बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे

देवेंद्र आर्य

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लोहिया और बाद में जे.पी. के समय जो ग़लती समाजवादियों से हुई उसके प्रायश्चित का समय नजदीक आता जा रहा है। पर क्या यह होगा भी? कभी लोहिया द्वारा शुरू कांग्रेस विरोध और जयप्रकाश नारायण का समग्र क्रांति के झंडे तले कांग्रेस की तानाशाही का विरोध आज भाजपा के द्वारा कांग्रेस-मुक्त भारत के विचार-अभियान तक पहुंच चुका है। पात्र बदल गए हैं पर परिकल्पना नहीं बदली है और न ही प्रयोग। हां इस बीच यह परिवर्तन ज़रूर परिलक्षित हो रहा है कि तानाशाही का स्वरूप अब पुरानी किताब जैसा नहीं रह गया है। यह संविधान का उल्लंघन करने वाली बेपर्दा तानाशाही नहीं, संवैधानिक तानाशाही है। बहुत लोकतांत्रिक लगने लगी है यह तानाशाही जिसके लिए मर मिटने को तैयार एक पूरी जमात पूरी तैयारी के साथ सक्रिय है। आधी रोटी खाएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे के नारे में समयोचित बदलाव कर दिया गया है। अब 2021 का नारा है -आधी रोटी खाएंगे, मोदी को ही जिताएंगे। ध्यान दीजिए, भाजपा को जिताने की नहीं, मोदी को जिताने की बात हो रही है, भले ही भाजपा का भी यही सपना है। पहले इंदिरा को ले आएंगे का नारा लगता था, अब मोदी को ले आने का नारा लग रहा है। योगी तो मोदी की ही छवि हैं, मोदी को लाने में अंतर्निहित। कांग्रेस को वापस लाने का नारा नहीं लगा था, इंदिरा को लाने का नारा लगा था। आज भाजपा को लाने का नारा नहीं है, मोदी को लाने का नारा है। पहले इंदिरा इज इंडिया था अब मोदी इज इंडिया हो गया है। व्यक्ति माने पार्टी। व्यक्ति ही सरकार। तानाशाही और क्या होती है सरकार?

आधी रोटी खाएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे के नारे में समयोचित बदलाव कर दिया गया है। अब 2021 का नारा है -आधी रोटी खाएंगे, मोदी को ही जिताएंगे। ध्यान दीजिए, भाजपा को जिताने की नहीं, मोदी को जिताने की बात हो रही है, भले ही भाजपा का भी यही सपना है। पहले इंदिरा को ले आएंगे का नारा लगता था, अब मोदी को ले आने का नारा लग रहा है। योगी तो मोदी की ही छवि हैं, मोदी को लाने में अंतर्निहित।

इस अभियान में दलित और बहुजन कहां खड़े हैं, यह भी पहेली नहीं रह गया है संविधान का पहरुआ दलित, सरकार का पहरुआ बहुजन। यही इस संवैधानिक तानाशाही का नया समीकरण है। एक और समीकरण देख सकते हैं। गांजे की पुड़िया पर सरकार सजग है, 21000 करोड़ के 30000 कीलो नारकोटिक्स पर सोई है। सरकार कौन चला रहा है, यह छुपाया भी नहीं जा रहा है अब। सरकार किसके लिए काम कर रही है, किसान के लिए कि कॉर्पोरेट के लिए, यह भी नहीं छिपाया जा रहा है ।

इस सब के बीच अच्छी बात यह है कि राहुल लाओ देश बचाओ की जगह कांग्रेस लाओ देश बचाओ की रणनीति बनाई जा रही है। ठीक वैसे ही जैसे अखिलेश लाओ से बचते हुए सपा लाओ, यूपी बचाओ की बात की जा रही है। बहिन जी ज़ाहिर है, अब भी वहीं हैं, जहां बसपा का मतलब मायावती होता है और मायावती माने सियासती माया। जहां माया वहां मायावती।
तो क्या अन्य पात्रों की भूमिकाएं नहीं बदल रही हैं ? बेशक कुछ इधर कुछ उधर, स्थिर कोई नहीं है ।
उन्हीं पात्रों को अब इस लोकतान्त्रिक तानाशाही में अपनी भूमिकाएं तय करनी हैं। पात्रों की भूमिकाएं बदलें तो, यह ज़रूरी है, पर पहले यह तो तय हो कि निर्देशन किसका होगा? जो सर्वाधिक श्रेष्ठ दिख रहे है वे भी सुसुप्तावस्था से बाहर अभी नहीं आ पाए हैं। खर्राटे, जीवित होने की निशानी भले हों, जागृत होने की निशानी कदापि नहीं होते ।
यह कौन सी नींद है ?
कब टूटेगी ?
सब कुछ गवां के होश में आने का मतलब क्या होगा ?
हमें फिर कोई लोहिया चाहिए जिसमें कांग्रेस ग्रंथि न हो। फिर कोई जेपी जिसमें दुश्मन को हराने के लिए बदतर दुश्मन से दोस्ती की हड़बड़ी न हो। सम्पूर्ण क्रांति के बारे में याद कीजिए मार्क्सवादियों की राय। उनको और अम्बेडकर को छोड़ जो होगा वह संविद सरकार या जनता पार्टी ही होगा। और जनता पार्टी का दूरगामी अर्थ भारतीय जनता पार्टी है, यह अब बताने की बात नहीं रही । हम माया से ममता की ओर बढें कि मोदी की ओर, यह अभी तय करना अभी, वरना……
अंधेरा घना है पर हम बिना हाथ-पैर मारे रह भी नहीं सकते।
जो समाज की समीक्षा नहीं कर सकते वे साहित्य की समीक्षा क्या करेंगे, क्यों भाई लाल साहब, पाल साहब, शर्मा जी, वर्मा जी। अभी आपातकाल लागू नहीं है भाई। तकनीक बदल चुकी है, आगे बढ़ चुकी है। उसी तरह लागू नहीं होगी जैसी पहले लागू हुई थी। अब देश आजाद मगर नजरबंद होगा। जैसे कश्मीर में है। जिन्न आक़ा के इशारे पर ही बाहर आते हैं और आक़ा के इशारे पर ही बोतल बंद होते हैं। बोतल में बंद जिन्न का मतपेटिका से गहरा रिश्ता है पार्टनर! यूं ही नहीं वहां मनोज सिन्हा और यहां योगी अपनी छवि पर धब्बा लगते देख कर भी चुप हैं।

देवेन्द्र आर्य जाने-माने ग़ज़लकार और कवि हैं ।

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