सरकार जनता से डरी हुई है इसलिए आंदोलनों को बेरहमी से कुचल देना चाहती है

सामाजिक चिंतक और कार्यकर्ता एडवोकेट प्रेमप्रकाश सिंह यादव से पूजा की बातचीत

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बनारस में जातिगत जनगणना और किसान आन्दोलन जैसे विभिन्न मुद्दों को लेकर जाने-माने अधिवक्ता और सामाजिक चिंतक प्रेम प्रकाश सिंह यादव बहुत दिनों से सक्रिय हैं और पूर्वांचल भर में लगातार बैठकें कर रहे हैं। उनसे गाँव के लोग डॉट कॉम की विशेष प्रतिनिधि पूजा ने इस विषय में विस्तृत बातचीत की। प्रस्तुत है बातचीत का प्रमुख अंश

हाल ही में जो लखीमपुर में घटना हुई है उस पर किसान अपना प्रतिरोध जता रहें हैं, और मीडिया घटना को अलग-अलग तरीके से दिखा रही है तो आप इस पूरे प्रकरण को किस तरह से देखते हैं?

मीडिया से बातचीत करतेे प्रेमप्रकाश सिंह यादव

वर्तमान में मेन स्ट्रीम की मीडिया सरकार के संरक्षण में काम कर रही है, सरकार की चाटुकारिता कर रही है। जो छोटे-छोटे लोग अपना चैनल चला रहे हैं वो जन पक्षधर मीडियाकर्मी के रूप में काम कर रहे हैं लेकिन वे मेन स्ट्रीम की मीडिया से अलग हैं। लखीमपुर का जो प्रकरण है उसने यह बता दिया कि अब देश में लोकतंत्र नाम की कोई चीज नहीं रह गयी है। देश संविधान  के हिसाब से नहीं मनुस्मृति के हिसाब से चल रहा है। इस प्रकरण में कई चीजे स्पष्ट हुई हैं। लोगों के दिमाग में जो भ्रम था दूर हो गया है। देश का जो बहुजन चिंतक है उसके माथे पर लकीरें हैं कि कैसे संविधान को बचाया जाये। लखीमपुर खीरी की घटना में चार किसानों सहित 8 लोगों की मौत हो गयी। उस घटना की बात करें तो उस दिन प्रदेश मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में किसान कृषि कानून के प्रतिरोध को लेकर इकट्ठा हुए थे। जब किसानों को यह लगा कि ये लोग हमारी बात नहीं मानेंगे। देर हो रही थी तो वे लोग कार्यक्रम से लौट रहे थे, तभी पीछे से गृह राज्यमंत्री का बेटा आशीष मिश्रा तीन गाड़ियों का काफिला लेकर हथियार से लैस होकर आया और फायरिंग करते हुए एक व्यक्ति को मौत के घाट उतार दिया। अन्य लोगों को रौंदतें हुए मौत के मुहाने पर ढकेल दिया। 8 लोग मर गए जिसमें चार किसान और चार अन्य लोग थे। कितना आपराधिक है कि मेन स्ट्रीम की मीडिया की खबर की हेडिंग में किसानों को गुंडे की तरह दिखाया गया है। तो इस तरह से इस बात का आंकलन हो रहा है कि किस तरह से मीडिया सरकार के पाले में है और वह अब केवल सरकार की चाटुकारिता करती है। इससे पहले हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर, जो आरएसएस से जुड़े हुए हैं, ने एक कार्यक्रम के दौरान कहा कि ‘अब अपने लोगों को किसान सभा जैसा बना करके हर गांव में, हर क्षेत्र में 200-500 लोगों को तैयार करना पड़ेगा और जो किसान आंदोलन में शामिल लोग हैं वो लठ से ठीक होंगे और इनकों हम अपने भाषा में समझाएंगे। हमारे लोगों को खिलाफत के लिए तैयार करना चाहिए। उनको लठ से समझाना और मारना चाहिए।’ उसके बाद गृह राज्यमंत्री अजय मिश्रा टेनी का भड़काऊ भाषण आता है और उस भाषण में उन्होंने ललकारा है कि हम केवल मंत्री, विधायक और सांसद नहीं हैं। हम उससे अलग भी हैं।  हम दो मिनट में ठीक कर देंगे। इन दो भड़काऊ बयानों के ठीक बाद एक घटना होती और जिसका एफआईआर भी देर से दर्ज होता है। और फिर पूरे देश में जब इसके लिए आंदोलन हुआ तो सरकार ने सोशल मीडिया के तीन प्लेटफार्म फेसबुक, व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम तीनों को बंद करा दिया। इससे पता चलता है कि सरकार जनता से कितनी बुरी तरह डरी हुई है और उसके आंदोलनों को किस बेरहमी से कुचल देना चाहती है।

