Sunday, May 26, 2024
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महाराष्ट्र : कर्ज़ से छुटकारा पाने के लिए आत्महत्या करें या गुलामगीरी पर गुलेल चलाएँ?

महाराष्ट्र का विदर्भ क्षेत्र का नाम किसानों की आत्महत्या के मामले में अक्सर सुनाई देता रहा है। लेखिका डॉ लता प्रतिभा मधुकर ने विदर्भ के यवतमाल और वर्धा जिले के मृतक किसानों की पत्नियों से मिलकर उनके संघर्ष और जीजीविषा को नजदीक से देखा। ये आत्महत्या न कर ज़िंदगी से क्यो और कैसे लड़ती हैं? पढ़िये ग्राउंड रिपोर्ट का भाग एक-

 (घर के किसान पुरुष की आत्महत्या के बाद  एकल महिला के संघर्ष की आप बीती बयान करने वाली रिपोर्ट)

विदर्भ मेरी जन्मभूमि होने के कारण आज भी विदर्भ का नाम कहते या सुनते ही मैं नॉस्टेल्जिक हो जाती हूँ। मगर पिछले कुछ वर्षों में विदर्भ दो बातों के लिए बदनाम हुआ है – पहला यहाँ देश और प्रदेश में सबसे ज़्यादा किसानों की आत्महत्याएँ की और दूसरा हिंदुत्ववादी आरएसएस की मनुस्मृति की पकड़ यहाँ होने से देश में हिन्दुत्ववादी विचारधारा को मजबूती मिली है।

लेकिन ‘मेरा महाराष्ट्र’ या ‘मेरा विदर्भ’ कहने से मैं गौरवान्वित होती हूँ उसका अर्थ क्या होता है? क्या उपर्युक्त पृष्ठभूमि पर मुझे वाकई गर्व महसूस करना चाहिए?

क्या मुझे गर्व करना चाहिए? क्योंकि विदर्भ की धरती पर डॉ. बाबासाहेब ने धम्म-दीक्षा ग्रहण की या इस धरती को नवयान बौद्ध धम्म-दर्शन का सम्पुट प्राप्त हुआ या फिर इस बात पर शर्मिंदगी महसूस करूँ कि विदर्भ की इसी धरती पर मानवता, करूणा को कलंकित करने वाली खैरलांजी की शर्मनाक़ घटना घटित हुई!

गर्व करूँ कि स्वच्छता और साक्षरता का मंत्र फूँकने वाले गाडगे बाबा की यह कर्मभूमि है या फिर शर्म महसूस करूँ कि यहाँ गुटखा और पान की पीकों से लिथड़े हुए रास्ते, इमारतें, बस स्टैंड, रेल्वे स्टेशन हैं और शौचालय गंदगी और बदबू से भरे हुए हैं।

मोझरी, अमरावती के तुकडोजी महाराज पर गर्व करूँ, जो कहते थे कि देव-देवकी (देवताओं से जुड़े आपसी रिश्ते-नाते)नहीं, गाँव-गावकी (गाँववालों के बीच परस्पर संबंध) होनी चाहिए; श्रीकृष्ण वाली गीता नहीं, ग्राम पंचायत पर आधारित ग्राम-गीता होनी चाहिए। गाँव का विकास और ग्राम-स्वराज की राजनीति होनी चाहिए या फिर ‘समृद्धि मार्ग’ पर रोज़ाना होने वाली दुर्घटनाओं के बरअक्स राजनीतिज्ञों द्वारा अरबपति बनने के लिए बनाए गए मृत्यु-मार्गों को देखकर शर्मिंदा होना चाहिए?

गाँव की ओर चलो, खेती करो इस बात को साबित करने के लिए वर्धा में सेवाग्राम आश्रम की स्थापना की और कृषि और कुटीर उद्योगों को ही गांधी जी ने जीवन-शैली माना। मगर आज इसके विपरीत लाखों किसानों को आत्महत्या करने के लिए बाध्य करने वाली सरकारी नीतियों को देखकर मुझे निराश होना चाहिए? या फिर, मिट्टी को सोना बनाने वाले भूमिपुत्रों की छाती पर चढ़े, राजा बलि की भूमि को हड़पने वाले वामन के निरंतर जारी षड्यंत्रों के तहत चलने वाले मृत्यु-सत्रों को दिल कड़ा कर चुपचाप देखते रहना चाहिए?

