सियासत और समाज  ( डायरी 6 अक्टूबर, 2021)  

नवल किशोर कुमार

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सियासत यानी राजनीति की कोई एक परिभाषा नहीं हो सकती है। साथ ही यह कि सत्ता पाने का मतलब केवल प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री बनना नहीं होता है।असल में यह एक बड़ा समुच्चय है जिसमें वे सारे तत्व शामिल हैं जो संसाधनों पर अनुचित तरीके से अधिकार बनाए रखना चाहते हैं तथा इसके लिए वे जो गतिविधियां करते हैं, वही राजनीति है। जबकि वंचित तबकों के लिए राजनीति का मतलब है अपने संसाधनों को लूटने से बचाने की जद्दोजहद। चूंकि अब देश में संविधान है और यह तबका भी समझने लगा है कि वह शासक बनकर अपने संसाधनों को तो बचा ही सकता है, साथ ही वे संसाधन, जिनके उपर उच्च जातियों द्वारा अनुचित तरीके से हासिल किए गए वर्चस्व को खत्म कर सकता है। इसके लिए वंचित तबका जो गतिविधियां करता है, वह मेरे हिसाब से वंचितों की राजनीति है। हालांकि कई मौकों पर उच्च जातियों की राजनीति और वंचित तबकों की राजनीति में अंतर इतनी महीन होती है कि अंतर करना मुश्किल हो जाता है।

मेरे जन्म के करीब सात साल पहले बिहार में एक नरसंहार हुआ था। यह बिहार का पहला नरसंहार नहीं था। इसके पहले नरसंहार की कई घटनाएं पूर्व में घटित हो चुकी थीं। पहली घटना जिसकी याद मुझे है वह रूपसपुर चंदवा की है जो 22 नवंबर, 1971 को हुई थी। इस नरसंहार के एक आरोपी बिहार कांग्रेस के बड़े नेता थे जो  बिहार विधानसभा के अध्यक्ष भी बनाए गए। इस नरसंहार में 14 आदिवासियों को घेरकर जिंदा जला दिया गया था। इस घटना को अंजाम देने वाले उच्च जाति के लोग नहीं थे। इसे अंजाम दिया था बिहार के कुर्मी जाति के लोगों ने। इसी घटना के बाद बीपी मंडल का कांग्रेस से मोहभंग हुआ और उन्होंने सोशलिस्ट पार्टी की सदस्यता ली।

सियासत में जड़ता नहीं होती है। जब कभी कोई भौतिक गतिविधि होती है तो सियासत का रंग और रूप दोनों बदलता है। मैं यह बात किसान आंदोलन के संदर्भ में कह रहा हूं। लखीमपुर खीरी में किसानों को कार से रौंदने का मामला अब भाजपा के गले में अटक गया है। अब वह बैकफुट पर है। हालांकि कल ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लखनऊ में कार्यक्रम कर यह दिखाने की कोशिश की है कि लखीमपुर में चार तो क्या चालीस किसान भी मार दिए जाते तो उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता था। उन्हें आरएसएस के हिंदुत्व के एजेंडे पर विश्वास है।

खैर मेरी जेहन में बेलछी नरसंहार है। पटना के बेलछी में 11 मई 1977 को 11 लोगों को जिंदा जला दिया गया था। इनमें 8 दलित अैर 3 सोनार जाति के थे। आक्रमणकारी कुर्मी जाति के रहे और उस समय कांग्रेस विपक्ष में थी। आपातकाल के बाद वह केंद्र में भी विपक्ष में थी। दस्तावेज बताते हैं कि घटना के दो दिनों के बाद इंदिरा गांधी मृतकों के परिजनों से मिलने पटना पहुंचीं थीं। वहां तत्कालीन जनता पार्टी सरकार ने उन्हें रोकने की पूरी कोशिश की। लेकिन रूकीं नहीं। वहां से आगे बढ़ीं तब एक जगह उनकी कार कीचड़ में फंस गयी। फिर वहां से वह पैदल ही चल पड़ीं। फिर रास्ते में मोहाने नदी थी। उसे पार करने के लिए इंदिरा गांधी ने एक हाथी का सहारा लिया। हाथी की पीठ पर हौदा नहीं था। इंदिरा गांधी साहस के साथ हाथी पर सवार हुईं। उनके आगे महावत और उनके पीछे प्रतिभा देवी सिंह पाटिल। सोनिया गांधी के उपर जेवियर मोरो द्वारा लिखी गयी किताब दी रेड साड़ी में इस घटना का वर्णन है। इसके मुताबिक प्रतिभा देवी सिंह पाटिल तब बहुत डर गयी थीं, जब मोहाने नदी को पार करते समय पानी उनकी कमर तक पहुंच गया। उन्होंने इंदिरा गांधी को कसके पकड़ लिया था।