आज सरकार मनुवाद, आरएसएस, मोहन भागवत, अडानी और अंबानी के हाथ की कठपुतली बन कर रह गयी है। इसे लोकतंत्र को खत्म करने में जरा भी देर नहीं लगेगी। आपने देखा होगा धीरे- धीरे देश में मनुस्मति लागू करने की कोशिश जारी है। आपने देखा होगा कि किस तरह से सवर्ण आरक्षण इन्होंने एक झटके पास कर लिया। सारे किसान जिनको जरूरत ही नही इस कनून की वो कह रहें हैं कि हमें ये कानून नहीं चाहिए।

लेकिन समाचार यह था कि ये सारी चीजे कंपनी में समस्या होने के कारण थोड़ी देर के लिए बंद कर रही है?

इत्तेफाक है कि जब ऐसी घटना होती है  इनके खिलाफ जनता में आक्रोश होता तभी ऐसा होता है। अब जब उनकी मिली-जुली सरकार है तो वे यह थोड़ी ना कहेंगे कि हम इसलिए बंद कर रहें हैं ताकि यह आक्रोश पूरे वैश्विक स्तर पर न फैल जाए। तो इनका सर्वर उसी समय काम करना बंद करता है जब वहां चार किसानों सहित आठ किसानों कि हत्या हो जाती है। और किसान मरे नहीं हैं, किसान कानूनों की वापसी और एमएसपी को लिए शहीद हुए हैं। जिस तरीके से इन्होंने किसानों को रौंदा इससे पहले टिकरी बार्डर पर इन्होंने नाकाम कोशिश की लेकिन यह पहली बार जिसमें कामयाब हुए और या फिर दोषियों को सजा नहीं मिल रही है। क्योंकि गृह राज्यमंत्री इस्तीफा नहीं दे रहे हैं और सरकार दिखावा के लिए उनके खिलाफ कोई कर्रवाई नहीं कर रही है, तो आप इस बात का आंकलन करिए की देश किस दौर में जा रहा है। जो लखीमपुर खीरी में हुआ ये कोई पहली घटना नहीं है आजके दौर में पुलिस प्रशासन के माध्यम से आमलोगों का कत्लेआम हो रहा है। और वो भी जाति देख करके कत्लेआम हो रहा है। वहीं, कुछ समय पहले गोरखपुर में घटना हुई जिसमें मनीष गुप्ता को पीट-पीट कर मार दिया गया। और पुलिस सब इंस्पेक्टर, जिसने मारा थाना प्रभारी उसके संरक्षण में वहां के थाना प्रभारी पीड़िता मृतक की पत्नी और परिवार वालों को धमका रहे हैं समझा रहे हैं कि आप मुकदमा ना करिए उसमें बहुत देर होता है आप परेशान हो जाएंगी। इस तरह से धमकी दी गयी और फिर मैनेज करने का काम किया गया और जब मैनेज नहीं हुआ तो दो एफआईआर हुआ। गृह राज्यमंत्री अजय मिश्रा के लड़के आशीष मिश्रा और 15-20 अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर हुआ। तो इस देश में आज की डेट में लोकतंत्र नाम की कोई चीज नहीं है। सरकार के अंदर कोई जनता के वोट का डर नहीं रह गया है। क्योंकि आज के दौर में जो इवीएम है उसके माध्यम से चुनाव जीतने का कार्य हो रहा है। पहली बार ऐसा हो रहा है कि सरकार के इशारे पर हाईकोर्ट सुप्रीमकोर्ट इनके लिए कार्यकर्ता के रुप में कार्य कर रही है। आपने देखा होगा कि अभी तत्काल में तीन जजमेंट हुए तीन तलाक, राम मंदिर और 370 के मसले पर सरकार के पक्ष में तीनों फैसले देकर के सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीस महोदय जाकर के दलाली के तौर पर राज्यसभा के सदस्य बनकर दलाली स्वीकार किए। देखिए, किस तरह से ज्यूडिशियरी