हिंदुत्व के खात्मे के लिए भूमि सुधार अनिवार्य  (डायरी 12 नवंबर, 2021)

नवल किशोर कुमार

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मनुष्य होने की पहली शर्त यही है कि वह जड़ न रहे। जड़ता मनुष्य को पशुओं से भी अधिक हिंसक बना देती है। रही बात जड़ता की तो इसका संबंध धर्म से है जिसे अंग्रेजी में रिलीजन, उर्दू में मज़हब और अन्य भाषाओं में कुछ और शब्दों के नाम से जाना जाता है। सबसे महत्वपूर्ण यह कि धर्म कोई एकआयामी पहलू नहीं है। मुझे तो बचपन याद आता है। उन दिनों मेरे घर में चापाकल तक नहीं था। हम पीने के पानी से लेकर नहाने-धोने आदि सभी तरह के कार्यों के लिए गोतिया के कुएं पर आश्रित थे, जो कि मेरे घर के पिछले दरवाजे के ठीक सामने ही था। दरअसल, 1917 में मेरे परदादा के पिता पांचू गोप ने 1912 में बंगाल प्रेसीडेंसी से बिहार के अलग होने के बाद तत्कालीन अंग्रेजी हुकूमत के द्वारा पटना में भोलाचक (वर्तमान में पटना एयरपोर्ट का दक्षिणी हिस्सा) का अधिग्रहण करने के बाद पांच बीघा का प्लॉट मकान के वास्ते खरीदा था। इस भूखंड को आज भी पंचबिगहा कहा जाता है। ऐसा करने के पीछे मेरे पुरखे की इच्छा यह रही होगी कि उनके पांच बेटे – अकलू गोप, भगेरन गोप, भोला गोप, रामेश्वर गोप और महाराज गोप – के बीच संपत्ति का बंटवारा आसानी से हो। उस समय इस भूखंड के भंडार कोने (दक्षिणोत्तर कोने) पर आधा कट्ठा जमीन खाली रखा गया और एक मंझोले आकार का कुआं बनाया गया। अब तो यह कुआं बेकार हो चुका है और रिक्त जमीन लावारिस अवस्था में है।

खैर मेरी जेहन में कुआं है और कई बार ऐसा होता था कि पानी निकालते समय या तो रस्सी हाथ से छूट जाती या फिर रस्सी बीच से टूट जाती और बालटी कुएं में डूब जाती। कई बार मुझसे भी ऐसा हुआ कि कुएं पर पानी भरने गया और खाली हाथ लौटा। तब घर में एक कांटेदार उपकरण होता था। शायद उसे झग्गड़ कहते थे। मेरी जेहन में यही शब्द है। उस उपकरण में अनेक लोहे के चंद्राकार फांस होते थे। हम करते यह थे कि उसे एक मजबूत रस्सी से बांधकर कुएं में डालते और बालटी की टोह लेते। यह बेहद खास था। कभी-कभी तो बालटी तुरंत ही पकड़ में आ जाती तो कभी बहुत समय लगता था। लेकिन परिणाम हमेशा अच्छा ही होता था। बालटी किसी न किसी फांस में फंस ही जाती थी और हम उसे बाहर निकाल लेते थे। अब पता नहीं, मेरे घर का झग्गड़ कहां है। सोच रहा हूं कि इस बार पटना जाऊंगा तो खोजूंगा। अपने घर की प्राचीनकालीन उपकरण को सहेजूंगा।

कंगना राणावत के बयान को सोच रहा हूं, जिसमें उसने कहा है कि भारत को असली आजादी 2014 में मिली। उसने ऐसा बयान अपनी धार्मिक कट्टरता के कारण दिया है और यही उसका विवेक है। मैं तो यह मानता हूं कि इस देश के 85 फीसदी दलित-बहुजनों को आजादी नहीं मिली है। मेरी स्पष्ट मान्यता है कि जबतक इस देश में मुकम्मिल तौर पर भूमि सुधार लागू नहीं होता है तबतक इस देश के 85 फीसदी दलित-बहुजन गुलाम ही रहेंगे।

बहरहाल, झग्गड़ का उदाहरण इसलिए कि धर्म अथवा मज़हब भी ऐसा ही होता है। इसमें भी बहुत फांस होते हैं जो आदमी को फांस ही लेते हैं। लेकिन आदमी को बालटी की तरह नहीं होना चाहिए कि वह फंस ही जाए। उसे तो मनुष्य होना चाहिए जिसके पास विवेक है। मैं तो कासगंज सदर थाने के पुलिसकर्मियों के बारे में सोच रहा हूं, जिनके उपर 22 वर्षीय पसमांदा मुसलमान युवक अल्ताफ की हत्या का आरोप है। बताया जा रहा है कि अल्ताफ ने थाने के शौचालय में जाकर दो फीट ऊंची नल की पाइप से लटककर अपनी जान दे दी। पुलिस की इस थ्योरी में कितना झूठ है, इसका अनुमान इसी मात्र से लगाया जा सकता है कि पुलिस कह रही है कि अल्ताफ ने फंदा बनाने के लिए अपने पाजामे के नाड़े का उपयोग किया। पुलिस ने अपनी दलील को मजबूत बनाने के लिए मृतक के पिता का कबूलनामा भी जारी किया है।