खैर, इंदिरा गांधी का मृतकों के परिजनों से मिलने की घटना का व्यापक असर हुआ। लोगों ने कहना शुरू कर दिया कि उन्होंने कांग्रेस को वोट न देकर गलती की। फिर तो नारा ही लोकप्रिय हो गया– आधी रोटी खाएंगे, इंदिरा को जिताएंगे।

मेरी नजर में कांग्रेस जो कर रही है, वह लाश पर की जा रही राजनीति नहीं है। दरअसल, राजनीति की ही ऐसे जाती है। जब कहीं कोई जुल्म हो तो, पीड़ित के पक्ष में खड़ा होना लाश पर राजनीति करना नहीं है। यह राजनीति के लिए सबसे महत्वपूर्ण है।

मैं इस घटना को इस वजह से याद कर रहा हूं क्योंकि मैं यह मानता हूं कि सियासत में जड़ता नहीं होती है। जब कभी कोई भौतिक गतिविधि होती है तो सियासत का रंग और रूप दोनों बदलता है। मैं यह बात किसान आंदोलन के संदर्भ में कह रहा हूं। लखीमपुर खीरी में किसानों को कार से रौंदने का मामला अब भाजपा के गले में अटक गया है। अब वह बैकफुट पर है। हालांकि कल ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लखनऊ में कार्यक्रम कर यह दिखाने की कोशिश की है कि लखीमपुर में चार तो क्या चालीस किसान भी मार दिए जाते तो उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता था। उन्हें आरएसएस के हिंदुत्व के एजेंडे पर विश्वास है। वे यह मानते हैं कि इस देश में लोग भले ही पुलिस की गोलियों से मार दिए जाएं, आरएसएस के लोगों द्वरा मॉबलिंचिंग की अनेकानेक घटनाएं हो जाएं, देश  रामभक्त बना रहेगा।

जाहिर तौर पर उन्हें यह साहस हिंदुओं के धर्मग्रंथों से ही मिलता है, जिसने राम को आज भी पूजनीय बना रखा है। पेरियार ने अपनी किताब ‘सच्ची रामायण’ में राम का चित्रण ऐसे पात्र के रूप में किया है जो न केवल आततायी था बल्कि नैतिक रूप से पतित था।

बहरहाल, लखीमपुर खीरी की घटना के संदर्भ में बात करते हैं। कल देर शाम एक प्रगतिशील सोच रखनेवाले वरिष्ठ पत्रकार मित्र ने व्हाट्सएप पर संदेश भेजा। उनका कहना था कि भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत और उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार के बीच अदृश्य समझौता है। उनके मुताबिक जहां एक ओर आदित्यनाथ सरकार विपक्ष के सभी नेताओं को लखीमपुर खीरी जाने से लोगों को रोक रही है, वहीं वह राकेश टिकैत को न केवल जाने देती है, बल्कि उनकी मांगें भी मान लेती है। यहां तक कि मारे गए लोगों के शवों के दुबारा अंत्यपरीक्षण की मांग भी। केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय कुमार मिश्र और उनके बेटे के खिलाफ मामला भी दर्ज कर लिया गया है। तो मेरे वरिष्ठ पत्रकार मित्र ने इस आधार पर राकेश टिकैत को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की। उनकी इस टिप्पणी को समझने से पहले यह जान लेना जरूरी है कि वे उच्च जातियों में भी सर्वोच्च जाति से संबंध रखते हैं।