बिक गई है मीडिया कैसे सरकार कार्यकर्ता के रूप में कार्य कर रही है। इस समय देश में बहुत ही विकराल स्थिति है। ऐसे में संविधान और संवैधानिक संस्थाओं को संरक्षण करने के लिए जो भी चिंतित लोग हैं। उनको एक जुट होकर के काम करना होगा। जिसके लिए दिल्ली बार्डर पर 500 से ज्यादा किसान शहीद हुए और फिर  भी उनका आंदेलन जारी है। आज सरकार मनुवाद, आरएसएस, मोहन भागवत, अडानी और अंबानी के हाथ की कठपुतली बन कर रह गयी है। इसे लोकतंत्र को खत्म करने में जरा भी देर नहीं लगेगी। आपने देखा होगा धीरे- धीरे देश में मनुस्मति लागू करने की कोशिश जारी है। आपने देखा होगा कि किस तरह से सवर्ण आरक्षण इन्होंने एक झटके पास कर लिया। सारे किसान जिनको जरूरत ही नही इस कनून की वो कह रहें हैं कि हमें ये कानून नहीं चाहिए। उस पर जबरदस्ती थोपा जा रहा हैं। बुद्धिजीवी लगातार इसके लिए प्रयासरत हैं कि सरकार किसानों की मांगो को मान ले। जो तीनों कानून हैं उसमें से पहला कानून कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग का है उसके माध्यम से पूंजीपति को अगर खेती कॉन्ट्रैक्ट में देदी गई तो फिर वापसी का कोई रास्ता स्पष्ट नहीं है। दूसरा आवश्यक वस्तु अधिनियम का है और ये पूरी तरह से काला बाजारी करने का कानून है। अडानी-अंबानी के हजारों-हजारों मिट्रिक टन के गोडाउन बन रहें हैं। उनको भरने के लिए और सरकार इस कानून के माध्यम से असीमित भंडारण काला बजारी की छूट देने कार्य कर रही है। किसानों की छोटी सी मांग है कि आप इन तीनों कनूनों को निरस्त कर दीजिए। और एमएसपी की गारंटी दे दीजिए उसका कानून बना दीजिए। वो कह रहें हैं कि एमएसपी को कानून नहीं बनाएंगे और इन तीनों कानूनों को वापस नहीं लेंगे। तीनों कानूनों की वापसी के साथ एमएसपी की गारंटी के लिए आंदोलन हो रहा है। हमलोग अधिवक्ता जन वाराणसी उत्तर प्रदेश की तरफ से तमाम अधिवक्ता संगठनों की तरफ से जातिगत जनगणना संघर्ष मोर्चा की तरफ से और तमाम बहुजन चिंतकों की तरफ से इस आंदोलन को धार देने का कार्य कर रहें हैं। किसान आंदोलन को सड़क से लेकर के हमलोग कानूनी पहलू पर भी मद्द करने के लिए भी प्रतिबद्ध हैं। हमारा पूरा संगठन इस मुहिम को आगे बढ़ाएगा और तब तक बढ़ाएगा जब तक सरकार की गुलामी पूंजीपतियों गुलामी की जो जंजीर है उससे बाहर निकलकर सरकार जब तक बैकफुट पर नहीं आ जाती है। कृषि कानून को वापस नहीं ले लेती है कानूनी गारंटी नहीं दे दती है, तब तक ये आंदोलन निरंतर जारी रहेगा।

सीएए एनआरसी की बात करूं तो सरकार इस मसले पर सरकार बैकफूट पर गयी है। न सिर्फ सीएए एनआरसी के मसले पर सरकार 2018 में एसटीएससी कानून पर 13 प्वाईंट रोस्टर पर बैकफूट पर गयी। जब जन आंदोलनों की ताकत बढ़ती है तो सरकार को बैकफूट पर जाना पड़ता है। और मुझे पूरा विश्वास है कि सरकार इस मसले पर भी बैकफुट पर जाएगी और हमलोग इस लड़ाई को तब तक जारी रखेंगे जब तक सरकार बैकफुट पर नहीं जाती है।