इन्हीं सब कारणों से मेरी नज़र में मेरा महाराष्ट्र महान होते-होते कब छोटा, संकुचित और असंवेदनशील होता चला गया पता ही नहीं चला। मेरा विदर्भ भी पिछले बीस वर्षों में हज़ारों किसानों के लिए जानबूझकर श्मशान में कब व कैसे बदलता चला गया, मुझे भी पता नहीं चला। हालाँकि अभी भी मेरी यादों में अपने बचपन में देखा हुआ किसानी यथार्थ बीच-बीच में आँखों के सामने तैरता रहता है।

मेरे ज़ेहन में बचपन का किसान आज भी ज़िंदा है 

इस विदर्भ अंचल में सभी जाति-धर्मों को मानने वाले लोग मेरे दोस्त रहे हैं। मेरे बचपन का ननिहाल, जहाँ किसान होने का दुख नहीं था, बल्कि हँसी-खुशी का माहौल था, भले ही जीवन कड़े परिश्रम से गुजरता हो। सुबह से शाम तक खटने वाले हाथ थे, मगर घर में हमेशा आदमी, गाय, बैल, मुर्गियाँ, कुत्ते, बिल्लियाँ घर-आँगन में विचरते रहते थे। घर में बरामदे से लेकर पिछवाड़े के आँगन तक ज्वार, मिर्च, जौ, मूँगफली के भर-भर बोरे रखे होते थे। इसी तरह कपास निकालने के बाद बचे पौधों के अवशेषों के लिए एक अलग कमरा होता था, ये सभी बातें किसान के घर में देखने को मिलती थीं। (ऐसा होता था किसान का घर!)

अब शहरों में लोगों के घर की बैठक में बीन्स से भरे हुए रबड़ या रैग्ज़िन के बोरेनुमा फैशनेबल सोफे रखे होते हैं। मगर वहाँ होते थे सचमुच के बीजों और अनाजों के बोरे, जिन पर हम बैठते थे, उछलकूद करते थे। हमें उस ग्रामीण बैठक के लिए कभी शर्म महसूस नहीं हुई। वहाँ जब मिर्च के बोरे आते, तो छोटे बच्चों के हाथ-पैर में जलन न हो इसलिए उन्हें अलग रखा जाता था।

आज भी याद है, माँ के चाचा ‘तात्याजी’ कई बार हमें खेत पर ले जाते। माँ की दोनों चाचियाँ तालाब पर कपड़े धोने के लिए हमें साथ ले जातीं। जब मामा खेती-किसानी सम्हालने लगे, तब हम तात्याजी के साथ कभी-कभी मंडी भी जाते थे। मंडी में उनकी बैठकी की जगह एकदम प्रवेश द्वार की प्राइम लोकेशन पर थी। जिस तरह तबियत से गाने वाला गवैया अपनी बैठकी नहीं छोड़ता, उसी तरह तात्याजी भी सुबह आठ बजे से दोपहर 12 बजे तक और फिर एक बजे से शाम सात बजे तक अपने ‘पसरे’ पर बैठते थे। सामने पान की टोकरी होती थी। हरे-भरे पान उसमें सजे होते थे। कपूरी पान, बंगला पान, मीठा पान जैसे अनेक प्रकार के पानों के साथ एक डिब्बे में झक्क सफेद चूना रखा जाता था। पानों के बंडल के साथ एक पान पर चूना मुफ्त में दिया जाता था। उस समय के किसान मुझे बहुत अमीर मालूम देते थे। मेरे पिता के पिता, अर्थात दादा जी सिर पर टोकरी लेकर मोहल्ला-मोहल्ला फेरी लगाते थे। हालाँकि उनके खेत काफी दूर, रामटेक के पार सिवनी में थे। वहाँ जाकर खेती-किसानी की जाती और व्यापार नागपुर में होता। घर की सभी नानी-दादी, बुआ, मौसियाँ, जो पढ़ने नहीं जाती थीं, वे या तो खेतों पर हाथ बँटाने जातीं, या फिर घर में ही सब्जी-भाजी, दही-दूध या पान के पत्ते बेचने के लिए दिन भर काम करती थीं।

