ज़मीन की लूट और मुआवजे के खेल में लगे सेठ-साहूकार और अधिकारी-कर्मचारी

अपर्णा

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कहते हैं चतुर आदमी चालीस साल आगे का सोचकर निर्णय लेता है। और जिसके मुंह में मुनाफे का शहद लगा हो उससे ज्यादा चतुर कोई हो नहीं सकता। ऐसे चतुर लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है। जहां भी कोई नई परियोजना शुरू होती है वहाँ इनकी निगाह सबसे पहले जाती है और परियोजना का काम शुरू होने से पहले ही वे मुआवज़े और मुनाफे में अपनी हिस्सेदारी तय कर चुके होते हैं। इस बार सामुदायिक वन अधिकार पर रिपोर्टिंग के लिए जब मैं तमनार गई तो कई गाँव के खेतों में बने शेड, बाउंड्री और तालाब देख कर जिज्ञासा हुई कि अचानक ये चीजें इतनी बड़ी संख्या में कैसे बन गईं? यह सब एक दो गाँवों तक सीमित नहीं था बल्कि दूर-दूर तक फैले अनेक गाँवों में था। मैंने सामाजिक कार्यकर्ता सविता रथ से पूछा तो उन्होंने बताया कि इन जगहों को तमनार कोल ब्लॉक के रूप में चिन्हित किया गया है और ये निर्माण मुआवज़ा पाने के लिए किए गए हैं। मेरी जिज्ञासा बढ़ गई और मैंने उनमें से कई गाँवों का जायजा लिया।

यह जितना मेरे आश्चर्य का विषय था उससे कहीं ज्यादा इसमें रहस्य है। हर रहस्य के कई-कई सिरे भी हैं। लालच और अवसरवाद के अनेक आयाम यहाँ देखने को मिल जाएंगे। यह कहानी के चरित्र कोई एक या दो लोग नहीं हैं बल्कि पूरी की पूरी भ्रष्ट और शातिर व्यवस्था इसमें शामिल है और ज़मीन की लूट और मुआवजे का जो ताना-बाना बुना गया है वह बहुत गझिन है।

सामाजिक कार्यकर्ता शिवपाल भगत कहते हैं ‘यहाँ दर्जनों पॉल्ट्री फार्म बने हैं लेकिन आप वहाँ जाएंगी तो एक भी मुर्गी का बच्चा तक नहीं मिलेगा। यह केवल दिखावे के लिए बनाया गया है। इसका मतलब है कि मिलने वाला मुआवज़ा कई गुना होगा। इसमें बड़े-बड़े लोग इन्वाल्व हैं। चाहे अफ़सर हों या व्यापारी अथवा कोई और हो। सबकी साँठ-गाँठ और मिलीभगत है।’

मुआवजे के लालच में बनाया गया आधा-अधूरा पोल्ट्री फार्म

क्या है पूरा मामला और कौन लोग हैं इनके मालिकान

रायगढ़ जिले में स्थित तमनार अपनी कोयले की प्रचुरता के लिए जाना जाता है। तमनार विकासखण्ड में लगभग छोटे-बड़े 73 प्लांट लगे हुए हैं, जिसमें तमनार का जिंदल पावर प्लांट सबसे बड़ा है और पूंजीपथरा के आसपास बाकी प्लांट स्थापित हैं। तमनार विकासखण्ड में सरकारी और निजी कुल 8 कोयला खदानें हैं। तमनार के अंतर्गत सेक्टर 1 से 8 तक आठ कोयला खदानें हैं, जिनमें गारे पेलमा की 4/6, प्रस्तावित खदान के अंतर्गत आती है। 5 जनवरी 2008 को जिंदल कंपनी की जनसुनवाई के समय निहत्थे ग्रामीणों पर पुलिस-प्रशासन ने लाठी चार्ज कर उन्हें बुरी तरह पीटा था, जिसमें सैकड़ों ग्रामीण बुरी तरह घायल हो गए जिन्हें अस्पताल में भर्ती करना पड़ा था। यही कारण है 4/6 का आबंटन आज तक किसी को नही किया जा सका। घरघोड़ा विकास खंड के अंतर्गत जामपाली और बरौद की कोयला खदानें हैं। कोयला का पर्याप्त भंडार होने के कारण रायगढ़ जिला के इस क्षेत्र में अनेक स्पंज आयरन और पावर प्लांट काम कर रहे हैं। जिस कारण यहाँ के ग्रामीणों की जमीनों को या तो इस उद्योग ने लील लिया है या फिर वे अधिग्रहित होने वाली हैं।

