Friday, June 21, 2024
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गाँव के लोग

प्यासा से राॅक स्टार तक स्वतंत्र लेखकों और कलाकारों का वजूद

गुरूदत्त साहब ने अपनी फिल्म प्यासा से उठाया था वे आज भी अनुत्तरित हैं। रचनाकारों, मसिजीवियों को छले जाने के काम सरे बाजार हो रहा है।

बिहार से एक नयी कहानी : डायरी (6 फरवरी, 2022)

विहारों के प्रदेश को बिहार किसने कहा होगा? कल देर शाम से यही सोच रहा हूं। सोचने के पीछे कुछेक खबरें हैं जो कल...

सामाजिक सामंतवाद और आर्थिक सामंतवाद के बीचोंबीच (डायरी 25 जनवरी, 2022) 

समाज को कैसा होना चाहिए? यह सवाल मेरी जेहन में हमेशा बना रहता है। बहुत कम ही ऐसा होता है कि मैं किसी एक...

आदिवासी समाज में पुरुषवर्चस्व की शिनाख्त

आदिवासी समाजों की अपनी विशिष्टता और स्वायत्तता होती है लेकिन अब उस पर न केवल भूमंडलीकरण और बाज़ारवाद का असर बढ़ रहा है बल्कि...

ऐसा स्कूल जहाँ तीन पीढियां एक साथ पढ़ती, खेलती और रोज़गार के हुनर सीखती हैं .

https://www.youtube.com/watch?v=IfCUasrG8RY&t=29s एक ऐसी शख्सियत जिन्होंने एक छोटे से प्रयास से अपने आसपास के मलिन बस्ती के बच्चों को निस्वार्थ भाव से पढ़ाना शुरू किया क्योंकि...

मुल्कराज आनंद ने मुझसे पहला ही सवाल किया कि क्या तुम टॉयलेट साफ़ कर सकते हो?

  भारत के जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता और चिन्तक-लेखक विद्या भूषण रावत सही अर्थों में एक जिंदादिल व्यक्ति हैं. अकेले बूते पर उन्होंने जितना काम किया...

एक दुर्लभ अभिनेता जिसने अभिनय को बेमिसाल ऊंचाई दी

पुण्यतिथि पर विशेष  आज संजीव कुमार की 37वीं पुण्यतिथि है लेकिन शायद ‘कलाप्रेमियों’ और ‘कलाकारों’ को छोड़ किसी को उनको याद करने की शायद ही...

बदलते दौर में बेटियां और उनके सवाल ( डायरी 8 अक्टूबर, 2021) 

कोई नई बात नहीं है। ऐसा होता रहा है और मुझे लगता है कि असंख्य लोगों के सामने यह सवाल जरूर रहता होगा। खासकर...

जूते और किताबें

उसे बाजार से कुछ किताबें खरीदनी थी और अपने लिए जूते भी। वह कई दुकानों में गया। लेकिन उसे अपनी पसन्द के जूते नहीं...

सुप्रीम कोर्ट का प्रेशर कुकर बन जाना ( डायरी 7 अक्टूबर, 2021)

मुझे याद नहीं है कि प्रेशर कुकर मैंने पहली बार कब देखा। मेरे घर में कुकर जैसा कोई बर्तन नहीं था। मेरा गांव बिहार...

साहित्यिक कृतियों में कैसे-कैसे चित्रित किये गए हैं एलजीबीटीएस?

नौवें और अंतिम दशक को हिन्दी साहित्य की स्त्री रचनाओं को स्वर्ण युग कहा जाता है। इन दो दशकों में हिन्दी  के बड़े उपन्यासों...

विकलांग नागरिकों के लिए डायरी (19 सितंबर, 2021)  

सबसे अधिक कमजोर कौन है? क्या वह व्यक्ति सबसे अधिक कमजोर है जो विकलांग है? क्या वह व्यक्ति सबसे कमजोर है जो सबसे गरीब...

नायकों के लिए मानदंड डायरी (18 सितंबर, 2021)

पटना स्थित घर के बाहर बथानी का छप्पर गिर जाने और उसके नीचे मेरी मोटरसाइकिल के दब जाने की सूचना मिली। यह बथानी 1980...

उत्तर भारत में पेरियार के बदले क्यों पूजे जाते हैं विश्वकर्मा? डायरी (17 सितंबर, 2021)  

बंगाल और बिहार में अनेकानेक सांस्कृतिक समानताएं हैं। फिर चाहे वह खाने-पीने का मामला हो या तीज-त्यौहारों का। भाषा में भी बहुत अधिक अंतर...

हादसा और सरकारी तंत्र की असंवेदनशीलता डायरी (16 सितंबर, 2021)

देश में लोकतंत्र है और अब यह देश वह देश नहीं है जो अंग्रेजों के समय था। देश में एक संविधान है और यह...

मुक्तिबोध को एक ग़ज़लकार की चिट्ठी -3

अगर इस कहानी में सिर्फ़ इतना ही होता कि बम गिराकर क्लॉड ईथरली को इतना पछतावा होता है कि वो अपने को सज़ा दिलाने...

दिल्ली, तुम्हारी निगाहें बहुत बोलती हैं डायरी (14 सितंबर, 2021)

दिल्ली इन दिनों बहुत परेशान है। इसकी परेशानी का आलम यह है कि यहां के राजपथ पर हुक्मरानों की आवाजाही बढ़ गई है। हालांकि...

‘लागा चुनरी में दाग’ और ‘लागल जोबनवा में चोट ‘डायरी (13 सितंबर, 2021)

स्त्रियों के विषय में स्पष्टवादी लेखिकाओं में नीलिमा चौहान बेहद खास हैं। वह ऑफिशियली पतनशील की लेखिका भी हैं। उनके विचार और शब्दों का...

मुक्तिबोध को एक ग़ज़लकार की चिट्ठी-1

मोहतरम मुक्तिबोध जी ! कुल मिलाकर आपने जादू तो मुझपर यही कर रक्खा है कि आप कभी कोई कमज़ोर चीज़ रच ही नहीं सकते ।...

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