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Gaon Ke Log
नायकों के लिए मानदंड डायरी (18 सितंबर, 2021)
पटना स्थित घर के बाहर बथानी का छप्पर गिर जाने और उसके नीचे मेरी मोटरसाइकिल के दब जाने की सूचना मिली। यह बथानी 1980...
उत्तर भारत में पेरियार के बदले क्यों पूजे जाते हैं विश्वकर्मा? डायरी (17 सितंबर, 2021)
बंगाल और बिहार में अनेकानेक सांस्कृतिक समानताएं हैं। फिर चाहे वह खाने-पीने का मामला हो या तीज-त्यौहारों का। भाषा में भी बहुत अधिक अंतर...
हादसा और सरकारी तंत्र की असंवेदनशीलता डायरी (16 सितंबर, 2021)
देश में लोकतंत्र है और अब यह देश वह देश नहीं है जो अंग्रेजों के समय था। देश में एक संविधान है और यह...
मिथिलांचल के पर्व चौठचन्द्र का इस्लामिक कनेक्शन
आज के इस दौर में जब धार्मिक विभाजन की खाई रोज ब रोज गहरी की जा रही है, भारत के एक हिस्से मिथिलांचल में...
मुक्तिबोध को एक ग़ज़लकार की चिट्ठी -3
अगर इस कहानी में सिर्फ़ इतना ही होता कि बम गिराकर क्लॉड ईथरली को इतना पछतावा होता है कि वो अपने को सज़ा दिलाने...
ये दृश्य बेहद सामान्य हैं, लेकिन हम नजरअंदाज नहीं कर सकते डायरी (15 सितंबर, 2021)
बात कल की ही है। हालांकि यह ऐसी कोई बात नहीं है जो पहले मेरी जेहन में नहीं आयी हो। लेकिन जब दो बातें...
दिल्ली, तुम्हारी निगाहें बहुत बोलती हैं डायरी (14 सितंबर, 2021)
दिल्ली इन दिनों बहुत परेशान है। इसकी परेशानी का आलम यह है कि यहां के राजपथ पर हुक्मरानों की आवाजाही बढ़ गई है। हालांकि...
‘लागा चुनरी में दाग’ और ‘लागल जोबनवा में चोट ‘डायरी (13 सितंबर, 2021)
स्त्रियों के विषय में स्पष्टवादी लेखिकाओं में नीलिमा चौहान बेहद खास हैं। वह ऑफिशियली पतनशील की लेखिका भी हैं। उनके विचार और शब्दों का...
मुक्तिबोध को एक ग़ज़लकार की चिट्ठी-1
मोहतरम मुक्तिबोध जी !
कुल मिलाकर आपने जादू तो मुझपर यही कर रक्खा है कि आप कभी कोई कमज़ोर चीज़ रच ही नहीं सकते ।...
बात ब्रह्मराक्षसों की डायरी (12 सितंबर, 2021)
कल का दिन चार बातों के कारण खास रहा। एक तो यही कि दिल्ली में अच्छी बारिश हुई। कई जगहों से अप्रिय सूचनाएं भी...
सिनेमा का सफरनामा : बेचैन रूहों की पहली पीढ़ी
सिनेमा हमेशा एक घटना की तरह जनमानस में शामिल होता रहा है और वह समाज और देश में होनेवाली घटनाओं को भी अपने भीतर समेट लेता है। एक सौ वर्ष के सिनेमा के अतीत के साथ ही भारत और दुनिया के अतीत की अनगिनत घटनाएँ जुड़ी हुई हैं। विश्वयुद्ध, क्रांतियाँ, भारतीय राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन, स्वतन्त्रता, विभाजन, राष्ट्रीयकरण और हरितक्रांति से लेकर भूमंडलीकरण और सरमायेदारी के नए दौर के बीच की असंख्य छोटी-बड़ी घटनाएँ। और स्वयं सिनेमा ने समाज पर जो असर डाला है वह अनेक घटनाओं के होने की प्रेरणा भी बना। सिनेमा ने समाज की सोच को बदला है और अनेक जड़ताओं को तोड़कर उसे आगे बढ़ने की प्रेरणा भी दी है।
क्रूरता : सब जग देखा एक समाना डायरी (11 सितंबर, 2021)
बरसों बाद एक परेशानी फिर से परेशान कर रही है। मैं इसे बीमारी नहीं कहता। हालांकि मेरे चिकित्सक इसे एक बीमारी की संज्ञा देते...
शब्द और परिस्थितियों में अंतर्संबंध डायरी (10 सितम्बर,2021)
जीवन में संयोग जैसा कुछ होता है, इसमें यकीन नहीं है। अलबत्ता कुछ खास कारणों से कुछ खास परिस्थितियां जरूर बन जाती हैं और...
हिंदू धर्म का पाखंड केवल दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों के लिए है डायरी (7 सितम्बर, 2021)
ब्राह्मणवाद का मूल आधार ही पाखंड है। मुट्ठी भर लोगों का समाज के हर क्षेत्र में वर्चस्व बनाए रखना इसका मुख्य उद्देश्य। पाखंड किस...
आंदोलन नहीं, क्रांति कर रहे हैं भारतीय किसान डायरी (6 सितंबर,2021)
जाति व्यवस्था भारतीय समाज की कड़वी सच्चाई है और इसे कायम रखने में व्यापारी वर्ग के लोगों के साथ ही उच्च जातियों की बड़ी...
जातिगत जनगणना पर क्या सोचते हैं बुद्धिजीवी – 3
जाति जनगणना को लेकर हम लगातार देश के बुद्धिजीवियों से संवाद चला रहे हैं। इस प्रक्रिया में हमने सभी को चार प्रश्न भेजे जिनके...
भारत के महान लड़ाका जगदेव प्रसाद
बिहार के सामंती ठसक वाले इलाक़े में पैदा हुए बिहार लेनिन जगदेव बाबू (2 फरवरी 1922 – 5 सितम्बर 1974) एक बग़ावत का नाम...
जगदेव प्रसाद की हत्या से जुड़ा एक दस्तावेज, जिसे गायब कर दिया गया डायरी (5 सितम्बर,2021)
कल फिर एक तथाकथित महान पुरूष ने मीडिया और जाति का सवाल छेड़ दिया। खुद को दलित वैचारिकी का स्तंभ माननेवाले इस महान पुरूष...
नाम, समाज और महिलाओं के सवाल(डायरी 4 सितम्बर,2021)
बचपन से ही नामों को लेकर बड़ा कंफ्यूजन रहा है। मेरे जेहन में अक्सर यह बात रहती रही है कि नामों का निर्धारण कैसे...
भावनाएं केवल ताकतवालों की आहत होती हैं जज साहब! डायरी (3 सितंबर, 2021)
कल का दिन बेहद खास रहा। खास कहने के पीछे कोई व्यक्तिगत कारण नहीं है। वैसे भी जब आदमी तन्हा हो तो व्यक्तिगत कारणों...