कलेक्टर द्वारा, अनिविभागीय अधिकार(राजस्व) को नामांतरण, डायवर्सन और निर्माण कार्य को रोकने के लिए लिखा गया पत्र

तमनार के ग्राम मुड़ागाँव से सरइटोला जाते हुए रास्ते भर खाली जगह पर कई बड़ी इमारतें, खाली पड़े टीन के शेड, तालाब, पॉल्ट्री फॉर्म और अधूरे पड़े सैकड़ों कन्स्ट्रक्शन दिखाई पड़े। राजेश गुप्ता, जिन्होंने मुझे अपनी बाइक से तमनार से मुड़ागाँव और सरईटोला ले जाने का जिम्मा लिया था, से उत्सुकतावश मैंने पूछा कि ये सब क्या बने हैं? क्यों बने हैं और किसने बनवाया है? अचरज इस बात का है कि उस जगह पर मुझे कोई भी व्यक्ति रहते हुए या काम करते हुए नहीं दिखा। उन्होंने ने बताया कि ‘यह सब मुआवजा पाने का खेल है।’ मुझे कुछ समझ नहीं आया। समझाते हुए बताया कि ‘इस तरह का निर्माण केवल यहीं नहीं हुआ है बल्कि तमनार विकासखण्ड के चौदह गाँव में हजारों की संख्या में हुआ है।’

बाइक रोक कर होकर उन्होंने दूर-दूर तक इशारे से उन जगहों को दिखाया।  मैंने भी देखा कि दूर-दूर तक शेड दिखाई पड़ रहे थे लेकिन उनकी फोटो लेना असंभव था क्योंकि बारिश की वजह से कैमरा निकालकर खींच नहीं सकती थी और मोबाइल की अपनी क्षमता होती है। बहरहाल मैंने पास दिखने वाले सभी निर्माण किये हुए भवन, शेड,तालाब की फोटो ले ली। अमृत ने बताया कि ‘यह सब भले ही मुआवजा पाने के लिए बनाया गया है लेकिन इसे बनवाने वाला जमीन का स्वामी नहीं है, बल्कि बाहर के पैसे वाले अधिकारी, सेठ, पूंजीपति, यहाँ तक प्रशासन के अनेक अधिकारी तहसीलदार, एसडीएम और राजनेता और राज्य से बाहर के लोग हैं।’

मुआवजे का गणित

महाजेनको यानी महाराष्ट्र स्टेट पावर जनरेशन कंपनी लीमिटेड को 2015 से तमनार स्थित गारे पेलमा के सेक्टर -2 की कोयला खदान आबंटित हुई है जिसमें कंपनी द्वारा 2077.616 हेक्टेयर जमीन अधिग्रहित की जा रही है। इस परियोजना से सीधे-सीधे  14 गाँव प्रभावित हो रहे हैं। इसके तहत गाँव लिबरा, गारे, सरईटोला, भालूमूडा, झींकाबहाल, रोडोपाली, सरसमाल, कुंजेमुरा, डोलेसरा, चितवाही, मुड़ागाँव, ढोलनारा, पाता, टिहली रामपुर आदि चौदह गाँव आते हैं। इन गांवों का सर्वे कर उन्हें मुआवजा दिया जाएगा। मुआवजे का रेट देखकर जमीन के दलाल सक्रिय हो गए। खाली जमीन का मुआवजा जमीन पर बने हुए घर से कम मिलेगा अर्थात यदि किसी जमीन पर घर बना हुआ है तो उसका मुआवजा चार गुना तय हुआ है। दरअसल जमीन पर कोई निर्माण होता है तो जमीन के साथ उस निर्माण का भी मुआवजा मिलता है। यही एक कारण था कि गाँव के सम्पन्न लोगों ने डायवर्सन करवाकर तुरंत ही बड़े-बढ़े भवन, शेड और खेतों में तालाब आदि खुदवा लिए। ज़मीनों को टुकड़ों में बांटा गया। यहाँ तक कि खेतों के बीच में भी पक्का निर्माण करवा दिया गया और यह निर्माण इतने घटिया स्तर का है कि एक घर के गिर जाने से उस घर के मालिक की मृत्यु तक हो चुकी है।

