खेती, किसानी और हमारा रोमांस (डायरी,10 दिसंबर 2021)

नवल कुमार किशोर

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कई सारी बातें ऐसी होती हैं, जिनके कारण हर दिन खास ही होता है। धूप-छांव जैसी जिंदगी ऐसे ही चलती रहती है और हम घटनाओं के गवाह बनते हैं। बीता एक साल लेकिन बेहद खास था। वजह यह कि यह पहला आंदोलन था, जिसने अपने लक्ष्य को हासिल किया। मैं बात कर रहा हूं किसान आंदोलन के बारे में। 26 नवंबर, 2020 को शुरू हुआ यह आंदोलन एक साल 13 दिनों तक चला। हालांकि इसके खत्म होने की अनौपचारिक घोषणा तो 19 नवंबर, 2021 को तभी हो गयी थी जब देश के सबसे जिद्दी और बददिमाग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने माफी मांगी और तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की बात कही। हालांकि संयुक्त किसान मोर्चा ने छह सूत्री मांगों को लेकर सरकार पर दबाव बनाया और सरकार ने अंतत: उनकी मांगों को मान लिया और अब किसानों ने अपना आंदोलन स्थगित कर दिया है।

इस प्रकार एक ऐसे आंदोलन का खात्मा हुआ, जिसने दुनिया भर का ध्यान अपनी ओर खींचा। इसकी बड़ी उपलब्धियों में से एक जो मेरे हिसाब से रही, वह यह कि इस आंदोलन ने कृषि को बाजार के चंगुल से बचा लिया। यदि तीनों कृषि कानून लागू हाे जाते तो यह निश्चित था कि पूरा देश पूंजीपतियों का उपनिवेश बन जाता। पूंजीपति जैसा चाहते, वैसे ही इस देश को खाने के लिए खाद्यान्न देते। सरकार का नियंत्रण भी उनके ऊपर नहीं रहता। यह बड़ी राहत है कि पूंजीवादी तंत्र किसानों के आंदोलन के आगे नतमस्तक हुआ। यदि यह आंदोलन असफल हो जाता तो निश्चित तौर पर आनेवाले पचास साल तक कोई भी आंदोलन नहीं होता। कहने का मतलब यह कि कोई हिम्मत ही नहीं करता। वैसे भी आंदोलन करने के लिए हिम्मत की आवश्यकता होती है और संसाधनों की भी।

सचमुच कमाल का था किसान आंदोलन। हालांकि इस दौरान कुछेक ऐसी घटनाएं भी अवश्य घटित हुईं, जिनके कारण आंदोलन को लेकर सवाल उठे। कुछ सवाल तो सरकारी तंत्र की तरफ से उठाया जा रहा था तो कुछ सवालों को किसान खुद उठने दे रहे थे। लेकिन कुल मिलाकर एक ऐतिहासिक आंदोलन का अंत सकारात्मक हुआ।

 

इन दोनों मामलों में किसानों ने एक उदाहरण पेश किया। हिम्मत यह कि उन्होंने सरकार के हर तरह के दमन का सामना किया। मौसम का कहर भी किसानों ने खूब झेला। मैं तो गवाह रहा हूं जब ठंड के दिनों में गाजीपुर बार्डर पर खुले आसमान के नीचे किसान लकड़ी जलाकर रात काटा करते थे। किसानों ने अपने लिए पूरा इंतजाम किया। रजाई-तोसक से लेकर अपने लिए पानी गर्म करने के लिए देशी मशीन तक। वहीं गर्मी के दिनों में किसानों ने लू के थपेड़ों को सहा। बरसात के दिनों में जब तेज हवाएं उनके टेंटों को तबाह कर देते तब किसान दुगने उत्साह से अपने टेंटों को लगाते।

सचमुच कमाल का था किसान आंदोलन। हालांकि इस दौरान कुछेक ऐसी घटनाएं भी अवश्य घटित हुईं, जिनके कारण आंदोलन को लेकर सवाल उठे। कुछ सवाल तो सरकारी तंत्र की तरफ से उठाया जा रहा था तो कुछ सवालों को किसान खुद उठने दे रहे थे। लेकिन कुल मिलाकर एक ऐतिहासिक आंदोलन का अंत सकारात्मक हुआ।

कल की ही बात है। इन दिनों मैं अपने घर में शादी-विवाह के कार्यक्रमों को लेकर पटना में हूं। मेरी जीवनसंगिनी ने आंदोलन के संदर्भ में कुछ सवाल पूछे। एक सवाल तो यह कि क्या वाकई यह आंदोलन सफल रहा और कृषि पर बाजार का संकट खत्म हो गया?

