढ़े सात बजे आया था और 20 अप्रैल 2017 को  लगभग साढ़े नौ- दस बजे रात्रि को चला गया। कुल सात साल, सात दिन और दो-ढाई घंटे का जीवन और वह भी अधिकांश संत्रास भरा एकाकी। यह भी अजब संयोग है कि दोनों ही बार अम्बेडकर जयंती के अवसर पर ही उसे अपने प्राणों को बचाने के लिये जूझना पड़ा। पहली बार मौत हारी मगर दूसरी बार वह स्वयं हार गया। मेरे लिये अम्बेडकर जयंती कुछ भी हो, उसके लिये तो जानलेवा ही साबित हुई।

तुझे एक नाम विकास जी ने भी दिया था। वह नाम था मोती। तू सचमुच उनके लिये मोती की ही तरह कीमती था। बहुत प्यार से रखते थे तुझे मियाँ-बीवी दोनों। तुझे पाने के बाद ही उन्होंने अपने पुत्र रत्न को प्राप्त किया था। उनके लिये तू कितना शुभ साबित हुआ था। अपनी अपरिहार्य व्यस्तताओं के बावजूद तेरे लालन-पालन में कोई कमी नहीं रखते थे वे।

 

जब वह उसी पोज में लेटा रहा जिस पोज में मैंने उसे लिटाया था और कुछ समय तक उसने कोई हरकत नहीं की तो मेरे मन में उसके न रहने का अंदेशा पैदा हो गया। मैंने उसे हिलाया-डुलाया। मेरा अंदेशा सच निकला। वह हमेशा के लिये खामोश हो गया था। मैंने उसे जब लिटाया था तो मुझे क्या पता था कि वह कभी भी न उठने के लिये लेट रहा है। मेरा मन चीत्कार कर उठा। वह मेरे सामने ही दम तोड़ गया और मैं उसकी इस हरकत को देख भी नहीं पाया। अन्दर के कमरे में जाकर अपनी वाइफ को इसकी सूचना दी। सुनकर वह भी हक्का-बक्का रह गयी। तेजल तथा घर के अन्य सदस्य भी दुखी हो गये। अमन तो रोने ही लगे। और वह बदमाश ! वह तो इस सब से बेखबर अपनी ही नींद सो रहा था।

मेरा चीखता हुआ मन उसकी तरफ देखकर कह उठा, ‘कैसा सो रहा है बदमाश ! अब न कोई शिकायत करेगा और न ही कोई शिकायत सुनेगा। माया-मोह से परे, स्वामी-भक्ति के आरोप से तो तू मुक्त हो गया मगर बता जीते-जी मैं कैसे तेरी यादों के मोह से मुक्त होऊँगा। क्या तुझे पता नहीं था कि जीवन और विरक्ति का कोई मेल नहीं होता लेकिन तू तो मेरे खिलाफ जीवन में ही जीवन से विरक्त होने की साजिश रच कर चला गया। जानते हो न मिट्ठू ! मैंने तुम्हें किसी को नहीं दिया था, सिर्फ इस डर से कि तुम्हारा लालन-पालन पता नहीं कैसे हो। न मैं अपना वचन निभा पाया और न तुम ही बहुत दूर तक मेरे साथ चलने को तैयार हुए। तेरे जाने से तेरी दीदी पर क्या गुजरेगी, तुझे इससे क्या? तुझे तो यह भी याद नहीं होगा कि जब तू दबा था मेरे पैरों के नीचे तो कितना दुखी हुई थी वह। कितना नाराज़ हुई थी मेरे ऊपर। और मम्मी ? उसने तो न जाने कितनी लानत-मलामत की थी मेरी। लेकिन तू बच गया था तो सब कुछ सामान्य हो गया था। दीदी ने प्यार से तेरा नाम मिट्ठू रख दिया था। वह हमेशा इसी नाम से बुलाया करती थी तुझे। वह जब कभी अपने दोस्तों से तेरा ज़िक्र करती थी तो वे यही समझते थे कि उसने कोई तोता पाल रखा है। वह भी शरारतन सच्चाई को अन्त में बताती थी तो कितने ठट्ठे लगते थे तेरे नाम पर, इसका तुझे कोई अंदाजा नहीं है लेकिन तेरे साथ तेरी दास्तान ख़त्म नहीं होगी। वह तेरी यादों को साझा करेगी अब अपने दोस्तों के साथ और तेरा नाम अब भी उनके अन्दर वही उत्सुकता पैदा करेगा, यह बात अलग है कि अब शायद हँसी के फौव्वारे न छूटें बल्कि उसकी जगह एक टीस उभर जाये उनके चेहरे पर।