अलग-अलग जगह किये गए निर्माण कार्य

एक दिन में लखपति बन जाने का लालच गरीबों से ज्यादा मिडिल क्लास को होता है।  गाँव के आदिवासी, जिनके पास अपनी जमीनें तो थीं लेकिन आर्थिक अक्षमता के चलते वे उस पर निर्माण काम नहीं कर सकते थे तो ऐसे लोगों से दलालों के मार्फत बाहरी लोगों ने बेनामी जमीन खरीद कर उस पर बिल्डिंग, शेड और पॉल्ट्री फॉर्म बनवा लिए थे। सब कुछ इस शर्त पर हुआ कि मुआवजा मिलने पर जमीन की कीमत के साथ दस प्रतिशत जोड़कर जमीन के मालिक को दे देंगे। जमीन के खरीद-बिक्री से निर्माण तक इस घपले में राज्य के बड़े-बड़े लोगों के साथ, शासन के अधिकारी, राजस्व विभाग के अधिकारी, पटवारी, आरआई और राज्य से बाहर के लोग तक शामिल हैं। कहा तो यह भी जा रहा है कि इस मुआवजा घपले में महाजेनको के कई अधिकारी-कर्मचारी तक लिप्त हैं।

जिला प्रशासन ने रोक लगाई

इस बात की जानकारी होते  ही महाजेनको ने प्रशासन को इसकी सूचना दी। उस समय रायगढ़ में भीम सिंह कलेक्टर थे, जिन्होंने तत्कालीन एसडीएम एके मार्बल को पत्र भेजते हुए ( पत्र क्रमांक 2106/) 26 फरवरी 2021 से तत्काल डायवर्सन और ज़मीनों की खरीद-बिक्री पर रोक लगाने का आदेश दिया। लेकिन इस पर कोई अमल नही किया गया।

सात जनवरी 2022 को एसडीएम एके मार्बल ने एक आदेश निकाला कि ‘20 अक्टूबर 2021 को ड्रोन कैमरे से इस हेतु विडियोग्राफी की गई कि इसके बाद अधिग्रहित भूमि में किसी भी प्रकार के नए निर्माण पर कलेक्टर द्वारा रोक लगा दी गई है।’

26 फरवरी 2021 से तत्काल डायवर्सन और ज़मीनों की खरीद-बिक्री पर रोक लगाने का आदेश पत्र

लेकिन सच्चाई कुछ और भी है। खसरा नंबर की पूरी ज़मीनें बेचने की अनुमति लेकर इसकी रजिस्ट्री टुकड़ों में यानी कहीं 10 डिसमिल तो किसी के द्वारा 20 डिसिमिल की कराई गई है। बिना पटवारियों और राजस्व अधिकारियों की सहमति और सहयोग के इसका नामांतरण और डायवर्सन संभव नहीं है। जमीनों पर अवैध निर्माण हुये और इस प्रकार करोड़ों का काला धन यहाँ लगाया गया।

तमनार की अधिग्रहित होने वाली जमीनों का मूल्य सरकारी दर से निर्धारित किया गया है। उदाहरण के लिए टिकरा जमीन की कीमत 6 लाख रुपये प्रति एकड़ है। एक फ़सली जमीन की दर 8 लाख रुपये प्रति एकड़ और दो फ़सली जमीन का रेट 10 लाख रुपये प्रति एकड़ है। अगर ज़मीन पर कोई निर्माण हुआ है तो एक एकड़ जमीन का मुआवजा चार गुना मिलेगा। इन्हीं जमीनों को लोगों ने दस टुकड़ों में डायवर्सन करवा कर रजिस्ट्री कराई है ताकि दस डिसिमिल होने से मुआवजे की गणना वर्गफुट में की जाए।

