Sunday, July 14, 2024
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किसके लिए हैं हिंदी के ‘अखबार’? (डायरी 28 फरवरी, 2022)

ब्राह्मण धर्म के जैसे ही लेखन धर्म भी विशुद्ध रूप से धंधा है। धंधा का मतलब व्यापार है। कुछ लोगों के लिए यह रोजगार...

एक हथियार के रूप में भाषा : डायरी (12 फरवरी, 2022) : 

भाषा बड़ी कमाल की चीज है। इसका आविष्कार इसीलिए ही किया गया होगा ताकि इंसान अपनी बात कह सके और दुनिया भर की तमाम...

और अब प्रधानमंत्री की करोड़टकिया ‘कार’ (डायरी 30 दिसंबर, 2021) 

खबरों से जुड़ी दुनिया ही अलग होती है। इसको ऐसे समझिए कि एक पत्रकार खबरों के बीच ही जीता है। खबरें भी एक जैसी...

शहीद शब्द का खेल (डायरी 9 नवंबर 2021)

शब्द महत्वपूर्ण होते हैं। कई बार सामान तरह की घटनाओं के लिए अलग-अलग शब्द होते हैं। उदाहरण के लिए एक घटना है। मैं इसे...

बिहार का अंधा हुक्मरान, बेजुबान अखबार (डायरी 4 नवंबर, 2021) 

बचपन में यह नाटक पढ़ा था– अंधेर नगरी, चौपट राजा। यह कमाल का नाटक है। कमाल इसलिए कि यह हर समय प्रासंगिक है। आज...

 प्रेस विज्ञप्तियों के सहारे भी दिखाया जा सकता है कि राजा नंगा है (डायरी 31 अक्टूबर, 2021) 

आज पटना प्रवास का दूसरा दिन है। मन में कई सारे विचार हैं। परंतु सबसे महत्वपूर्ण है– प्रेस विज्ञप्ति। दरअसल, पत्रकारिता में प्रेस विज्ञप्तियों...

आरक्षण मजाक का विषय नहीं है जज महोदय (डायरी 22 अक्टूबर, 2021)

समाज को देखने-समझने के दो नजरिए हो सकते हैं। फिर चाहे वह दाता और याचक के नजरिए से देखें या फिर श्रमजीवी और परजीवी...

आधुनिक भारत में ब्राह्मणों और राजपूतों के बीच ऐसे हो रही लड़ाई  (डायरी 14 अक्टूबर, 2021)  

भारत के शासकों ने देश के अखबारों के जैसे अपनी परिभाषा बदल ली है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे इस देश के पुलिस...

सत्ता और जनसत्ता (डायरी, 13 अक्टूबर 2021)

जीवन को लेकर मेरी एक मान्यता है। यह मान्यता विज्ञान पर आधारित है। मेरी मान्यता है कि ब्रह्मांड में कुछ भी स्वतंत्र  नहीं है।...

साजिश की थ्योरी (डायरी 11 अक्टूबर 2021)

सियासत में और सियासत को समझने में आवश्यक अध्ययन में एक थ्योरी होती है। इसे मैं षडयंत्र की थ्योरी मानता हूं। इसमें होता यह...

सुप्रीम कोर्ट का प्रेशर कुकर बन जाना ( डायरी 7 अक्टूबर, 2021)

मुझे याद नहीं है कि प्रेशर कुकर मैंने पहली बार कब देखा। मेरे घर में कुकर जैसा कोई बर्तन नहीं था। मेरा गांव बिहार...

दास्तां कलमकसाइयों की (डायरी,3 अक्टूबर, 2021)  

कोई भी समाज कितना सभ्य और विकसित है, इसके कई पैमाने हैं। इनमें से एक पैमाना यह कि सबसे कमजोर तबके के लोगों के...

क्रूरता : सब जग देखा एक समाना डायरी (11 सितंबर, 2021)

बरसों बाद एक परेशानी फिर से परेशान कर रही है। मैं इसे बीमारी नहीं कहता। हालांकि मेरे चिकित्सक इसे एक बीमारी की संज्ञा देते...

शब्द और परिस्थितियों में अंतर्संबंध डायरी (10 सितम्बर,2021)

जीवन में संयोग जैसा कुछ होता है, इसमें यकीन नहीं है। अलबत्ता कुछ खास कारणों से कुछ खास परिस्थितियां जरूर बन जाती हैं और...

बातें, जो कहनी जरूरी हैं, क्योंकि हम ज़िंदा हैं, (डायरी : 9 सितंबर, 2021)

देश में शिक्षा के प्रसार का असर को साफ-साफ देखा जा सकता है। लोग पढ़ने लगे हैं और अब वे बातें करते हैं। ज्ञान...

शब्द, सत्ता, सरोकार और राजेंद्र यादव डायरी (30 अगस्त, 2021)

शब्द और सत्ता के बीच प्रत्यक्ष संबंध होता है। यह मेरी अवधारणा है। शब्द होते भी दो तरह के हैं। एक वे शब्द जो...

‘पाक्सो’ का ‘पास्को’ बन जाना डायरी (25 अगस्त, 2021)

भाषा की परिभाषा क्या है अथवा क्या होनी चाहिए!? यह सवाल लंबे समय से जेहन में है। हालांकि भाषा की अनेक परिभाषाएं देखने और...

जातिगत जनगणना का सवाल और बदलते संदर्भ  डायरी (24 अगस्त, 2021)

मनुष्यों के बीच तुलना के लिए अनेकानेक क्राइटेरिया हैं और इनके आधार पर ही कुछ खास गुणों की पहचान होती है। मतलब यह कि...

‘शाश्वत सत्य’ और राज्य डायरी (9 अगस्त, 2021)

भारतीय सामाजिक व्यवस्था का केंद्रीय चरित्र पूंजीवादी है और यह कोई नयी बात नहीं है। चार वर्णों की व्यवस्था इसलिए ही बनायी गयी है।...

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