आरएसएस के लोगों द्वरा मॉबलिंचिंग की अनेकानेक घटनाएं हो जाएं, देश रामभक्त बना रहेगा।जाहिर तौर पर उन्हें यह साहस हिंदुओं के धर्मग्रंथों से ही मिलता है, जिसने राम को आज भी पूजनीय बना रखा है। पेरियार ने अपनी किताब ‘सच्ची रामायण’ में राम का चित्रण ऐसे पात्र के रूप में किया है जो न केवल आततायी था बल्कि नैतिक रूप से पतित था।

दरअसल, कांग्रेस की प्रियंका गांधी ने इस पूरे मामले में जिस तरह का साहसपूर्ण प्रदर्शन किया है, वह सियासत के लिहाज से अलहदा है। हालांकि पहले मुझे यह लगा था कि इस मामले में सोनिया गांधी स्वयं पहल करेंगीं। ठीक वैसे ही जैसे बेलछी कांड के समय उनकी सास इंदिरा गांधी ने की थी। लेकिन उन्होंने अपनी बेटी को यह करने दिया। योगी आदित्यनाथ की सरकार ने फिलहाल उन्हें सीतापुर के अतिथिगृह में कैद कर रखा है। लेकिन भाजपा के लोग यह जानते हैं कि इस घटना का राजनीतिक असर होगा।

खैर, कुछ लोग अखिलेश यादव के उपर भी सवाल उठा रहे हैं। उन्हें भी यूपी पुलिस ने घर में नजरबंद कर दिया है। मायावती को नजरबंद नहीं किया गया है। लेकिन मुझे लगता है कि उन्होंने इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं की है। वैसे अखिलेश यादव और मायावती दोनों के मामले में इतना जरूर कहा जा सकता है कि ये दोनों सियासत के माहिर खिलाड़ी नहीं हैं।

मेरी नजर में कांग्रेस जो कर रही है, वह लाश पर की जा रही राजनीति नहीं है। दरअसल, राजनीति की ही ऐसे जाती है। जब कहीं कोई जुल्म हो तो, पीड़ित के पक्ष में खड़ा होना लाश पर राजनीति करना नहीं है। यह राजनीति के लिए सबसे महत्वपूर्ण है। मुझे तो बिहार के खगड़िया के अलौली में 1 अक्टूबर, 2007 को हुआ नरसंहार याद आ रहा है। इस नरसंहार में कुल 17 लोग मारे गए थे। मारे जाने वाले कुर्मी जाति के लोग थे और उन्हें मारने का आरोप मुसहर जाति के लोगों पर लगाया गया था। उस समय चूंकि कुर्मी जाति से संबंध रखनेवाले नीतीश कुमार का राज था (और आज  भी है) तो पहले मुझे यह लगा था कि वे किसी भी आरोपी को नहीं बख्शेंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। नीतीश कुमार ने दूर की राजनीति की। उन्होंने मामले में उतनी सक्रियता नहीं दिखायी जितना कि एक मुख्यमंत्री को दिखानी चाहिए थी। उन्हें इसका लाभ यह मिला कि दलित उनके प्रति कृतज्ञ रहे। कुर्मी जाति के लोगों के लिए अपने 17 लोगों के मारे जाने का कोई गम नहीं था। उन्हें तो बिहार में अपनी जाति का राज चाहिए था। हां, यदि बिहार में लालू यादव की सरकार होती तो जरूर वह जंगलराज कहा जाता।

खैर, सियासत और समाज के बीच प्रत्यक्ष संबंध है। यह संबंध केवल उत्सवों वाला संबंध नहीं है। इसमें हिंसा भी शामिल है। अभी तो भाजपा के बुरे दिन शुरू हुए हैं। महंगाई, भ्रष्टाचार और अडाणी के आगे उसका दंडवत होना सामने आने लगा है। अभी आनेवाले समय में बहुत कुछ बदलेगा। मैं तो यह मानता हूं कि आरएसएस कोई अमृत पीकर 2014 में सत्ता में नहीं आया है।

 

नवल किशोर कुमार फारवर्ड प्रेस में संपादक हैं ।

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