खेत में किया गया निर्माण कार्य

उन्नीस सितंबर को 2022 को उप जिला अधिकारी द्वारा घरघोड़ा कार्यालय में मीटिंग आयोजित की गई। इस बैठक उद्देश्य जो प्रभावित गांववासियों के पुनर्वास और पुनर्व्यवस्थापन की दिशा में उठाए जा रहे कदमों और अन्य विकल्पों के बारे में विचार-विमर्श करना था। बैठक में प्रशासन और गाँववासियों के सुझाव और सहमति पर बातचीत होनी थी। इसमें कुल 40 सरपंच उपस्थित हुए। बातचीत की शुरुआत ही उनकी नाराजगी से हुई जब उन्होंने परियोजना को अवैध ढंग से और ज़बरदस्ती लागू किए जाने की बात करते हुये भूमि अधिग्रहण का विरोध किया। उन्होंने अधिकारियों से पूछा कि क्या हमारा गाँव पेसा कानून के अधीन आता है? अगर वह आता है तो यहाँ पेसा कानून के विरोध में काम हुआ है। सरपंचों ने कहा कि बिना ग्राम सभा की सहमति के खनन गैरकानूनी और गाँवों की ज़मीन पर डकैती है। उन सभी ने कहा कि कोयला खनन के लिए हम अपनी जमीनें नहीं देंगे।

पेसा कानून के मायने 

छत्तीसगढ़ के अनेक जिलों में भूमि अधिग्रहण को लेकर जनसंघर्ष चले हैं क्योंकि कंपनियाँ और सरकारी अधिकारी जमीन लेने के लिए जिस तरह से जनसुनवाई के माध्यम से लोगों की सहमति ले लेते थे वह बहुत डरावना अनुभव रहा है। उस समय किसी तरह की कोई बैठक नहीं होती थी बल्कि एक कमरे के अंदर बैठे अधिकारियों के सामने छोटी सी खिड़की के दूसरे पार खड़ा किसान अकेला होता था। एक तो प्रशासनिक अधिकारियों का भय और दूसरी किसी तरफ किसी कानूनी जानकारी का अभाव उसे बहुत निरीह बना देते थे। ऐसे में उससे जिस भी चीज के लिए सहमति मांगी जाती थी वह उसे दे देता था। अनेक सामाजिक कार्यकर्ता कहते हैं कि इस तथाकथित जनसुनवाई में किसानों को दबाव में लेने के लिए धमकी भी दी जाती थी। लेकिन हाल ही में छत्तीसगढ़ में पेसा कानून लागू हुआ है जिसके कारण आदिवासी किसान अपनी बात कह रहे हैं।

राजेश त्रिपाठी,सामाजिक कार्यकर्ता,जनचेतना,रायगढ़

जनचेतना के राजेश त्रिपाठी लगातार तमनार क्षेत्र में आदिवासियों के साथ उनके जल,जंगल जमीन के लिए उद्योगपतियों के खिलाफ आवाज उठाते रहे हैं। उन्होंने बताया कि ‘केंद्र ने तो पेसा एक्ट (Pnachayt Extension to Scheduled Areas Act) लागू कर दिया और प्रत्येक राज्य को उस पेसा एक्ट में अपने राज्य के हिसाब से कानून बनाना था, छत्तीसगढ़ में 8 अगस्त 2022 में बना और 9 अगस्त 2022 से लागू हुआ है। लेकिन छतीसगढ़ में यह राज्य बनने के बीस साल बाद ही बन पाया। इससे ग्रामसभा और मजबूत हो गई है। इससे एक फायदा यह हुआ कि पेसा ऐक्ट के तहत अब जो ग्रामसभाएं होंगी और उनमें जो निर्णय होगा, वह अंतिम निर्णय होगा। अभी तक ऐसा नहीं था इसीलिए लोगों का ग्रामसभाओं से विश्वास उठ रहा था। पाँचवीं अनुसूची में जो आदिवासी बहुल क्षेत्र हैं वहाँ पेसा एक्ट एक महत्वपूर्ण कानून है।  इससे कोयला खनन के लिए आने वाली कंपनियों को सरकार से पहले ग्रामसभा की अनुमति लेनी जरूरी होगी और आदिवासी समुदाय अपने जल, जंगल, जमीन को बचाने के लिए मजबूती से सामने आएंगे।’

