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Gaon Ke Log
भारत में जाति एक ऐसा कोढ़ है जिसे निरंतर खुजलाए जाने की जरूरत रहती है
यह कारतूसों के बैक-फायर का ही परिणाम है कि हम तथागत बुद्ध, कबीर, डा. अम्बेडकर, फुले, पेरियार आदि सभी को जाति की कीच में घसीटने से बाज नहीं आते। फर्जी आजीवक के पैरोकारों ने तो इस कीच को दलदल का अखाड़ा बना छोड़ा है। वे खुद तो इस दलदल में फंसे हैं और अन्य को भी इसी दलदल में फंसाकर अपनी चौहदराट स्थापित करने के पक्षधर हैं। लगता है हर साख पे उल्लू बैठा है, मगर यह तो समय ही बताएगा कि अंजाम ए गुलस्तिां क्या होगा।
घनी रात में भी उजाला करने वाली एक चिंगारी हैं गांधी – तुषार गांधी
‘गांधी : एक असंभव संभावना’ विषय पर ऑनलाइन व्याख्यान
नई दिल्ली। ‘आज के दौर में गांधी असंभव लगे यह आश्चर्य की बात नहीं है। आज...
आयुष्मान कैसे भव ?
अमेरिका स्वास्थ पर एक साल में अपने लोगों पर 3 लाख 38 हज़ार करोड़ डॉलर=2करोड़ 44 लाख 19हज़ार करोड़ रुपये खर्च करता है और...
असल सत्य यहाँ है
सोने का चम्मच लेकर पैदा लिए हुए अमीरों के अक्षम बच्चों का आर्थिक आधार पर उल्टा आरक्षण पाने से किसी भी बुद्धिजीवियों को कोई...
दलित भी विविधताओं से भरे समाज, राष्ट्र और ग्लोबल विलेज का नागरिक है
ईश कुमार गंगानिया पिछले बीस वर्षों से अम्बेडकरवादी साहित्य सृजन में लगे हैं। गंगानिया अम्बेडकरवादी पत्रिका अपेक्षा के उप सम्पादक रहे और बाद में उन्होंने...
मूर्तियों से किसका भला होगा
मूर्तियां लोगों को मूर्ख बनाकर उनके अधिकारों को छीनने का तरीका है जबकि सरकार में उनकी जनसंख्या के हिसाब से उनका प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने...
सुप्रीम कोर्ट का प्रेशर कुकर बन जाना ( डायरी 7 अक्टूबर, 2021)
मुझे याद नहीं है कि प्रेशर कुकर मैंने पहली बार कब देखा। मेरे घर में कुकर जैसा कोई बर्तन नहीं था। मेरा गांव बिहार...
पुलिसिया दमन सत्ता के इशारे के बिना मुमकिन नहीं..
दूसरा हिस्सा
जांच में झूठी निकली पुलिसिया कहानी
पुलिस की विराट मानवता का गान करने वाली इस कहानी के उलट एक तीसरी कहानी बल्कि क्षेपक भी...
दास्तां कलमकसाइयों की (डायरी,3 अक्टूबर, 2021)
कोई भी समाज कितना सभ्य और विकसित है, इसके कई पैमाने हैं। इनमें से एक पैमाना यह कि सबसे कमजोर तबके के लोगों के...
काहे रे नलिनी तू कुम्हिलानी …
दुनिया के सबसे उपेक्षित कवियों में से एक और सबसे ताकतवर और प्रतिभाशाली कवियों में से भी एक रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’ की कविताओं में...
ब्राह्मणों के जैसे कब जागेंगे दलित, पिछड़े और आदिवासी? डायरी (30 सितंबर, 2021)
शब्द बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। मैंने हमेशा यही माना है। हर शब्द की अपनी मर्यादा भी होती है। उपयोग करने के दौरान आवश्यक अनुशासन...
विज्ञापनों के बारे में कभी ऐसे भी सोचिए डायरी (29 सितंबर, 2021)
अखबारों का संबंध राजनीति से बहुत सीधा है। इसे स्थापित करने के लिए प्रमाणों की कोई कमी नहीं है। अखबारों में विज्ञापनों का प्रकाशन...
छोटे शहर का कैमरा
इप्टा ने अपने प्रारंभिक काल में धरती के लाल फिल्म बनाई। उसके बाद इप्टा के ही चेतन आनंद, ख्वाजा अहमद अब्बास, सागर सरहदी आदि...
एक आदिवासी की कहानी डायरी (26 सितंबर, 2021)
यह एक कहानी ही है। हालांकि हर कहानी घटनाओं का समुच्चय होती है और कुछ घटनाएं या तो घटित हो चुकी होती हैं या...
दलित जज और ब्राह्मण जज का फर्क डायरी (22 सितम्बर 2021)
आज की सुबह मेरे लिए बहुत खास है। शरीर के उपरी हिस्से में उठनेवाली पीड़ा का अंत हो गया है। आज पीड़ा नहीं हुई।...
किसान आंदोलन देश की टूटती हुई उम्मीदों को बचाने का आंदोलन है
उत्तर प्रदेश के किसानों के बीच कई दशकों तक काम करने के अनुभवों ने रामजनम की राजनीतिक समझ को अलग ढंग से विकसित किया...
बातें नौकरशाहों की डायरी (21 सितंबर, 2021)
स्मार्टफोन हमेशा स्मार्ट नहीं होते। कल यह नई जानकारी मिली। यह इसके बावजूद कि आजकल के स्मार्टफोन में एंड्रायड जैसा आपरेटिंग सिस्टम होता है...
बेहद खास है चरणजीत सिंह चन्नी का पंजाब का सीएम बनना डायरी (20 सितंबर, 2021)
अहा! एक खूबसूरत दिन बीत गया। रात भी बहुत खूबसूरत थी। कल पूरा दिन पढ़ता रहा। शुरुआत तसनीम बानू की किताब धरती भर आकाश...
साहित्यिक कृतियों में कैसे-कैसे चित्रित किये गए हैं एलजीबीटीएस?
नौवें और अंतिम दशक को हिन्दी साहित्य की स्त्री रचनाओं को स्वर्ण युग कहा जाता है। इन दो दशकों में हिन्दी के बड़े उपन्यासों...
विकलांग नागरिकों के लिए डायरी (19 सितंबर, 2021)
सबसे अधिक कमजोर कौन है? क्या वह व्यक्ति सबसे अधिक कमजोर है जो विकलांग है? क्या वह व्यक्ति सबसे कमजोर है जो सबसे गरीब...

