नरेंद्र मोदी सरकार की सीनाजोरी और मुंहचोरी (डायरी 30 नवंबर, 2021)

नवल किशोर कुमार

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संसद में बहस जरूरी है। बहस का महत्व इसलिए है क्योंकि बहस में निर्वाचित सदस्य जो कि जनप्रतिनिधि होते हैं और वे सदन के संज्ञान में लायी गयी नीतियों के संदर्भ व देश हित में उठाए गए सवालों पर विचार करते हैं। बहस के दौरान पक्ष और विपक्ष दोनों एक-दूसरे के सामने होते हैं। दोनों एक-दूसरे की आलोचना भी करते हैं। लेकिन किसी भी नीति के निर्माण में यह सबसे महत्वपूर्ण कदम है और यही सोचकर संसद की अवधारणा संविधान में रखी गई है। लेकिन यदि बहस न हो तो क्या हो? वजह यह कि संसद में किसी भी विधेयक को पारित कराने के लिए तकनीकी रूप से संख्याबल का होना महत्वपूर्ण रह गया है। उदाहरण के रूप में मौजूदा सरकार को देखा जा सकता है। एक साल तीन महीने पहले इसी सरकार ने संसद में तीन कृषि विधेयकों को संख्या बल के आधार पर पारित करवाया था। और इसी सरकार ने कल संसद में तीनों कृषि कानूनों को निरस्त करने के लिए कृषि विधि निरसन विधेयक प्रस्तुत किया।

दोनों बार बहुत सारी बातें कॉमन रहीं। पहली बात तो यह कि तीनों कृषि  विधेयकों व अब कृषि विधि निरसन विधेयक प्रस्तुत करनेवाले नरेंद्र सिंह तोमर ही रहे। हालांकि दोनों बार उनके चेहरे पर भाव अलग-अलग थे। वे जब कृषि विधेयकों को प्रस्तुत कर रहे थे, तब उनके चेहरे पर जीत का भाव था। वे जानते थे कि उनके पास बहुमत है और सदन के शीर्ष पर बैठा व्यक्ति भी उनके पक्ष का है, तो बहस से बचने के पर्याप्त उपाय थे। यही हुआ भी था। राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश ने सारी मर्यादाओं को तोड़ते हुए बिना बहस के ही तीनों कृषि विधेयकों को पारित घोषित कर दिया था।

किसान जिस एमएसपी गारंटी के कानून की बात कर रहे हैं, उसे लेकर देश का कारपोरेट जगत सदमे में है। दरअसल, यदि यह कानून बन गया तब किसानों को हर हाल में न्यूनतम समर्थन मूल्य प्राप्त होगा। ऐसे में वे खुले बाजार में न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम मूल्य में किसानों की उपज नहीं खरीद सकेंगे।

कल भी ऐसा ही दृश्य सामने आया। लोकसभा और राज्यसभा दोनों ही सदनों में बिना बहस के सरकार ने कृषि विधि निरसन विधेयक को पारित कर दिया। हालांकि मुझे पहले से अनुमान था कि मौजूदा सरकार अपनी असफलता (या फिर मूर्खतापूर्ण फैसले) पर बहस नहीं कराएगी। फिर भी मुझे लगा था कि मेरा अनुमान गलत साबित होगा और हम भारत के लोग किसानों से संबंधित अन्य सवालों पर सरकार के विचारों से रू-ब-रू होंगे।

परंतु, सरकार ने बहस की सारी गुंजाइश खत्म कर दी। हद तो यह कि कल ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद परिसर में मीडिया कर्मियों को वन-वे बातचीत में कहा कि सरकार हर सवाल का जवाब देने को तैयार है। उन्होंने बहस नहीं कराए जाने का ठीकरा विपक्ष के उन सदस्यों पर फोड़ा, जो सरकार से जवाब की मांग कर रहे थे। दिलचस्प यह कि राज्यसभा में विपक्ष के 12 सदस्यों को शीतकालीन सत्र की शेष अवधि के लिए निलंबित कर दिया गया। यह आदेश एक बार फिर हरिवंश ने दिया।

बहरहाल, कुल मिलाकर सरकार ने एक बार फिर संसद को बौना साबित किया है। किसान अब भी अपने छह मांगों को लेकर आंदोलनरत हैं। अब देखना है कि उनकी  मांगों को लेकर सरकार क्या रूख अपनाती है। एक वजह यह कि किसान जिस एमएसपी गारंटी के कानून की बात कर रहे हैं, उसे लेकर देश का कारपोरेट जगत सदमे में है। दरअसल, यदि यह कानून बन गया तब किसानों को हर हाल में न्यूनतम समर्थन मूल्य प्राप्त होगा। ऐसे में वे खुले बाजार में न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम मूल्य में किसानों की उपज नहीं खरीद सकेंगे। लेकिन ऐसे में एक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या सरकार इसमें एक शर्त और जोड़ेगी कि सरकार हाल में किसानों से उनकी उपज खरीदेगी? यदि ऐसा नहीं होता है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी होने के बावजूद किसानों को अपेक्षित लाभ नहीं मिल सकेगा। वजह यह कि जब खरीद ही नहीं होगी तब किसानों को मूल्य कहां से मिलेगा?

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मैं तो बिहार की बात कर रहा हूं, जहां वर्ष 2006 में ही सरकारी कृषि मंडियां खत्म कर दी गयी थी। अब वहां किसानों को अपनी उपज पैक्सों को बेचना पड़ता है। पैक्स दरअसल स्थानीय सहकारी समितियां हैं, जिसके सदस्य वे किसान होते हैं, जिनके पास बड़ी जोत होती है। बिहार में बड़ी जोत केवल ऊंची जाति के लोगों के पास है, जो कि किसानी नहीं करते। खेती-किसानी केवल वे ही करते हैं, जो छोटे व सीमांत किसान होते हैं या फिर भूमिहीन खेतिहर मजदूर हैं। पैक्स अब राजनीतिक संगठन भी बनते जा रहे हैं। इनकी स्वायत्तता खतरे में है। यही वजह है कि सभी किसानों की उपज पैक्सों द्वारा नहीं खरीदी जाती है। उपर से पैक्सों ने विभिन्न फसलों के लिए अलग-अलग मानदंड बना रखे हैं, जिनके आधार पर ही फसलों की खरीद की जाती है। मसलन धान में नमी की मात्रा के आधार पर खरीद। ऐसे ही गेहूं के लिए भी मानदंड है। ऐसे में उन किसानों को कोई लाभ नहीं प्राप्त होता है, जिनकी फसल किसी कारणवश उन मानदंडों को पूरा नहीं करती हैं।

तो होता यह है कि बिहार में अभी भी 55 फीसदी किसानों की उपज की सरकारी खरीद नहीं होती है और उन्हें बिचौलियों का शिकार होना पड़ता है।

कुल मिलाकर एक आवश्यक बहस की सरकार ने एक बार फिर हत्या कर दी है और यह उसने प्रचंड बहुमत के नशे में ही किया है। यह संसदीय लोकतंत्र का एक अवगुण भी है।

नवल किशोर कुमार फॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

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