जनचेतना की ही सविता रथ का कहना है कि ‘बड़े-बड़े प्लांट आते हैं, लोगों की जमीनें अधिग्रहित की जाती हैं, उन्हें विस्थापित किया जाता है, पुनर्वास की बात की जाती है, मुआवजा तय किया जाता है, परिवार के एक सदस्य को नौकरी देने की बात की जाती है लेकिन जितना वादा किया जाता है, उसमें से आधा वादा भी पूरा हो जाए तो बहुत है।अधिग्रहण के बाद विस्थापित व्यक्ति अपनी जड़ से कट जाता है और आजीविका के लिए भटकता रहता है। यह कैसा विकास है कि एक सड़क पर या जाए और दूसरा महल बनाए। अब जबकि पेसा कानून लागू हो गया है तो ज़मीन का मालिक भी अपनी बात को मजबूती से उठाएगा।’

सविता रथ,सामाजिक कार्यकर्ता,जनचेतना

वह कहती हैं ‘प्राकृतिक संसाधनों पर आदिवासियों का अधिकार बनता है जो इसके वारिस रहे हैं। सरकार नियामक हो सकती है, लेकिन नियंता नहीं। महाजेनको को कोयला खनन का ठेका मिला है और इसके बाद जमीन को लेकर जो खेल शुरू हुआ है, उसमें सबसे ज्यादा नुकसान गाँव के उस आदिवासी का है, जो अपनी जमीन से बेदखल होने के मुहाने पर खड़ा है और अधिकारी, पटवारी, सेठ-साहूकार और अन्य लोग अपने फायदे को भुनाने के लिए उसे भी जमीन और मुआवजे से वंचित करने का खेल कर रहे हैं। लेकिन पेसा ऐक्ट या जाने से ग्रामसभा को एक मजबूती मिली है।’

अपनी ज़मीन न देने पर अड़े गाँववासी

विद्यामति राठिया सरईटोला में रहती हैं और किसान हैं। दो एकड़ जमीन में खेती कर आजीविका चलाती हैं। छतीसगढ़ी में कहते हुए उन्होंने कहा – ‘हम लोग अपनी जमीन नहीं देंगे।’ कारण बताते हुये विद्यामति छत्तीसगढ़ी में कहती हैं ‘ए हर हमर पुरखा के जमीन है। अउ हमर बाल-बच्चा मन ला जमीन ले के बाद यदि नोकरी दे दिही, तो एकीच बार त नोकरी दिही, ओकरे बाद कंपनी वाला मन, हमर नाती-पोता ल डबल नोकरी थोड़ी दिही।जमीन रहे ला हमर आघु के पीढ़ी मन खेती किसानी कर सकहीं। जमीन ल अब दुबारा थोड़ी खरीद सकबो। एकरे बर हमन कंपनी ला जमीन नई देबो। आज ही हमर खेत में कंपनी के कुछु मइसन मन आए रीहीन और खेत के मेड ल तोड़ना शुरू कर दे रीहीन, में हर लड़े और ओला कहें त कहीस कि काबर तोडत हस त ओ हर कहिस तालाब बनाए बर तोड़त हों लेकिन ओला डांट लड़ के हमन भगा दें।’

विद्यामति,ग्रामवासी,सरईटोला

डोंगा महुआ प्लांट में ठेकेदारी के तहत काम करनेवाले एक सामाजिक कार्यकर्ता ने बताया कि उनके गाँव मुड़ागाँव में जब सर्वे करने के लिए सरकारी आधिकारी आए तो उन्हें बाहर से ही वापस जाने को मजबूर कर दिया। ग्रामसभा की शक्ति के बारे समझते हुए, सभी ग्रामीणों ने ग्राम सभा में प्रस्ताव पारित कर खदान के लिए एक टुकड़ा जमीन नहीं देने का निश्चय किया है। विरोध के लिए सभी ग्रामीणों को संगठित होना जरूरी है। हम नहीं चाहते कि अपने पूर्वजों की जमीनों और अपनी जड़ से अलग होकर कहीं और जाएँ।