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उस समय वे लोग कभी भजन-कीर्तन, पूजा-पाठ या प्रवचन जैसे कार्यक्रमों के लिए जाते लेकिन इसमें मुझे खास बात नहीं दिखाई देती थी। ज़्यादातर लोग घर में शाम को दीया जलाते या फिर पास के हनुमान या शंकर के मंदिर में बत्ती जलाने जाते,  यहीं तक उनका भक्तिभाव सीमित था।

किसान परिवारों की दिनचर्या में पूरी मेहनत के साथ रसोई पकाने, परोसने, साफसफाई, कपड़े-बर्तन धोना, अनाज पछीटकर साफ करना, कूटना-पीसना, मसाले बनाना, पापड़-बड़ी बनाकर सुखाकर रखना, तिल, जौ, मूँगफली साफ कर तेल की घानी पर ले जाया जाना शामिल रहता था। परस्पर बातचीत के लिए नदी-तालाब जैसे पनघट ही गप्पबाज़ी के अड्डे हुआ करते थे। या फिर खेतों से लौटते हुए, खेतों में काम करते हुए सभी औरतें एकदूसरे से शिकवा-शिकायतों, सुख-दुख साझा किया करती थीं। उस समय तक चक्की आ चुकी थी। लड़कियाँ लगभग दसवीं तक पढ़ने जाने लगी थीं।

1971 में सातवीं कक्षा में पहुँचने तक मैंने यही दुनिया देखी। उसके बाद अचानक महँगाई बढ़ी। मिल की लाल ज्वार आने लगी। उस समय मेरे मामा का किसान परिवार था। उसकी खिल्लारी बैल जुती हुई रंगीन गाड़ी, खेतों में काम करने के कारण खुरदुरे हो चुके हाथ, पाँवों में फटी बिवाइयाँ, खास अवसरों पर पहनने के लिए एक और रोज़ाना के लिए केवल दो, नौ गजी साड़ियाँ होती थीं, जिन्हें अदल-बदल कर पहनने वाली मेरी दादी-नानी। लगभग मेरी ही उम्र की सीधी-सादी मौसियाँ, वे भी लहँगा-चोली पहनने वाली! दो मामा पढ़ाई छोड़कर खेती-किसानी में लग गए थे। बाकी मामा नौकरी करने लगे थे।

धीरे-धीरे दिन पलटने लगे। जिन लोगों ने खेती छोड़कर नौकरी कर ली थी, उनके पक्के मकान बन गए। स्कूटर खरीदे गए। जिन घरों में महिलाएँ नौकरी करने लगी थीं, वे तो एकदम मध्यवर्गीय बन गए। ये मध्यवर्गीय परिवार खेती करने वाले युवकों को दामाद बनाने से इंकार करने लगे। वहीं किसान महिला की तुलना में किसान पुरुष चाहने लगा कि उसे कम से कम डी.एड. तक पढ़ी हुई पत्नी चाहिए, ताकि उसकी घर में आर्थिक मदद हो सके। समाज में समीकरण तय हो गया कि, किसान पुरुष पढ़ा-लिखा होने के बावजूद गँवार, मगर कम पढ़ा-लिखा नौकरी करने वाला पुरुष होशियार बाबू कहलाने लगा। उसे पाँचवें वेतनमान के बाद सातवाँ वेतनमान मिल गया; मगर दूसरी ओर गाँव की परिस्थिति बद से बदतर होती चली गई कि किसान पुरुष और महिला को रोज़गार गारंटी के तहत मिलने वाला न्यूनतम वेतन तक नियमित मिलने के लाले पड़ने लगे।