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मेरी जीवनसंगिनी का सवाल एक वाजिब सवाल था। दरअसल, उसके मुताबिक जो फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्रीज देश में है, वह किसानों का दोहन तो करेगा ही। इसके लिए पहले से सरकार ने कानून बना रखे हैं। फिर एमएसपी का मामला व्यवहारिक से अधिक सरकारी है। उसका तर्क यह था कि सरकार जो न्यूनतम समर्थन मूल्य का निर्धारण करती है, वह नाकाफी होता है। मतलब यह कि उसमें किसानों के श्रम का मूल्य शामिल नहीं होता है। मैंने पूछा कि ऐसा कैसे?

उसने कहा कि सरकार यदि सारी जमीनें अपने नियंत्रण में रख ले और जमीन समान तरीके से लोगों में वितरित कर दे तथा उन्हें खाद-बीज व अन्य आवश्यक चीजों के लिए पैसे दे और साथ ही न्यूनतम मजदूरी भी दे तो यह मुमकिन है। सारी जमीनें सरकार की और उपज भी सरकार की हो। इसमें ख्याल यह रखा जाय कि जमीनें केवल उन्हें मिले जो खेती करना चाहते हैं। यदि कोई व्यवसाय करना चाहता है, नौकरी करना चाहता है, मंदिरों में घंटी बजाना चाहता है, तो उसके पास खेत ना रहे। ऐसा करने से सामाजिक व्यवस्था भी बदल जाएगी। जाति का फर्क मिट जाएगा। ऊंच-नीच का भेद मिट जाएगा।

 

उसका जवाब था कि यह बिल्कुल वैसे ही जैसे हम महिलाओं के श्रम का कोई मूल्य नहीं होता है। मान लीजिए कि जब हम अपने घर का बजट बनाते हैं तो केवल सामग्रियों को जोड़ते हैं। हम महिलाओं की मजदूरी इसमें कहां शामिल होती है? जबकि हम महिलाएं तो श्रम करती हैं। फिर चाहे घर साफ करना हो, बर्तन साफ करने हों, खाना बनाना हो। तो हमारी मजदूरी कहां गई? ऐसे ही न्यूनतम समर्थन मूल्य के निर्धारण में खाद-बीज, सिंचाई, खेत जुताई, निराई, कटाई आदि को शामिल किया जाता है, लेकिन एक किसान जब खेती करता है तो वह अकेला नहीं होता है। छोटे किसानों का तो पूरा परिवार ही खेती में लगा रहता है। अब एक घर में यदि चार जन भी खेती कर रहे हैं तो चार लोगों की दैनिक मजदूरी भी शामिल होनी चाहिए।

जीवनसंगिनी ने सवाल के साथ जवाब भी दिये और कई सवालों को खड़ा भी कर दिया। हालांकि स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट में इसका उद्धरण है, परंतु मुझे भी लगता है कि उसके तर्क में दम है। परंतु इसका उपाय क्या है?

जवाब मेरी पत्नी ने ही दिया। उसने कहा कि सरकार यदि सारी जमीनें अपने नियंत्रण में रख ले और जमीन समान तरीके से लोगों में वितरित कर दे तथा उन्हें खाद-बीज व अन्य आवश्यक चीजों के लिए पैसे दे और साथ ही न्यूनतम मजदूरी भी दे तो यह मुमकिन है। सारी जमीनें सरकार की और उपज भी सरकार की हो। इसमें ख्याल यह रखा जाय कि जमीनें केवल उन्हें मिले जो खेती करना चाहते हैं। यदि कोई व्यवसाय करना चाहता है, नौकरी करना चाहता है, मंदिरों में घंटी बजाना चाहता है, तो उसके पास खेत ना रहे। ऐसा करने से सामाजिक व्यवस्था भी बदल जाएगी। जाति का फर्क मिट जाएगा। ऊंच-नीच का भेद मिट जाएगा।

मैंने कहा कि सचमुच यदि ऐसा हो गया तो इससे खूबसूरत बात क्या होगी। मैंने उसे बताया कि यह मनरेगा योजना के तहत किया जा सकता है। हालांकि इसके पहले भूमि सुधार कानूनों को संपूर्णता में पूरी ईमानदारी के साथ लागू करना होगा और फिलहाल शासकों से ईमानदारी की अपेक्षा नहीं की जा सकती है।

वैसे शादी के सालगिरह के दिन इतनी अच्छी बातचीत हो तो मुझ जैसे प्रेमी को और किसी तरह के तोहफे की जरूरत ही नहीं।

शुक्रिया मेरी जीवनसंगिनी।

नवल किशोर कुमार फॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

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