सरकार तो कह रह कि एमएसपी नहीं हटाया जाएगा उसकी गारंटी हम दे रहे हैं। कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग फायदेमंद होती है।  अगर संतुष्ट नहीं है तो उसके लिए कानून बनेंगे। न्याय मिलेगा।  फिर भी सरकार के जबाव से किसान संतुष्ट नहीं है। ऐसा क्यों?

आपको बता दूं कि एमएसपी के नाम पर सरकार गुमराह कर रही है क्योंकि सरकार एमएसपी तो मान रही है लेकिन कानून नहीं बना रही है। सरकार एमएसपी की घोषणा करती है जैस कोई फसल  का उत्पादन हो गया तो सरकार घोषणा करती है कि इस साल का समर्थन मूल्य 1400-1500 प्रति क्विंटल धान का मूल्य रहेगा। तो ये कानून नहीं है। हांलाकि इस घोषणा के बाद भी 10% लोगों को ही इसका लाभ मिलता है और वो भी सवर्ण, पूंजीवादी और सामंती लोगों को ही इसका लाभ मिलता है। हर किसान को लाभ नहीं मिलता है जब ये कानून बन जाएगा तो सरकार जितने रुपए भी किसी भी आनाज का दाम निर्धारित करेगी। तो अगर उससे नीचे सरकार दाम लेगी तो अपराध माना जाता है। और उतना मूल्य मिलना सुनिश्चित हो जाएगा। अभी क्या है कि जो उत्पादक किसान है जो खाद पानी फसल उधार लेकर के बोया है तो उस अनाज का मूल्य यदि 2000 हो तो वो 1400 देकर के खाली हो जाता है और जो अनाज है वो पूंजीपतियों के गोडाउन में चले जाते हैं उसके बाद कालाबाजारी का खेल शुरु हो जाता है। और अगर यही कानून बन जाएगा भी उसी दाम पर खरीदना सरकार की बाध्यता हो जाएगी।

किसान आन्दोलन के एक साल होने को है अभी भी किसान धरने पर बैठे हैं और बात करें पिछले आंदोलनों की सीएए एनआरसी, कश्मीर मुद्दा आदि की तो सभी के आंदोलन हुए और सरकार अपने फैसले पर अडिग रही आन्दोलन धीरे- धीरे खत्म हो गए तो कृषि कानून को लेकर आपको क्या लगता है कि सरकार कानूनों की वापसी के लिए मान जाएगी?

ये सरकार ईवीएम मनुवाद और पूंजीवाद के गठजोड़ से चल रही है। इसलिए सरकार को जनाआन्दोलनों के विरोध का कोई खतरा नहीं है। उसको लग रहा है कि जनता अगर हमारे विपक्ष में भी अगर वोट देदेंगे तब भी आधा वोट हम ईवीएम से कवर कर लेंगे। आधा वोट हम डीएम से कवर करके जीत लेंगे। लोकतंत्र में सबसे बड़ा भय वोट का होता है। आजादी से पहले राजा रानी के पेट से पैदा होता था लेकिन लोकतंत्र स्थापित होने के बाद राजा वोट से चुना जाता है। लेकिन इस ब्राह्मणवादी सरकार को ईवीएम और पूंजीवाद के गठजोड़ से ये भरोसा हो गया है कि जब पूरा चुनाव आयोग, न्यायपालिका, कार्यपालिका, व्यवस्थापिका ये पूरा का पूरा तंत्र हमारे लिए कार्यकर्ता के तौर पर काम कर रहा है तो ये विरोध करके करेंगे क्या?  इनकी आवाजें जाएंगी कहां? एक सोशल मीडिया से ये कितना क्या करेंगे उसमें भी इनके आईटी सेल के जो इंटेलिजेंट भी वहां बैठे हुए हैं।