 विदर्भ का किसान आंदोलन

1980 से विदर्भ अंचल में शुरु किये गये किसान आंदोलन के पहले चरण में हम जैसी तीन-चार लड़कियाँ शामिल थीं। नागपुर विधानसभा के अधिवेशन के दौरान भीतर जाकर हम चार युवाओं ने किसान संगठन के परचे फेंके थे – मैं, शुभदा देशमुख, देवकुमार बाचिकवार और जगदीश काबरा। उस समय पहली बार पुलिस का ज़ोरदार थप्पड़ खाने का अनुभव हुआ। साथ ही पुलिस द्वारा डिटेन किये जाने का क्या मतलब होता है, यह भी जाना था। इसके बाद तो आंदोलनों में जेल, पुलिस द्वारा मारपीट, मानवाधिकार हनन के संदर्भ में सरकार और पुलिस द्वारा किये गये अत्याचारों का सिलसिला जारी रहा।

बहरहाल, पिछले साल दिल्ली में हुआ किसान आंदोलन देश का सबसे लंबे समय तक चलने वाला आंदोलन था। उसमें पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और समूचे देश से आईं महिला किसानों ने पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर ट्रैक्टर चलाते हुए किसान आंदोलन में शामिल हुई थीं। इस आंदोलन में महाराष्ट्र की महिला किसानों ने हिसा लिया लेकिन उनमें से अधिकांश एकल महिलाओं की थी। ये महिलाएँ आत्महत्या किये हुए किसान परिवारों की विधवा महिलाएँ थीं।

अप्रेल 2023 में इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर एनविरोनमेंट एण्ड डेवलपमेंट नामक संस्था ने अपनी रिपोर्ट में लिखा था कि अनेक भारतीय किसानों ने क्लाइमेट चेंज के कारण आत्महत्या की। उनके अध्ययन के अनुसार, 2022 में 2640 अर्थात सबसे ज़्यादा संख्या में महाराष्ट्र में, ख़ासकर विदर्भ में किसानों ने आत्महत्या की थी। कर्नाटक में 1170 और आंध्र प्रदेश में 481 आत्महत्याएँ कीं लेकिन इसके बावजूद वहाँ की सरकारों ने कोई उल्लेखनीय और ठोस कदम नहीं उठाए। महाराष्ट्र शासन की संबंधित नीतियों पर किसी ने न तो श्वेत पत्र जारी किया और न ही किसी ने भी शासन-प्रशासन से जवाब-तलब किया।

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अपराध अनुसंधान विभाग और वित्त विभाग द्वारा प्रस्तुत प्रतिवेदन के अनुसार किसान 20,000 रुपयों से लेकर 4,00,000 रुपये तक के कर्ज़ अदा नहीं कर पाए थे। इतनी कम रकम के लिए इस देश के किसानों ने आत्महत्या की है। महाराष्ट्र में प्रतिदिन लगभग 08 किसान आत्महत्या करते हैं। अर्थात, लगभग रोज़ ही 08 किसान महिलाएँ विधवा होती हैं। अर्थात, महाराष्ट्र में प्रति वर्ष लगभग 2930 किसान महिलाएँ विधवा होती हैं। किसान विरोधी जुल्मी कानून और किसानों के जीवन का सरकार की नज़र में कोई महत्व नहीं है, वे नगण्य स्थान रखते हैं।

जब किसान आंदोलन में महाराष्ट्र के आत्महत्याग्रस्त परिवारों की किसान स्त्री शामिल हुई, तब उस संघर्ष में उसका जीवनसाथी किसान पुरुष उसके साथ नहीं था। उसका संघर्ष स्थानीय के साथ-साथ राष्ट्रीय, राजनीतिक और कानूनी रूप धारण कर चुका था। हममें से अधिकांश लोग इस बात की कल्पना तक नहीं कर सकते कि इन एकल महिला किसानों को अपना संघर्ष कितने मोर्चों पर एक साथ करना पड़ता है!