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मृत्युंजय के लिए मेरे मन में आजीवन गिल्ट रहा क्योंकि मेरे लिए बच्चे से भी बढ़कर था -1

‘तुझे एक नाम विकास जी ने भी दिया था। वह नाम था मोती। तू सचमुच उनके लिये मोती की ही तरह कीमती था। बहुत प्यार से रखते थे तुझे मियाँ-बीवी दोनों। तुझे पाने के बाद ही उन्होंने अपने पुत्र रत्न को प्राप्त किया था। उनके लिये तू कितना शुभ साबित हुआ था। अपनी अपरिहार्य व्यस्तताओं के बावजूद तेरे लालन-पालन में कोई कमी नहीं रखते थे वे। तेरे प्रति पूरी तरह संवेदनशील। कितनी तकलीफ हुई थी उन्हें तुझे वापस करते हुए। उनका बच्चा अनुराग जो अब पाँच साल का हो गया है, तुझ पर हमेशा अपना दावा ठोंकता रहता था, यह मेरा मोती है, यह कह कर। अच्छा, अलविदा दोस्त!’

और अन्त में मैं अपने मित्र अशोकानंद जी को याद कर रहा हूँ। यह कितनी दुखद स्थिति है कि किसी भी शहर में पशुओं के मृत शरीर का अंतिम संस्कार करने की कोई व्यवस्था नहीं है। वाराणसी भी कोई अपवाद नहीं है। जब टफी की मृत्यु हुई थी तब भी मेरे सामने यह समस्या पैदा हुई थी। उस समय वरुणा नदी में भयंकर बाढ़ आई हुई थी। बहुत ही भारी मन से मैंने उसके मृत शरीर का निस्तारण करने के लिये कॉलोनी में आनेवाले सफाई कर्मी संतोष को दे दिया था। जब इस घटना की चर्चा मैंने अशोक जी से की तो उन्होंने मुझे उलाहना देते हुए कहा कि आपने मुझसे क्यों नहीं कहा, मैं उसे अपने खेत में दफ्न कर देता। उनकी बातों से मैं द्रवित हो गया था। वह घटना मुझे याद रही। मैं सुबह साढ़े छह बजे उनके घर जाकर मृत्युंजय की मृत्यु का समाचार देते हुए उसके अन्तिम संस्कार की बात की। उन्होंने तत्काल मुझसे कहा कि उसे नौ बजे ले आइये। मैं अपने खेत में उसे दफ्न कर दूँगा। मैं नियत समय पर ले गया। उन्होंने अपने दो आदमी लगा कर तीन-साढ़े तीन फीट गहरा गड्ढा खुदवाया, बिल्कुल कब्र की तरह। मैंने उनके साथ मिलकर बड़े आदर और नम आँखों के साथ मृत्युंजय के मृत शरीर को मिट्टी के हवाले कर दिया, मिट्टी में ही मिल जाने के लिये। मृत्युंजय के मृत शरीर को आदर देनेवाले अशोक जी के लिये आभारस्वरूप निम्न पंक्तियों के साथ मैं अपनी बात को यहीं विराम दे रहा हूँ ;

जिसकी वजह से तुझको मिली एक गज ज़मीन।

उस दरियादिल अशोक को लाखों सलाम है।।

मूलचन्द सोनकर हिन्दी के महत्वपूर्ण दलित कवि-गजलकार और आलोचक थे। विभिन्न विधाओं में उनकी तेरह प्रकाशित पुस्तकें हैं 19 मार्च 2019 को उन्होंने इस संसार को अलविदा कहा।

1 Comment
  1. Gulabchand Yadav says

    मार्मिक संस्मरण। मूलचंद सोनकर ने बड़े भावपूर्ण ढंग से पूरी आत्मीयता के साथ लिखा है इसे।

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