ये सरकार ईवीएम मनुवाद और पूंजीवाद के गठजोड़ से चल रही है। इसलिए सरकार को जनाआन्दोलनों के विरोध का कोई खतरा नहीं है। उसको लग रहा है कि जनता अगर हमारे विपक्ष में भी अगर वोट देदेंगे तब भी आधा वोट हम ईवीएम से कवर कर लेंगे। आधा वोट हम डीएम से कवर करके जीत लेंगे।

सीएए एनआरसी की बात करूं तो सरकार इस मसले पर सरकार बैकफूट पर गयी है। न सिर्फ सीएए एनआरसी के मसले पर सरकार 2018 में एसटीएससी कानून पर 13 प्वाईंट रोस्टर पर बैकफूट पर गयी। जब जन आंदोलनों की ताकत बढ़ती है तो सरकार को बैकफूट पर जाना पड़ता है। और मुझे पूरा विश्वास है कि सरकार इस मसले पर भी बैकफुट पर जाएगी और हमलोग इस लड़ाई को तब तक जारी रखेंगे जब तक सरकार बैकफुट पर नहीं जाती है। क्योंकि यह लड़ाई लोकतंत्र के सवाल को हल करेगी, संविधान बचेगा की संविधान खत्म होगा इस सवाल को हल करेगी। इस देश में जब एक तरफ शांतिपूर्ण तरीके से अपना मांगपत्र देने के लिए विरोध करने के लिए अगर कोई व्यक्ति बैठा हुआ है, फायरिंग करते हुए गोली से मार दे रहे हो, कार चढ़ा करके उनकी हत्या कर दे रहे हो। और इसके लिए ना तो गिरफ्तारी होती है और ना सरकार की तरफ से कोई खेद जताया जा रहा है। और मंत्री द्वारा ये कहा जा रहा है कि हम और हमारा बेटा थे ही नहीं जबकि वीडियो में साफ दिखाई दे रहा है। आज इसमें लिपा-पोती होकर के जांच बिठा करके ये मामला अध्याय समाप्त हो गया है। मैं ये बता दूं कि ये मामला किसानों का मसला नहीं है ये आमजन का मसला है और ये मसला संविधान और लोकतंत्र को बचाने का मसला है। तो हमलोग अपनी ताकत लगाकरके इस लड़ाई को हारने नहीं देंगे।

 विधानसभा चुनाव को लेकर आपका क्या मत है किसकी सरकार आ सकती है?

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव होने को हैं। इनके पास सारी मशीनरी है। ये हर कल-बल-छल से स्थापित होने की कोशिश करेंगे। लेकिन जनता में जो आक्रोश है, वो आक्रोश इतना ज्यादा है कि ये बुरी तरह से हारेंगे। लेकिन मेन स्ट्रीम की मीडिया जो दिखाएगी कि भाजपा टक्कर में है, फिर धीरे धीरे दिखाएंगे की बढ़त में है तो ये लोगों का माइंड मेकअप करेंगे पहले से ही उनका ब्रेनवाश शुरू होगा। चुनाव आते आते ब्रेन वाश बना रहेगा और फिर ईवीएम के माध्यम से अपना सिस्टम बनाएंगे और लोगों को लगेगा कि मीडिया वाले तो ये कह ही रहे थे। और थोड़ा बहुत शुरुआती दिखाएंगे विपक्षी पार्टियां लड़ रही हैं। पहले विपक्षी पार्टियों की सीट आगे दिखाएंगे कि  वो इवीएम के मामले में विरोध ना कर सकें। उनको लगेगा कि हम तो जीत जाएंगे लेकिन आखिरी में फिर उनका ग्राफ गिरने लगेगा तब 25-50 अन्तर करके टीवी के माध्यम से जबरदस्ती जिता देंगे। मेरे हिसाब से जिस तरह से उन्होंने जन विरोधी कार्य किये हैं, तो इनके पास इकाई का आंकड़ा भी पार करने की क्षमता नहीं हैं। और विपक्ष इसको लोकतंत्र और संविधान बचाने का सवाल समझ करके लड़ेंगे तो फिर उनकी पांचों राज्यों में इनकी जमानत जब्त होगी और ये दहाई का भी आंकड़ा पार नहीं कर पाएंगे।

इस बातचीत को रिकॉर्ड करने में ऋतंभरा कुमारी ने सहयोग किया। 

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