ये वे महिलाएं हैं, जिनके पतियों ने कर्ज और खेती में नुकसान के कारण आत्म्ह्त्या कर ली

उनकी मानसिक स्थिति कौन समझेगा?

‘वह’ खेती-किसानी का कर्ज़ चुकाने और उसके लिए धन जुटाने के दौरान निराश होकर जीवन-संग्राम अधूरा छोड़कर चला गया। मगर उसके पीछे छूटी ‘उस’ स्त्री का क्या? मैं ‘उनके’ जीवन की कहानियाँ इकट्ठा करने के लिए चल पड़ी। सिर्फ विदर्भ अंचल की ही नहीं, पश्चिम महाराष्ट्र और मराठवाड़ा अंचल की भूमिकन्याओं से भी मैंने संवाद किया। सच कहा जाए तो वेदना के किसी भी क्षेत्र में झाँकने का अर्थ ही होता है उनकी यादों को ताज़ा कर उनके ज़ख़्मों को कुरेदना। इसलिए ऐसे प्रकरण में उनसे कहाँ और कैसे मिलना होगा, इस बात का ध्यान रखना भी ज़रूरी होता है। हम जिनके घर जाने वाले हैं, उन्हें हमारे जाने से किसी प्रकार की असुविधा न हो, इस बात की सावधानी भी बरतनी होती है। मृत्यु के बाद कुछ समय बीत चुका हो तो बातचीत थोड़ी आसान हो जाती है, क्योंकि संबंधित लोग कुछ संभल जाते हैं; परंतु जब दुर्घटना हुए अधिक समय न हुआ हो, उस स्थिति में व्यक्ति से या उसके परिवार से बातचीत करना ज़्यादा कठिन होता है। पिछले साल भर मैंने इन क्षेत्रों का दौरा किया। परिषद के बहाने कुछ लोगों से मिलकर मराठवाड़ा अंचल के कुछ किसान और गन्ना-कटाई वाली मज़दूर महिलाओं और 10-12 वर्ष की बच्चियों की समस्याओं को समझने की कोशिश की।

महत्वपूर्ण बात यह है कि जहाँ महिलाओं, किसानों के या अन्य सामाजिक संगठन हैं, वहाँ उनके माध्यम से संबंधित घरों तक पहुँचना संभव हो पाता है क्योंकि वहाँ संवाद का एक रास्ता पहले ही तैयार हो चुका होता है। वहाँ के स्थानीय अंचल में आपका संगठन किस तरह काम करता है, उस पर यह बात निर्भर करती है।

वहाँ सामाजिक आंदोलन में हमारे संगठन और संस्था की सक्रिय साथी नूतन मालवी और माधुरी खडसे जो कई वर्षों से किसानों के बीच काम कर रही हैं। वे किसान महिलाओं की समस्याओं पर काम करती हैं। पहले से खेती-किसानी की समस्याओं पर काम करने वाली देश भर में उन जैसी सक्रिय अनेक महिला कार्यकर्ताओं को महिला किसान अधिकार मंच ने आपस में जोड़कर एक राज्यस्तरीय और राष्ट्रीय नेटवर्क तैयार किया है। इसका फायदा यह हुआ है कि पिछले पाँच सालों में महिला किसानों की समस्याओं को काफी ज़ोरदार तरीके से प्रस्तुत किया जाने लगा है। इस नेटवर्क के कारण ही आत्महत्या करने वालों का समाचार तुरंत ही फैल जाता है। हालाँकि आत्महत्याओं को रोकने में इस संगठन ने पूरी तरह से सफलता प्राप्त नहीं की है। (मराठी से अनुवाद – उषा वैरागकर आठले)

(विदर्भ की जमीन से किसानों की स्थिति और आत्महत्या करने वाले किसानों की पत्नियों/परिवारों की स्थिति का दूसरा भाग कल)

भाग -1 

महाराष्ट्र : महाजनों के डर से आत्महत्या करते धरतीपुत्र और घर चलाती भूमि कन्याएँ

भाग -2 

महाराष्ट्र : किसानों की पत्नियाँ कर्ज चुकाते जी रही हैं बदतर ज़िंदगी

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