खैर, यह पहली घटना नहीं है जब पुलिस की हिरासत में गरीब-मजलूमों को मारा गया हो। बचपन में मैं एक बात सुनता था कि पुलिस आदमी की ढोंरी (नाभि) को अपने जूते से कुचल देती है। ऐसा करने से आदमी की आंतें क्षतिग्रस्त हो जाती हैं और आदमी के शरीर पर मारपीट का कोई निशान भी नहीं रहता। इस तरह की बातें मैं अक्सर ही सुनता था जब मेरे इलाके के किसी दलित-बहुजन की मौत थाने से लौटने के बाद हो जाती थी।

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मैं तो अल्ताफ की बात कर रहा था। उसे पुलिस ने जिस आरोप में गिरफ्तार किया था, वह बेहद दिलचस्प है और उसका संबंध धर्म से है। दरअसल, अल्ताफ टाइल्स लगाने का काम करता था। उसके उपर आरोप था कि उसने हिंदू धर्म को मानने वाले एक परिवार के घर में टाइल्स लगाने के दौरान उस घर की लड़की को अपने प्यार में फांस लिया था और फिर उसे भगा ले गया। यहां अब इस सवाल का कोई मतलब नहीं है कि यदि अल्ताफ वाकई में किसी हिंदू लड़की को उसके घर से भगा ले गया होता तो वह अपने घर में क्या कर रहा था और क्या उस लड़की की बरामदगी उसके घर से हुई थी? और यदि उस लड़की की बरामदगी उसके घर से हो भी जाती तो पुलिस का काम यह था कि उस लड़की की उम्र के बारे में तफ्तीश करती तथा यदि वह बालिग होती तो प्रेमी युगल को सुरक्षा देनी चाहिए थी। लेकिन यूपी पुलिस की नजर में कटुआ (मुसलमानों को दी जानेवाली गाली) कटुआ ही होता है। ठीक वैसे ही जैसे मुझे मेरे बचपन में बार-बार सिखाया जाता था– जो खाय गाय का गोश्त, उ कैसे होय हिंदू का दोस्त। लेकिन मेरे तो अनेक मित्र मुसलमान हैं और मुझे उनकी मित्रता पर गर्व है।

यह पहली घटना नहीं है जब पुलिस की हिरासत में गरीब-मजलूमों को मारा गया हो। बचपन में मैं एक बात सुनता था कि पुलिस आदमी की ढोंरी (नाभि) को अपने जूते से कुचल देती है। ऐसा करने से आदमी की आंतें क्षतिग्रस्त हो जाती हैं और आदमी के शरीर पर मारपीट का कोई निशान भी नहीं रहता। इस तरह की बातें मैं अक्सर ही सुनता था जब मेरे इलाके के किसी दलित-बहुजन की मौत थाने से लौटने के बाद हो जाती थी।

तो यह तो बिल्कुल साफ है कि अल्ताफ की तथाकथित हत्या के पीछे धर्म है। यदि अल्ताफ की जगह कोई पांडेय, ठाकुर या त्यागी होता तो निश्चित तौर पर कासगंज की पुलिस कानून सम्मत कार्रवाई करती। अच्छा अब आप ही बताइए कि यदि कोई धर्म किसी व्यक्ति अथवा व्यक्ति समूह को इस तरह से पशु बना दे तो उसे क्या कहा जाएगा? क्या ऐसे धर्म को आतंक फैलानेवाला धर्म नहीं कहा जाना चाहिए और ऐसा आचरण करनेवाले को आतंकी?

मैं पूर्व केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद की नई किताब द सेफ्रॉन स्काई के बारे में सोच रहा हूं, जिसमें उन्होंने हिंदुत्व की तुलना ‘बोको हरम’ और इस्लामिक कट्टरपंथ से की है। उनके इस लिखित विश्लेषण को लेकर हिंदुत्व के आतंकी भड़क गए हैं। इनमें भाजपा की शरण में हाल ही में गए जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री व पूर्व केंद्रीय मंत्री गुलाम नबी आजाद भी हैं। उन्होंने भी कहा है कि खुर्शीद ने अतिश्योक्ति कर दी है।

बहरहाल, मैं कंगना राणावत के बयान को सोच रहा हूं, जिसमें उसने कहा है कि भारत को असली आजादी 2014 में मिली। उसने ऐसा बयान अपनी धार्मिक कट्टरता के कारण दिया है और यही उसका विवेक है। मैं तो यह मानता हूं कि इस देश के 85 फीसदी दलित-बहुजनों को आजादी नहीं मिली है। मेरी स्पष्ट मान्यता है कि जबतक इस देश में मुकम्मिल तौर पर भूमि सुधार लागू नहीं होता है तबतक इस देश के 85 फीसदी दलित-बहुजन गुलाम ही रहेंगे। यदि वे जमीन के मालिक होंगे तब उनके धर्म का स्वरूप ही दूसरा होगा और उसपर किसी ब्राह्मण का नियंत्रण नहीं होगा जो आज भी राम के द्वारा शंबूक की बर्बर हत्या का पक्षधर है।

नवल किशोर कुमार फारवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

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