शिवपाल भगत, सामाजिक कार्यकर्ता, सरसमाल

इस बारे में ग्राम पंचायत सरसमाल निवासी सामजिक कार्यकर्त्ता शिवपाल भगत ने बताया कि सबसे ज्यादा अवैध निर्माण मुड़ागाँव, कुंजेमुरा और सरईटोला में हुआ है। बहुत ही  गलत तरीके से आधिक मुआवजा पाने के लालच में। वह भी बाहरी व्यक्तियों द्वारा। सरसमाल में किसी तरह से कोई अवैध निर्माण नहीं हुआ है। दो बार ग्राम सभा हुई है जिसमे दोनों बार गाँव वालों ने आपत्ति दर्ज की है कि किसी भी तरह हम अपनी ज़मीन नहीं देंगे, क्योंकि सभी खेती-किसानी करने वाले लोग हैं। उनकी आजीविका है यहाँ। 19 तारीख को  एसडीएम ऑफिस में सभी सरपंचों के साथ एक बैठक बुलाई गई थी जिसमें  कम्पनी के मैनेजमेंट और डिविजिनल ऑफिसर के द्वारा दबाव बनाया जा रहा था कि इस बार कम्पनी अच्छी पालिसी लाई है। आप लोगों को मान लेना चाहिए। लेकिन सभी लोगों ने एक स्वर में ग्रामसभा में हुए निर्णय को लेकर अपनी बात कही।’

पुनर्वास और पुनर्व्यवस्था हेतु विचार विमर्श हेतु अनुविभागीय अधिकारी,घरघोड़ा द्वारा गाँव के सरपंच व् सचिव को बैठक की सूचना का पत्र

आगे क्या होगा यह साफ नहीं है 

स्थिति जटिल हो गई है। गाँववाले ज़मीन न देने पर कटिबद्ध हैं। दूसरी ओर महाजेनको पाँच साल से खनन का अधिकार लिए पड़ा है। स्वयं उसने कई ऐसी जटिलताएँ खड़ी की है जो तमनार के किसानों के पक्ष में बिलकुल नहीं है। इनमें से एक तो यही कि किसानों को किसी भी विवाद के निपटारे के लिए कंपनी के मुख्यालय के न्यायक्षेत्र में जाना पड़ेगा। महाजेनको का मुख्यालय मुंबई है।

हो चुके निर्माण कार्यों के बदले दिये जानेवाले मुआवजे से कंपनी को 500 करोड़ रुपए की चपत लगेगी। ग्रामीणों को इसका जीरे भर हिस्सा ही मिलेगा जबकि फ़र्जी मालिकों, जिनमें सरकारी अधिकारी-कर्मचारी, सेठ-साहूकार और स्वयं महाजेनको और अदानी की कंपनी के अधिकारी-कर्मचारी शामिल हैं, को पूरा का पूरा ऊँट मिलेगा।

दिगेश पटेल,एसडीएम्, घरघोड़ा (छग)

इस संबंध में क्या हो रहा है? इस बारे में घरघोड़ा के एसडीएम दिगेश पटेल से फोन पर बातचीत होने पर उन्होंने बताया कि ‘निर्माण कार्य पर पूरी तरह से रोक लगा दिया गया है। जिन्होंने गलत तरीके से नामांतरण और डायवर्सन करवाया है, उनकी स्पेसिफिक शिकायत आने पर जांच की जाएगी। डायवर्टेड जमीन का पैसा उन्हीं को दिया जायेगा जिन्होंने  नियम के तहत निर्माण कराये हैं।’

बड़े-बड़े लोगों और अधिकारियों की संलिप्तता पर उन्होंने कहा कि ‘अभी तक किसी के नाम से शिकायत नहीं आई है। जांच का काम चल रहा है। किसी का नाम सामने आने पर उनपर कार्यवाही की जाएगी।’

अपर्णा रंगकर्मी और गाँव के लोग की कार्यकारी संपादक हैं।

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